आलोकनामा - सपनों का सफर: एक यादगार शाम की दास्तान
जिंदगी में कुछ लम्हात ऐसे होते हैं जो दिल की तख्ती पर हमेशा के लिए नक़्श हो जाते हैं। 6 जनवरी 2026 की शाम भी कुछ ऐसी ही थी एक ऐसा तजुर्बा जो महज़ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि अनुभव का एक सैलाब था। आलोक श्रीवास्तव का "आलोकनामा - सपनों का सफर" मुझे एक काव्य-प्रस्तुति नहीं लगी अपितु यह ज़िन्दगी के मुश्किल रास्तों पर चलते हुए कामयाबी की मंज़िलें पाने की एक मुकम्मल दास्तान थी।
कार्यक्रम की शुरुआत और तैयारी -
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की तरफ़ से ऐसे 20 विद्यार्थियों को यह खुशनसीब मौक़ा मिला जिनकी साहित्य में गहरी दिलचस्पी है। कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी सर के मार्गदर्शन में हम भोपाल के रविन्द्र भवन पहुंचे। यह बात ख़ास तौर पर क़ाबिल-ए-ज़िक्र है कि इस कार्यक्रम के तमाम टिकट पहले ही "सोल्ड आउट" हो चुके थे और विश्वविद्यालय प्रशासन ने विशेष रूप से हमारे लिए उपलब्ध करवाए थे। शाम के सात बजे का वक़्त मुक़र्रर था लोगों की आँखों में उम्मीद की चमक साफ़ दिखाई दे रही थी।
दैनिक भास्कर मप्र के स्टेट एडिटर सतीश सिंह ने स्वागत उद्बोधन देकर महफ़िल का आग़ाज़ किया। मंच संचालन की ज़िम्मेदारी आरजे वेद ने बखूबी निभाई और फिर जब आलोक साहब मंच पर तशरीफ़ लाए तो पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
मप्र के छोटे से शहर से निकला एक सितारा -
देश के ह्रदयस्थल मध्य प्रदेश के एक छोटे से शहर विदिशा से निकलकर न सिर्फ़ हिंदुस्तान बल्कि दुनिया भर में अपना नाम रोशन करने वाले आलोक श्रीवास्तव किसी परिचय के मोहताज नहीं। बीस से ज़्यादा मुल्कों की साहित्यिक यात्राएं कर चुके हैं। इल्म और फ़िल्म दोनों मैदानों में उनकी मज़बूत पकड़ है। वे इस मुल्क के सबसे कम उम्र के शायर हैं जिनको ब्रिटेन की संसद हाउस ऑफ़ कॉमन्स में सम्मानित किया जा चुका है। उनकी शख़्सियत में वह भावुकता दिखी जो बड़े लोगों की पहचान होती है और बेशक उनके अल्फ़ाज़ में वह असर है जो दिलों को छू लेता है।
भोपाल से उनका रिश्ता दिल का बंधन -
जब आलोक साहब ने भोपाल के बारे में बात की, तो उनकी आवाज़ में एक अलग ही कैफ़ियत थी। उन्होंने कहा, "मरकज़ है इल्मो-फ़न का, मेरी दर्सगाह है भोपाल तुझसे इश्क़ है और बेपनाह है। यह मेरा ननिहाल है, दादीहाल है और ससुराल भी है।" इन अल्फ़ाज़ में बड़ी शिद्दत और गहरा लगाव था! उन्होंने ख़ुद को इस शहर का बड़े बुजुर्गों का पोता भी, नाती भी, और दामाद भी कहा। उन्होंने कहा कि "ज़िन्दगी का सफ़र आप सबकी दुआओं से तय होता है।"
कांतारा की कहानी-
