कजरौटा: विंध्य की धरती पर कला का महाकुंभ

(नैवेद्य पुरोहित)
जब सफर की शुरुआत होती है तो मंजिल का अंदाज़ा नहीं होता, लेकिन रास्ते में मिलने वाले तज़ुर्बे ज़िंदगी भर याद रहते हैं। ऐसा ही सतना की ये यात्रा मेरे लिए सिर्फ़ एक कार्यक्रम में शिरकत नहीं थी। ये एक अहसास था, एक तजुर्बा था, जो दिल में घर कर गया। 29 जनवरी की रात 10 बजे मैं जब भोपाल जंक्शन से रेवांचल एक्सप्रेस में बैठा तो दिल में एक अजीब सी कशमकश थी। मेरी मित्र रिया सेनानी जो आकार वेलफेयर सोसाइटी की सदस्य है। उसने मुझे इस कजरौटा भारतीय कला महोत्सव के लिए आमंत्रित किया था। मेरे मन में सबसे पहला यह आया कि आखिर ये कजरौटा शब्द का मतलब क्या है? ढूंढा तो मालूम पड़ा कि पुराने समय में कजरौटा एक पारंपरिक पात्र कंटेनर समान होता था जिसमें काजल रखा जाता है, खासकर बच्चों की आँखों के लिए, जिसमें एक डंडी लगी ढक्कन होती है। जो लोहे, पीतल या तांबे जैसी धातुओं से बना होता था और भारतीय संस्कृति में इसका खास महत्व था जो बुरी नजर से बचाने के लिए लोग इस्तेमाल करते थे। खैर, पहली बार किसी टियर-3 शहर में इतने बड़े पैमाने पर कला का जश्न होने जा रहा था।
पहला दिन - 30 जनवरी की सुबह 6:35 बजे जब रेवांचल एक्सप्रेस सतना स्टेशन पर पहुँची तो मैंने देखा कि भोपाल से करीब 40-50 लोग और भी इसी महोत्सव के लिए आए हुए थे। हम सभी एक स्कूल बस में बैठकर पहले अमृत वाटिका होटल पहुँचे। वहीं पर मेरी मुलाकात निखिल सिंह और उनकी दोस्त निहारिका सिंह से हुई। निखिल और निहारिका दोनों सांची यूनिवर्सिटी ऑफ़ बुद्धिस्ट-इंडिक स्टडीज से फाइन आर्ट्स में एमएफए कर रहे हैं। निखिल की पेंटिंग्स में प्रकृति से जुड़ी चीज़ों का ऐसा सुकून दिखता है कि मानो पंचतत्व ख़ुद उनके कैनवास पर उतर आए हों। वहीं निहारिका की हर पेंटिंग एक सामाजिक संदेश देती है, कुछ न कुछ कहती है। कला सिर्फ़ रंगों का खेल नहीं समाज का आईना भी है ये बात उनकी फनकारी में झलकती है। मेहमानों की संख्या बढ़ने के कारण करीब 20 मिनिट बाद मुझे और निखिल को वृंदावन ग्रीन्स शिफ्ट कर दिया गया। शहर से 10 किलोमीटर दूर यह शानदार स्विमिंग पूल वाला रिसॉर्ट था। वहाँ तैयार होकर करीब 10:30 बजे हम आयोजन स्थल वेंकटेश लोक के लिए निकले। वेंकटेश लोक सतना शहर के मुख्तियारगंज में 200 साल पुराने प्राचीन वेंकटेश मंदिर (भगवान विष्णु) के आसपास बना एक नया विकसित, आधुनिक और सुंदर मंदिर परिसर है। उज्जैन के महाकाल लोक की तर्ज पर निर्मित इस परिसर को लगभग 8.26 करोड़ रुपये की लागत से विकसित किया गया था ताकि 200 साल पुराने मंदिर का सौंदर्यीकरण किया जा सके। इसमें नवीनीकृत परिसर, एक पुनर्निर्मित प्राचीन तालाब और भगवान विष्णु के 10 अवतार की प्रतिमाएं भी शामिल हैं। यहां हर पत्थर में कहानी है, हर दीवार में इतिहास।
