एक दिन बिक जाएगा माटी के मोल, जग में रह जाएंगे प्यारे तेरे बोल!

(नैवेद्य पुरोहित) आज सुबह महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार का विमान क्रैश में दुखद निधन हो गया, प्राइवेट कंपनी का वह चार्टर्ड प्लेन बारामती एयरपोर्ट के करीब लैंडिंग के समय ज़मीन पर गिरा और सभी सवारों की जान चली गई। इस हादसे ने सियासत को झकझोर दिया है शक्ति, सत्ता और साख के उन तमाम सवाल सब चले गए। सच यह है कि सत्ता का सफ़र, चाहे प्राइवेट कंपनी के चार्टर्ड जेट में हो या गांव की ज़मीनी राजनीति में अन्ततः उसी मिट्टी में मिल जाता है जिसका हर नेता दावा करता है कि वह जनता की सेवा के लिए आया है। पैसे की दौड़, इज्ज़त के क़िले और हजारों करोड़ों की संपत्तियाँ सब एक दिन धूल हो जाती हैं जिस मिट्टी की कीमत हर राजनीतिक भाषण में चढ़ाई जाती है, वही मिट्टी आख़िरकार हर किसी को अपने पास बुलाती है।
राजनीति में उनके सफ़र के कुछ रंग सबसे ज़्यादा याद रहेंगे - 70 हज़ार करोड़ के भ्रष्टाचार के आरोपों से जूझते हुए भी उन्होंने अपने राजनीतिक सफ़र में कई उतार-चढ़ाव देखे। आरोपों पर हमेशा बहस होती रही, लेकिन आख़िरकार राजनीति की 'वॉशिंग मशीन' के गठबंधन कहा जाने वाला सत्ता समीकरण में सब धुलता हुआ दिखा। उनके पुराने दाग़, पुराने विवाद सब साफ हो गए। कल तक जो लोग उन पर "चक्की पीसिंग एंड पीसिंग..." का तंज कसते थे आज वही उनके साथ सरकार बना बैठे।
अजीत पवार ने 2023 में अपनी पार्टी को तोड़कर बीजेपी-शिंदे गुट के साथ नई राह चुनी थी जिसने महाराष्ट्र की राजनीति में एक नयी दिशा बनाई। कई आलोचक कहते रहे कि इस गठबंधन ने उन सभी पुराने दाग़ों को मिटा दिया पर ईश्वर के दर पर उसे मिटाना आसान नहीं होता, वक्त की चाल में सब कुछ बह जाता है। इसीलिए कहते है कि भगवान से डरो जब ऊपरवाले के सामने अपना बहीखाता खुलेगा तब आप हजारों लाखों करोड़ डकार कर सरकार में आकर कानून से बच सकते हो लेकिन भगवान से कभी नहीं। अपने कर्म से कोई न बच सका साक्षात गंगापुत्र भीष्म भी नहीं। मीडिया और जनता की नज़र में आज जो तस्वीर उभरती है वह सिर्फ़ एक नेता की मौत नहीं है। महाराष्ट्र के लोगों के लिए तो उनकी सियासत का एक सितारा अस्त हुआ है।
ज़िंदगी, सत्ता और रिश्ते - हार्वर्ड यूनिवर्सिटी ने 1938 में एक अध्ययन शुरू किया था। इसे नाम दिया गया हार्वर्ड स्टडी ऑफ एडल्ट डेवलपमेंट। इसके लिए दुनिया भर से 724 प्रतिभागियों और उनके 2000 से ज्यादा वंशजों के युवावस्था से बुढ़ापे तक के शारीरिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर नजर रखी गई। मूल समूह के लगभग 60 लोग आज 90 से ज्यादा की उम्र में हैं और अब भी अध्ययन में हिस्सा ले रहे हैं। इसके निष्कर्ष बताते हैं कि खुशियों के लिए संपत्ति और सेहत से भी ज्यादा जरूरी है अच्छे रिश्ते। इंसान के लिए वास्तविक महत्व उसके रिश्तों का होता है, उसके बाद पैसा, स्वास्थ्य, प्रतिष्ठा, सब कुछ आता है। मनुष्य की यह कैसी विडम्बना है कि हम उन रिश्तों को चुनते हैं, जोड़ते हैं और तोड़ते हैं सिर्फ़ अपने मतलब के लिए। राजनीति में तो कहा ही जाता है यहां कोई किसी का सगा नहीं।
अंत में वही पुरानी सच्चाई - पैसा, इज्ज़त, हज़ारों करोड़ की संपत्तियां सब यहीं रह जाता है। इंसान खाली हाथ आया है, खाली हाथ जायेगा। मिट्टी का है और मिट्टी में ही मिल जायेगा। राजनीति की इस बड़ी ज़मीन पर आज एक साया छूट गया है। 1975 में एक फिल्म आयी थी धरम करम इसमें मसरूह सुल्तानपुरी ने एक गीत लिखा था, "एक दिन बिक जाएगा माटी के मोल, जग में रह जाएंगे प्यारे तेरे बोल!" अजीत दादा को शत शत नमन। #अजीत_पवार #प्लेन_क्रैश #बारामती #शरद_पवार #एनसीपी #महाराष्ट्र #AjitPawar #ajitdada #ajitdadapawarfanclub #planecrash #BaramatiNews #SharadPawar #NCP #NCPAjitPawar #maharashtra

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