एक गाँव में एक लड़का रहता था जो पानी की बोतलें सप्लाई करता था। पानी की बोतलें घर-घर पहुंचाने वाले नौजवान के हाथ में एक ऑर्डर आया कि तुमको रोज़ 25 पानी की बोतलें सप्लाई करनी हैं। जिस संस्थान से ऑर्डर था वहाँ उसने देखा कि फिल्म मेकिंग का कोर्स शुरू हुआ है। वो पानी बेचने वाला लड़का सीखता है फिर एक फिल्म बनाता है उसका नाम "कांतारा" है और वो लड़के का नाम ऋषभ शेट्टी है। ये कहानी भोपाल से कैसी जुड़ती है। एक लड़का यहां भोपाल के पास का ही था लिखना उसे विरासत में मिला था। अचानक एक रोज एक मैगजीन उसके हाथ में आई वो एक अख़बार की संडे मैगजीन थी। उसे देख के वो बड़ा आकर्षित हुआ। लड़के ने डरते-डरते उस अख़बार को अपनी एक ग़ज़ल भेजी और वहां से फोन आया कि आपकी हैंडराइटिंग बड़ी सुंदर है। आप क्लासिक्स में ही ग़ज़ल लिखे हम छापेंगे। एक दिन अख़बार के एमडी ने उसे बुलाया और कहा अब टुकड़ों में नहीं लिखो यही सीनियर सब एडिटर काम करना चाहोगे। आज से 25 बरस पहले उस लड़के की सैलरी भोपाल के एमपी नगर में चर्चा का विषय बनी थी। जिस शख्स ने हैंडराइटिंग पसंद की थी वो मनीष समंदर हॉल में ही बैठे थे। उनके साथ अख़बार के एमडी सुधीर अग्रवाल भी थे और उसी अख़बार का यह मंच था! दोनों कहानी हमें बताती है कि हालात कितने भी मुश्किल क्यों न हों, अगर हौसला बुलंद हो तो इंसान कुछ भी कर सकता है।
हौसले की दास्तान -
महफ़िल में सबसे ज़्यादा जो बात दिल को छू गई, वह थी हौसले और हिम्मत की कहानियाँ। आलोक साहब ने अपनी शायरी के ज़रिये यह पैग़ाम दिया,
"मंज़िलें क्या हैं, रास्ता क्या है,
हौसला हो तो फ़ासला क्या है।"
यह ज़िन्दगी का एक फ़लसफ़ा था। उन्होंने समझाया कि जब इंसान कोई इरादा करता है, कोई संकल्प लेता है, तो पूरी कायनात उसकी मदद के लिए तैयार हो जाती है। यह यूनिवर्स उसकी दुआओं को सुनता है और एक दिन वह इरादा ऐसे पूरा होता है जैसे एक माँ अपने बेटे को रोटी परोसती है।
हीरामन: एक किरदार, हज़ार जज़्बात -
आलोक श्रीवास्तव ने अपनी पूरी कहानी "हीरामन" नाम के एक किरदार के ज़रिये बयान की। यह महज़ एक किरदार नहीं था यह उनकी ज़िन्दगी का आईना था, उनके जज़्बात का तर्जुमान था। हीरामन की शक्ल में उन्होंने अपने संघर्ष, अपनी उम्मीदों और अपनी कामयाबियों को इस क़दर पेश किया कि हर शख़्स ख़ुद को उस किरदार से जुड़ा हुआ महसूस करने लगा। दरअसल, हीरामन हर उस इंसान की पहचान है जो अपने ख़्वाबों को पूरा करने के लिए बड़ी जद्दोजहद करता है, जो हर नाकामी के बाद फिर से उठ खड़ा होता है और जो ज़िन्दगी की तल्ख़ियों को भी मुस्कुराहट के साथ क़ुबूल करता है।
ज़िन्दगी के अहम वाक़िआत -
हीरामन की कहानी में कुछ अहम वाक़िआत थे जिन्होंने उनकी ज़िन्दगी को बदल दिया:
पहला वाक़िआ -
एक दिन बचपन में जब दोस्तों के बीच वह अपनी कहानी सुना रहा था तब एक दोस्त जो डॉक्टर बनने की तैयारी कर रहा था उसने हीरामन को बुरी तरह डाँटा और बेइज़्ज़त करके भगा दिया। यह बेइज़्ज़ती दिल में चुभ गई, लेकिन हीरामन ने हिम्मत नहीं हारी। उसने अपने दोस्त के सामने कहा, "एक दिन ऐसा आएगा जब तू मेरे शो का टिकट खरीद कर आएगा।" सालों बाद जब अमेरिका में जावेद अख्तर के साथ आलोक श्रीवास्तव शो कर रहे होते है तब उन्होंने देखा कि एक नौजवान कोने में पीछे बैठा रो रहा