उद्घाटन और प्रारंभ - ब्रेकफास्ट के बाद मैंने आर्ट गैलरी में निखिल और निहारिका की पेंटिंग्स डिस्प्ले करने में उनकी मदद की। फिर अतिथियों ने दीप प्रज्वलन कर इस तीन दिवसीय महोत्सव की शुरुआत की। सतना के महापौर योगेश ताम्रकार, विधायक सिद्धार्थ कुशवाहा उर्फ 'डब्बू जी', सीएसपी सतना और भी अन्य गणमान्य लोगों ने मिलकर दीप प्रज्वलन किया। उज्जैन से आई टीम द्वारा कबीर गायन की प्रस्तुति हुई। कबीर की पंक्तियाँ सुनते हुए मन में एक अजीब सी सच्चाई उतर गई। दोपहर 1:30 बजे लंच हुआ, तीनों दिन बहुत अच्छा स्वादिष्ट भोजन मिला। उसके बाद नृत्य प्रस्तुति हुई, फिर शाम को आर्ट गैलरी में भीड़ बढ़ गई थी। रात का नज़ारा तो और भी ख़ूबसूरत हो गया था रोशनी में नहाया हुआ वेंकटेश लोक, कला प्रेमियों के मुस्कुराते हुए चेहरे और हवा में घुली कला की महक। वहाँ मखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के रीवा परिसर के दो विद्यार्थी मिले - गौरव 'विराट' तिवारी और दिनेंद्र कुशवाहा। वे वरिष्ठ पत्रकार निधीश त्यागी के मार्गदर्शन में चल रहे "विंध्य फर्स्ट" नाम के चैनल की तरफ़ से इस कार्यक्रम की कवरेज करने आए थे। विंध्य फर्स्ट कजरौटा भारतीय कला महोत्सव का मीडिया पार्टनर था। डिनर के बाद रात करीब 11 बजे हम होटल पहुँचे, बहुत थक चुके थे। पहले रातभर की ट्रेन यात्रा और फिर सुबह 6 से रात 11 बजे तक दिनभर व्यस्तता, बिस्तर पर लेटते ही नींद आ गई।
दूसरा दिन: कला और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का संगम - अगले दिन सुबह 9:30 बजे उठे। अब हम वृंदावन ग्रीन्स से शिफ्ट होकर दूसरे होटल जा रहे थे क्योंकि वृन्दावन ग्रीन्स रिसॉर्ट शहर से काफी दूर था। करीब 10:30 बजे हमने सतना बस स्टैंड के पास होटल स्वराट में चेक इन किया। तत्पश्चात नहा धोकर तैयार होकर कार्यक्रम स्थल के लिए रवाना हो गए। आज का दिन ख़ास होने वाला था क्योंकि विविध भारती के प्रसिद्ध रेडियो उद्घोषक यूनुस खान का 'आर्ट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' पर सत्र था।
यूनुस ख़ान का व्याख्यान - यूनुस ख़ान साहब ने 'डेथ ऑफ अन ऑथर' किताब का ज़िक्र किया। साथ ही उन्होंने ट्रांसलेशन के बारे में जावेद अख़्तर साहब के द्वारा दिया गया उदाहरण साझा किया और कहा कि इत्र की एक शीशी को दूसरी शीशी में अगर आप उंडेलेंगे तो थोड़ी बहुत ख़ुशबू तो उसमें से गायब हो ही जाएगी, यही बात ट्रांसलेशन के साथ है। एआई द्वारा शैलेंद्र के गीत उनकी शैली में नहीं लिखा जा सकता। किप वर्डनार के अनुसार, एआई का भविष्य ह्यूमन वर्सेस एआई नहीं है, बल्कि एआई विथ ह्यूमन है। हार्वर्ड स्कूल ऑफ बिजनेस के प्रोफेसर करीम लखानी कहते है कि ह्यूमन्स विथ एआई विल रिप्लेस ह्यूमन्स विदाउट एआई। यूनुस साहब का कहना था कि एआई से डरने की आवश्यकता नहीं है। वहाँ बैठे एक बुज़ुर्ग ने उनसे कई सवाल पूछे। एआई विथ ह्यूमन ही आने वाली दुनिया का सच है। एआई भौतिक पहलुओं का विश्लेषण कर सकता है, पर भावनात्मक पहलुओं का कभी नहीं। अगर हम किसी कथाकार की सारी कहानियाँ एक एआई में डाल देंगे और कहेंगे कि उसी शैली में लिखो, तब वो लिख देगा, पर तब तक लेखक अपनी शैली बदल लेगा तो वो उससे आगे हो जाएगा।