था। कार्यक्रम समाप्ति के पश्चात जब वो जाते है तो उससे कहते है कि तू यहां कैसे। तब वह लड़का कहता है पूरे अमेरिका में तुम्हारे चर्चे हो रहे है। हीरामन कहता है मुझे कह दिया होता पासेस अरेंज करवा देता तब वह दोस्त कह उठता है भूल गया तू आज से 30 साल पहले तूने कहा था कि एक दिन ऐसा आयेगा जब मैं तेरे शो के टिकट खरीद कर आऊंगा। आज उनके दोस्त का नाम डॉ. संजीव है जो अब लंदन शिफ्ट हो गए है और ये स्थिति है कि आलोक श्रीवास्तव के शो ऑर्गेनाइज करवा रहे हैं।
इस वाक़ेए ने सिखाया कि ज़िन्दगी में सिर्फ़ मोटिवेशन ही काफ़ी नहीं है डिमोटिवेशन भी ज़रूरी है। हर नाकामी, हर बेइज़्ज़ती इंसान को और मज़बूत बनाती है।
दूसरा वाक़िआ-
अस्सी के दशक में भोपाल में सबसे बड़ा मुशायरा आयोजित हुआ था जिसमें गोपालदास नीरज, कैफ़ी आज़मी सहित नामी हस्तियां शामिल थी। मुशायरा ख़त्म होने के बाद करीब तीन-साढ़े तीन बजे रात में हीरामन अपने घर पहुंचे। पिताजी ने दरवाज़ा खोला और फिर ब्रह्म मुहूर्त में हीरामन की बड़ी तबीयत से "पूजा" हुई। पीट-पीटकर ब्रह्म मुहूर्त से फ़ज्र की नमाज़ का वक्त आ गया। उनके पिताजी नाराज़ थे दरअसल वे यह चाहते थे कि पहले नौकरी करो, फिर पैशन को फॉलो करना। घर में माँ डिप्लोमेसी की पहली मिसाल हैं। उन्होंने अपनी मां से कहा - "कुछ भी कर लो बनूंगा तो मैं राइटर ही।" और माँ ने बस आशीर्वाद स्वरूप जवाब दिया, "आमीन।" यह वाक़िआ बताता है कि माँ-बाप की नाराज़गी के पीछे भी उनकी फ़िक्र और मुहब्बत होती है। उनकी हर सख़्ती उनकी परवाह का इज़हार है।
तीसरा वाक़िआ -
मां के आमीन कहते ही हीरामन अगले ही दिन मुंबई चले गए जगजीत सिंह से मिलने। ढूंढते-ढूंढते वह एक स्टूडियो पहुंचे वहां काम कर रहे दमन सूद ने मना कर दिया और कहा जगजीत साहब तो नहीं है। हीरामन वहीं बैठा रहा पहला दिन, दूसरा दिन, तीसरा दिन आखिर में उसे दया आ गई और उसने जगजीत सिंह को फोन पर कहा एक लड़का है भोपाल से आया है, हीरामन नाम बताया है तीन दिन से बैठा है आपसे मिलना चाहता है। चौथे दिन जगजीत सिंह आए। हीरामन की पोटली में जो भी अब तक का लिखा हुआ था सब सुना दिया। अंत में पूरे अदब के साथ जगजीत सिंह ने उसे अपने स्टूडियो से भगा दिया। यह दूसरी बार था कि हीरामन को भगाया गया पहली बार एक दोस्त ने और दूसरी बार जगजीत सिंह ने। हीरामन रोया, फिर वापस गया और पूछा कि मुझे कुछ उपाय बताइए। जगजीत सिंह ने हीरामन को अमीर ख़ुसरो और कबीरदास की किताबें दी और कहा कि इसे पढ़ो, रियाज़ करो। हीरामन ने अपने गुरु के कहने पर वह किताब पढ़ी और फिर रियाज़ किया।
कश्मीर का सफ़र एक नया मोड़ -
कुछ वक़्त बाद हीरामन प्रसिद्ध पत्रिकाओं में छपने लगे। फिर एक दिन जगजीत सिंह का फ़ोन आया, "कश्मीर चलना है।" उस समय कश्मीर में जगजीत सिंह कॉन्सर्ट था उसके लिए नज़्म लिखना थी। 9 अक्टूबर 2009 को जगजीत जी ने हीरामन की यह ग़ज़ल गाई:
"पहाड़ों के जिस्मों पे बर्फ़ों की चादर,
चिनारों के पत्तों पे शबनम के बिस्तर...