विंध्य की राजनीति - दूसरा सत्र विस्तार न्यूज़ के स्टेट हेड अंचल शुक्ला का मीडिया का डिजिटल परिवर्तन पर था। उन्होंने विंध्य के बारे में कहा कि यहाँ हमेशा एक अलग ही हवा चलती है। बीजेपी की लहर में भी कांग्रेस, सपा, बसपा सब जीत जाते हैं। विंध्य की अपनी विशिष्ट पहचान है, अपनी मिट्टी का अपना तेवर है। उसके बाद टैगोर स्कूल द्वारा नाटक हुआ। शाम के वक्त एक कार्टूनिस्ट मिले नीरज सिंह, जो 1998 में इंदौर के डेली कॉलेज से पास आउट थे। फिर मुंबई में उन्होंने आर्किटेक्चर का कोर्स किया और वहीं पर 15 साल जॉब की। वर्तमान में सतना में रहते हैं और शौकिया तौर पर कार्टूनिंग करते हैं। शाम को आर्ट गैलरी में भीड़ बढ़ गई। बंगाली नृत्य का आयोजन था जो कि बहुत अच्छा हुआ। डिनर के वक्त मैंने यूनुस साहब से इंटरव्यू के लिए पूछ लिया। उन्होंने कन्फर्म किया कि वो कल पक्का कर देंगे। मुझे एमसीयू भोपाल के कम्युनिटी रेडियो स्टेशन 'कर्मवीर' की रीलॉन्चिंग के लिए उनसे शुभकामना संदेश चाहिए था। लज़ीज़ व्यंजनों से लबरेज़ डिनर के बाद आज भी रात करीब 11 बजे मैं होटल पहुँचा।
तीसरा दिन: मानसिक स्वास्थ्य और मुलाक़ातों का दिन - सुबह 9:30 बजे उठा, तैयार हुआ। मेरे मित्र कैमरापर्सन दिनेंद्र कुशवाहा का फ़ोन आया कि उनके होटल में गीज़र नहीं है और वे दो दिन से नहाए नहीं हैं। तब मैंने उन्हें अपने होटल बुला लिया। तैयार होकर हम नीचे गए तो गाड़ी में डॉ. प्रीति गुगनानी बैठी थीं, जिनका आज मेंटल हेल्थ पर सत्र था। कार में उनसे बातचीत हुई उन्हीं के साथ ब्रेकफास्ट किया। विभिन्न सरकारी स्कूलों और हॉस्टल्स से बच्चे उनके सत्र के लिए बुलाए गए थे। डॉ. प्रीति ने बहुत अच्छे से शुरुआत में एक्टिविटी करवाई। उन्होंने समझाया कि आज कॉन्सटेंट कम्पेरिज़न बहुत हो रहा है। उनका कहना था कि, "दबाव या तनाव समस्या नहीं है, समस्या अकेले इसका सामना करना है। हमारी चुप्पी ही हमारे तनाव की समस्या पैदा कर रही है।" बहुत अच्छा सत्र चला। एक भी पल बोरियत नहीं हुई।
उसके बाद मैं जिस काम के लिए इतनी दूर यहाँ आया था, उसकी ओर लग गया। विविध भारती के प्रसिद्ध रेडियो उद्घोषक यूनुस ख़ान साहब से साक्षात्कार लेना था। आगामी 13 फरवरी को माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल अपना कम्युनिटी रेडियो स्टेशन 'रेडियो कर्मवीर' रीलॉन्च कर रहा है। उसके लिए उनका शुभकामना संदेश चाहिए था। कल जब मैंने उन्हें कहा था तो उनका जवाब था, "यार आज तो महफ़िल जमी हुई है, अपन कल करते हैं उसे, पक्का मैं कर दूँगा तुम्हारा काम।" इसके बाद मैं आश्वस्त हो गया था। आज जैसे ही मौका मिला, मैंने लपक लिया। दरअसल डॉ प्रीति