हसीं वादियों में महकती है केसर,
कहीं झिलमिलाते हैं झीलों के जेवर...
है कश्मीर धरती पे जन्नत का मंज़र!
यहाँ के बशर हैं फ़रिश्तों की मूरत,
यहाँ की जु़बाँ है बड़ी ख़ूबसूरत...
यहां की फ़िजाँ में घुली है मुहब्बत,
यहाँ की हवाएँ मुअत्तर-मुअत्तर...
है कश्मीर धरती पे जन्नत का मंज़र!
ये झीलों के सीनों से लिपटे शिकारे,
ये वादी में हँसते हुए फूल सारे...
यक़ीनों से आगे हसीं ये नज़ारे,
फरिश्ते उतर आए जैसे ज़मीं पर...
है कश्मीर धरती पे जन्नत का मंज़र!
सुखन सूफ़ियाना, हुनर का खज़ाना,
अजानों से भजनों का रिश्ता पुराना...
ये पीरों, फ़कीरों का है आशियाना,
यहाँ सर झुकाती है कुदरत भी आकर...
है कश्मीर धरती पे जन्नत का मंज़र!
हर बेइज़्ज़ती, हर नाकामी दरअसल एक नई राह दिखाने का ज़रिया बन सकती है, बशर्ते कि हम उससे सीखने की कोशिश करें। जब जगजीत सिंह साहब ने यह ग़ज़ल गा दी। उसके बाद हीरामन के अंदर का सहाफ़ी बाहर आया उन्होंने एक और ग़ज़ल पेश की जिसमें काश्मीर की तकलीफ़ों का ज़िक्र था:
मगर कुछ दिनों से परेशान है ये,
सियासी-निगाहों से हैरान है ये...
पहाड़ों में रहने लगी है उदासी,
चिनारों के पत्तों में है बदहवासी...
न केसर में केसर की ख़ुशबू रही है,
न झीलों में रौनक बची है जरा-सी...
मगर दिल अभी यह कह रहा है,
संभालो संभालो यह जन्नत का मंज़र!
यह एक फ़नकार की ज़िम्मेदारी को बयान करता है उसकी क़लम सिर्फ़ ख़ूबसूरती नहीं बयान करती, बल्कि हक़ीक़त का आईना भी होती है।
मुहब्बत की कहानी -
आलोक श्रीवास्तव ने मुहब्बत के बारे में बेहतरीन अशआर पेश किए:
"मेरे हाथ लग गया था एक नूर का ख़ज़ाना,
अभी तक रोशन है उसी से मेरा ग़रीब ख़ाना।"
"बात करो तो लफ़्ज़ों से भी ख़ुशबू आती है,
लगता है उस लड़की को भी उर्दू आती है...
तन्हाई में दिल से अक्सर ख़ुशबू आती है,
याद हमें अम्मा आती है या तू आती है...
देख के उसको खुद अपना भी होश नहीं रहता,
आंखों में वो ऐसा जादू लेकर आती है...
हमने भी तो दिल जीते हैं मीठे लफ़्ज़ों से,
हम कायस्थों को भी थोड़ी उर्दू आती है!"
मुहब्बत सिर्फ़ जज़्बात का नाम नहीं यह ज़िन्दगी को ख़ूबसूरत बनाने का हुनर है।
"वो यूँ है कि हर एक साँस में लेकर तुम्हारा प्यार चलें,
दिलों को जीतने आए थे, ख़ुद को हार चलें।
अगर नवाज़ रहा हूँ तो यूँ नवाज़ मुझे,
मेरे बाद मेरा ज़िक्र बार-बार चलें।"
यह शेर एक फ़नकार की ज़िन्दगी के मक़सद को बयान करता है वह अपने फ़न के ज़रिये ज़िन्दा रहना चाहता है, लोगों के दिलों में बसना चाहता है।
अमीर खुसरो की ख़िराज़े अक़ीदत मिसरे पर उन्होंने गज़ल सुनाई:
सखी पिया को जो मैं न देखूं,
तो कैसे काटूं अंधेरी रतियां...
कि जिनमें उनकी ही रौशनी हो,
कहीं से ला दो मुझे वो अंखियां...
दिलों की बातें दिलों के अंदर,
ज़रा सी ज़िद से दबी हुई हैं...
वो सुनना चाहें ज़ुबां से सब कुछ,
मैं करना चाहूं नज़र से बतियां...
ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है,
सुलगती सांसें, तरसती आंखें, मचलती रूहें, धड़कती छतियां...
उन्हीं की आंखें, उन्हीं का जादू, उन्हीं की हस्ती, उन्हीं की ख़ुशबू,
किसी भी धुन में रमाऊं जियरा, किसी दरस में पिरो लूं अंखियां !
मैं कैसे मानूं बरसते नैनो कि,
तुमने देखा है पी को आते...
न काग बोले, न मोर नाचे,
न कूकी कोयल, न चटखी कलियां...!
वाकई इश्क़ को परिभाषित करना मुश्किल है यह एक एहसास है जो रूह को छू लेता है, दिल को बेक़रार कर देता है।
एक और शेर:
"मुद्दतो ख़ुद की कुछ ख़बर ना लगे,
कोई अच्छा भी इस क़दर ना लगे...
बस देखा तुझे उस नज़र से,
जिस नज़र से तुझे नज़र ना लगे...
मैं जिसे दिल से प्यार करता हूँ,
चाहता हूँ उसे ख़बर ना लगे !
वक़्त का फ़लसफ़ा -
आलोक साहब ने वक़्त के बारे में एक बेहतरीन शेर पेश किया:
"समय की आँखें दिखाई नहीं दे रही होती हैं,
लेकिन समय सब देख रहा होता है...
यह सोचना ग़लत है कि तुम पर नज़र नहीं,
मसरूफ़ हम बहुत हैं मगर बेख़बर नहीं!"
वक़्त हर चीज़ देखता है, हर काम का हिसाब रखता है। इंसान को चाहिए कि वह हर लम्हे की क़द्र करे।
नाकामी का सच -
उन्होंने एक कड़वा सच बयान किया कि, "एक नाकाम आदमी के संघर्ष की कहानी सुनने का वक़्त किसी के पास नहीं है।" यह बात बहुत तल्ख़ है, लेकिन यही ज़िन्दगी की हक़ीक़त है। दुनिया सिर्फ़ कामयाब लोगों की कहानियाँ सुनना चाहती है। लेकिन दरअसल असली कहानी तो संघर्ष की होती है, न कि कामयाबी की।
कामयाबी का राज़ -
आलोक साहब ने एक बेहतरीन बात कही, "ज़िन्दगी में जिस चीज़ के पीछे आप सबसे ज़्यादा दौड़ते हैं, कायनात उतनी उस चीज़ को आपसे दूर कर देती है। लेकिन सपनों के पीछे आप जितनी शिद्दत से दौड़ते हैं, सपने उतनी तेज़ी से आपके हो जाते हैं।" जब इंसान बेचैनी और बेक़रारी में किसी चीज़ के पीछे भागता है, तो वह चीज़ दूर होती जाती है। लेकिन जब इंसान सब्र और शिद्दत के साथ अपने सपनों पर काम करता है, तो कायनात ख़ुद उसकी मदद करती है।
ख़्वाबों की बुलंदी -
"तुम सोच रहे हो बस बादल की उड़ानों तक,
मेरी तो निगाहें हैं सूरज के ठिकानों तक...