गुगनानी के सत्र के दौरान मैंने देखा कि यूनुस सर बाहर जाकर किसी से फोन पर बात कर रहे है। बस वही मैं भी उनके पीछे चल दिया। मेरे मित्र दिनेंद्र को फोन कर बाहर बुला लिया और फिर हमने इंटरव्यू रिकॉर्ड किया। शुरुआत में ही यूनुस साहब ने कहा, "मेरी बहुत सारी शुभकामनाएं रेडियो कर्मवीर को मुझे एक तो नाम बहुत अच्छा लगा, और कभी मेरा सपना होता था कि मैं माखनलाल चतुर्वेदी यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म की पढ़ाई करूं जीवन ने ऐसा मौका नहीं दिया। पढ़ाई जर्नलिज़्म की हुई लेकिन किसी और जगह से हुई। मुझे दिल से खुशी है कि रेडियो कर्मवीर फिर से शुरू हो रहा है। जब कभी भी मेरी ज़रूरत पड़े मेरे हुनर की ज़रूरत पड़े तो मुझे याद करें। भोपाल से मेरा बहुत लगाव है और माखनलाल यूनिवर्सिटी मेरे सपनों की यूनिवर्सिटी है तो वह भी मेरे लिए खुशी की बात है।" उनके रेडियो करियर की शुरुआत से लेकर उनके फेवरेट रेडियो उद्घोषक कौन है यह सब बातें उनसे की। कई दूसरे विषयों पर भी उनसे बात हुई। अब मेरा मक़सद पूरा हो चुका था जिसके लिए मैं यहाँ आया था। लंच के बाद डॉ. प्रीति गुगनानी के साथ हमने पॉडकास्ट शूट किया।
कुम्हार से मुलाक़ात - शाम को मैं सिंगर गुरु मनकान के कॉन्सर्ट की प्रमोशनल रील के लिए जिस होटल में वे ठहरे थे वहां गया। इसी बीच राष्ट्र 24 नाम के चैनल में फाउंडर्स ऑफिस में इंटर्नशिप के लिए मैंने अप्लाई किया था वहाँ से भी इंटरव्यू कॉल आ गया, वो भी अटेंड किया। फिर हम सभी गुरु मनकान से मिले, उन्हें गुलदस्ता भेंट किया, फिर वापस वेंकटेश लोक आ गए। वहाँ एक कुम्हार मिला उसका नाम तिलकराज प्रजापति था। शुरुआत में मैंने सिर्फ़ ऐसे ही फोटो-वीडियो के लिए मिट्टी का दीपक बनाया था। फिर थोड़ी देर बाद जब उससे बात की, मैंने उसे कहा कि तुम्हारा मिट्टी का काम है, हमारा भी ईंट का भट्टा है। ईंट के भट्टे सुनकर उसने भी कहा मेरा भी ईंट का भट्टा है, हम तो ख़ानदानी ईंट भट्टे वाले हैं। मैंने पूछा वहां क्या रेट में मिलती है? उसने कहा 4 रुपए। मैंने बताया कि इंदौर में 9 रुपए है। ऐसे ही कुछ देर बात हुई। फिर उसी के साथ मैं बाहर लोकल खाने-पीने निकल लिया। पहले झल्ला के समोसे खाए, फिर सतना में हॉस्पिटल रोड पर स्थित फेमस लोटन मुंगेडी वाले की मुंगेडी खाई। फिर वापस उसके साथ पैदल वेंकटेश लोक चला गया। रास्ते भर बातचीत के दौरान पता चला कि इस बंदे ने पहले बीएससी इन मैथमेटिक्स किया, फिर एमए इन हिंदी किया, फिर अभी बीएड भी कर रहा है और 4 फरवरी को उसका यूजीसी नेट का रिज़ल्ट भी आने वाला है। साथ ही साथ उसके गाँव उच्छेरा में वो बच्चों को पढ़ाता भी है। उसका कहना था इंसान को अपने आप को बहुत बिज़ी रखना चाहिए। आते वक्त हमने साथ में गुलाब जामुन भी खाया। वेंकटेश लोक पहुँचने के बाद शुरू हुआ गुरु मनकान का कॉन्सर्ट। एक से बढ़कर एक गीत सुनाए उन्होंने सतना की जनता के लिए ऐसा फेस्ट और ये सब पहली बार हो रहा था। लोगों में बहुत ज़्यादा एक्साइटमेंट थी और वो उनके चेहरों से पता चल रहा था।