ख़ुशबू सा जो बिखरा है, सब उसका करिश्मा है,
मंदिर के तरन्नुम से मस्जिद की अज़ानों तक...
हर वक़्त फ़िज़ाओं में महसूस करोगे तुम,
मैं प्यार की खुशबू हूं महकूंगा ज़मानो तक!"
आलोक श्रीवास्तव ने पंकज उधास को याद करते हुए कहा:
"वो इश्क़ की ज़ुबान था, सुकून का जहान था,
वो शख़्स आसमान था, वो शख़्स आसमान था...
वो मखमली सा गीत था, वो रात-दिन का मीत था,
नया सा एक दौर था, वो इक पुरानी रीत था...
वो सात सुर की शान था, वो महफ़िलों की जान था,
वो शख़्स आसमान था, वो शख़्स आसमान था...
उदासियों की झील था, ख़ुशी का आबशार था,
ग़ज़ल का शिल्पकार था, वो नज़्म का क़रार था...
वो मयकदे के जाम से उतर चुकी थकान था,
वो शख़्स आसमान था, वो शख़्स आसमान था...
वफ़ाओं की, जफ़ाओं की वो अनसुनी सदाएँ था,
वो सूफ़ियों का कौल था, वो संत की दुआएँ था...
वो शाम का था कीर्तन, वो सुबह की अज़ान था,
वो शख़्स आसमान था, वो शख़्स आसमान था...
वो दोस्तों का दोस्त था, वो साथियों के साथ था,
वो सर-ब-सर रखा हुआ, दुआ का नर्म हाथ था...
वो नर्म-दिल पिता सा था, वो माँ के जैसा ध्यान था,
वो शख़्स आसमान था, वो शख़्स आसमान था...
तो आसमाँ भी एक दिन, जमीं की ओर देख कर,
ये सोचने लगा कि जो है आसमाँ ज़मीन पर...
मैं क्यूँ न उसको भी यहीं-कहीं कोई मक़ाम दूँ,
थके-थके परों को अपने इक नई उड़ान दूँ...
तो आसमाँ ने एक दिन हमारे आसमान को
कहा कि ‘अब थकान से मुझे भी तुम उबार दो
‘उधास’ अपनी शख़्सियत मुझे ज़रा उधार दो !
कि मखमली सुरों को मेरी रूह में उतार दो’
बस इतना सुनते ही हमारा आसमान चल दिया
और आसमान हो गया, जो शख़्स आसमान था!
पिता के लिए श्रद्धांजलि -
आलोक साहब ने अपने पिता के लिए जो श्रद्धांजलि दी, वह बेहद भावुक कर देने वाली थी। उनकी भावपूर्ण लेखनी ने वहाँ बैठे हर शख़्स की आँखों को नम कर दिया। हर किसी को अपने पिता की याद आ गई वह शख़्स जो ज़िन्दगी भर हमारे लिए संघर्ष करता है, लेकिन हम उसकी क़द्र शायद उसके जाने के बाद ही करते हैं। पिता के लिए उन्होंने कहा:
"धड़कते साँस लेते रुकते चलते मैंने देखा है,
कोई तो है जिसे अपने में पलते मैंने देखा है...
तुम्हारे ख़ून से मेरी रगों में ख़्वाब रौशन है,
तुम्हारी आदतों में ख़ुद को ढलते मैंने देखा है...
न जाने कौन है जो ख़्वाब में आवाज़ देता है,
ख़ुद अपने-आप को नींदों में चलते मैंने देखा है...