सात साल बाद मुलाक़ात कॉन्सर्ट के दौरान जब मैं फ़ोन चार्ज करने चार्जिंग पॉइंट पर जा रहा था, तभी मेरी मुलाक़ात एक ऐसे शख़्स से हुई जिससे मैं पिछले 7 साल से नहीं मिला था, अजीत सिंह। मेरे लिए अजीत भैया जिनसे मैं 2019 में महाराष्ट्र के कोल्हापुर में एनसीसी के नेशनल ट्रेकिंग कैंप के दौरान मिला था। एक बार में शक्ल देखकर उन्होंने भी पहचान लिया और मैंने भी। दोनों ने एक-दूसरे का नंबर सेव कर रखा था, फ़ोटोज़ देखते रहते थे पर आमने-सामने मुलाक़ात इतने सालों बाद हुई। 2019 के बाद हम अब मिल रहे थे। बहुत सारी बात की उन्होंने बताया कि सतना उनका गृहनगर है और वो वर्तमान में दिल्ली यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं, अभी छुट्टी लेकर आए हैं। कभी-कभी लगता है भगवान ने सबकुछ पहले से तय कर रखा है कि इस दिन इस समय आप इस व्यक्ति से मिलेंगे और वो आपके संबंधों को और प्रगाढ़ करेगा। सच में कुछ जगह जाने से आपका नया संपर्क तो बढ़ता ही है, साथ ही पुराने संपर्क भी ज़िंदा उठ खड़े हो जाते हैं, उन रिश्ते रूपी पेड़ों में पानी पड़ जाता है।
वापसी का सफ़र - कॉन्सर्ट ख़त्म होने के बाद मैं होटल स्वराट गया, मैंने और निखिल ने चेकआउट किया फिर निकल पड़े स्टेशन के लिए। सतना स्टेशन से रात 11:58 पर हमारी ट्रेन थी। स्टेशन पहुंचने के बाद जल्द ही मिलने का वादा किया और ट्रेन में बैठ गया। फिर सुबह 9:30 बजे मैं संत हिरदाराम नगर स्टेशन पहुँच चुका था। वहाँ से वापस माखनलाल कैंपस के लिए कैब बुक की और 10:15 तक अपने हॉस्टल आ चुका था और 10:40 पर सीधे क्लास! तीन दिन में मैंने कई लोगों से संपर्क बनाए, अच्छे लोगों से मुलाक़ात हुई। नए लोगों से जान-पहचान बढ़ी। सतना जैसे टियर-3 सिटी में पहली बार इस तरह का फेस्ट देखकर ख़ुशी हुई। ख़ूब मज़े किए। कजरौटा ने मुझे बहुत सारे नए लोग दिए जिनसे मेरे संबंध जीवनभर बने रहेंगे। विंध्य की इस भूमि पर सतना में ये इतिहास रचने के लिए आकार वेलफेयर सोसाइटी को बहुत-बहुत बधाई। इसी तरह आगे भी हर साल कजरौटा करते रहिए, अब ये सिलसिला रुकना नहीं चाहिए! #कजरौटा #आकार_वेलफेयर_सोसायटी #सतना #यात्रा_वृत्तांत

Comments

  1. बहुत सुंदर यात्रा वृतांत है और पढ़कर ऐसा लगता हैं जैसे हम खुद वहां हो कर आ गए है...... अपनी लेखनी में इसी तरह ताजगी बनाए रखना...... नैवेद्य।
    मंज़िल तो मिल ही जाएगी भटककर ही सही...... गुमराह तो वह है जो निकले ही नहीं....... अच्छे पत्रकार के गुण हैं तुममें

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  2. हर नयी जगह नये लोग जिंदगी में कुछ सिखा कर ही जाते है और ऐसे आयोजनों में भाग लेने से नेटवर्किंग कनेक्शन भी बढ़ते हैं ।

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