मेरी ख़ामोशियों में तैरती हैं तेरी आवाज़ें,
तिरे सीने में अपना दिल मचलते मैंने देखा है...
बदल जाएगा सब कुछ बादलों से धूप चटख़ेगी,
बुझी आँखों में कोई ख़्वाब जलते मैंने देखा है...
मुझे मालूम है उन की दुआएँ साथ चलती हैं,
सफ़र की मुश्किलों को हाथ मलते मैंने देखा है!"
"घर की बुनियादें दीवारें बामो-दर थे बाबू जी,
सबको बांधे रखने वाला ख़ास हुनर थे बाबूजी...
तीन मुहल्लों में उन जैसी कद काठी का कोई न था,
अच्छे ख़ासे ऊंचे पूरे क़द्दावर थे बाबू जी...
अब तो उस सूने माथे पर कोरेपन की चादर है,
अम्मा जी की सारी सज-धज सब ज़ेवर थे बाबू जी...
भीतर से ख़ालिस जज़्बाती और ऊपर से ठेठ पिता,
अलग अनूठा अनबूझा सा इक तेवर थे बाबू जी...
कभी बड़ा सा हाथ खर्च थे कभी हथेली की सूजन,
मेरे मन का आधा साहस आधा डर थे बाबू जी...!"
पिता के बारे में उनके अशआर में जो दर्द था, जो मुहब्बत थी, वह बयान से परे है। उन्होंने बताया कि कैसे उनके पिताजी ने शुरुआत में उनके कविता करने का विरोध किया था, लेकिन दरअसल वह विरोध प्यार का ही एक रूप था वो पिता सिर्फ अपने बेटे का भविष्य सुरक्षित देखना चाहते थे। उन्होंने भगवान प्रभु श्रीराम के बारे में कहा कि "राम क्या है? स्वयं में ही गुणधाम है। राम क्या है? विधाता है, निष्काम है। राम का कोई पर्यायवाची नहीं क्योंकि राम जैसे तो केवल प्रभु श्रीराम हैं।"
शिव तांडव स्तोत्रम और समापन
कार्यक्रम के आख़िर में आलोक साहब ने शिव तांडव स्तोत्रम पर अपनी बात रखी। संस्कृत के इस महान स्तोत्र को उन्होंने अपनी ख़ास अंदाज़ में पेश किया। डेढ़ घंटे की इस शानदार प्रस्तुति ने सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया था। पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। आखिर में लोग उठकर खड़े होकर उन्हें स्टैंडिंग ओवेशन दे रहे थे। कभी लोग तालियों से महफ़िल को गुंजा रहे थे, तो कभी पिन ड्रॉप साइलेंस था। कभी आँखों में आंसू थे, तो कभी चेहरे पर मुस्कुराहट। आलोक साहब की आवाज़ में वह कशिश थी कि लोग उनकी हर बात ग़ौर से सुन रहे थे। उनके हर शेर पर, हर जुमले पर लोग वाह-वाह कर रहे थे। यह एक रूहानी तजुर्बा था। हम सभी विद्यार्थी भाग्यशाली हैं कि हमें यह मौक़ा मिला। कुलगुरु महोदय और हमारे विश्वविद्यालय प्रशासन का तहेदिल से शुक्रिया कि उन्होंने साल की शुरुआत में यह नायाब तोहफ़ा दिया।
~ नैवेद्य पुरोहित
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हर नाकामी, और बेइज्जती, हमे और मजबूत बनाती हैं, तभी, जब हम सही राह पर चलते हैं तो......... हमारे पूर्व राष्ट्रपति श्री ए पी जे अब्दुल कलाम आजाद साहब ने कहा है कि सक्सेस से ज्यादा फेलियर की स्टोरी पढ़ना चाहिए, इससे हमें ज्यादा सीखने को मिलेगा। आलोक जी की बात बिल्कुल सही है कि पिता सिर्फ अपने बच्चे का भविष्य सुरक्षित देखना चाहते है ।
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