बॉर्डर 2: देशभक्ति की भावना से सराबोर दिल को छू लेने वाली कहानी
26 जनवरी के दिन देशभक्ति के माहौल में बॉर्डर 2 देखना एक अलग ही अनुभव था। पुरानी बॉर्डर की यादों को समेटे यह फ़िल्म एक बार ज़रूर देखी जा सकती है। फ़िल्म शुरू होने से पहले रानी मुखर्जी की 'मर्दानी 3' और तापसी पन्नू की 'अस्सी' फ़िल्म के ट्रेलर देखे काफ़ी प्रभावशाली लगे।
मौसिक़ी ने छुआ दिल का तार -
फ़िल्म के गाने बेहद ख़ूबसूरत बने हैं। "इश्क़ दा चेहरा हूबहू, सारी ज़िंदगी तैनू तकदा रवां" कौसर मुनीर के बोल और सचेत टंडन-परमपरा टंडन का संगीत कमाल का है और दिलजीत दोसांझ की आवाज़ में यह गाना दिल में उतर जाता है। एक दूसरा गाना "मिट्टी के बेटे" तो रूह को छू लेता है। मिथुन का कंपोज़िशन, मनोज मुंतशिर के लफ़्ज़ और सोनू निगम की आवाज़ तीनों मिलकर एक जादू बुनते हैं। "दिल में वतन रखने वाले, सर पे कफ़न भी रखते थे" यह पंक्तियाँ भी सीधे दिल को छू जाती है।
कहानी: जल, थल और नभ की जंग -
1971 के भारत-पाक युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी यह फ़िल्म सिर्फ़ युद्ध नहीं दिखाती, बल्कि फ़ौजियों के परिवारों की तक़लीफ़ें, उनकी मोहब्बत और क़ुर्बानियाँ भी बयान करती है। "सारी दुनिया के काम हमारे और सितम ये कि हम तुम्हारे" यह डायलॉग सैनिकों की जिंदगी का सार भी बयान करता है।
कुछ दमदार इमोशनल सीन्स -
दिलजीत दोसांझ (निर्मल सिंह) की शहादत के बाद उनकी बहन का वरुण धवन से कहना, "मुझे कुछ नहीं चाहिए आपसे बस मेरे वीर जी को वापस ला दो प्लीज़" यह सीन थिएटर में आपकी आँखें नम कर सकता है। सनी देओल (फ़तेह सिंह) और मोना सिंह के बेटे की शहादत वाला सीन भी दिल चीर देता है। फ़िल्म के अंत में अक्षय खन्ना और सुनील शेट्टी जैसे पुराने बॉर्डर के कलाकारों की झलक आती है जिन्हें देख कर सनी देओल सभी शहीदों को सलाम करते हैं यह पल नॉस्टैल्जिया और गर्व से भर देता है।
कलाकारों की शानदार अदाकारी -
सनी देओल की दमदार मौजूदगी के अलावा वरुण धवन (मेजर होशियार सिंह दहिया) ने अपनी चॉकलेटी बॉय की छवि से बाहर आने की कोशिश करते हुए काफी अच्छी मैच्योर परफ़ॉर्मेंस दी है। दिलजीत दोसांझ के सीन्स भी ज़बरदस्त रहे। अहान शेट्टी ने भी कुछ सीन्स में अच्छा इम्प्रेशन छोड़ा। मोना सिंह, मेधा राणा, सोनम बाजवा सहित सभी कलाकारों ने अपने किरदार सही ढंग से निभाए।
आख़िरी बात -
पुरानी बॉर्डर की तुलना में यह उतनी क्लासिक नहीं बन पाई लेकिन फिर भी देशभक्ति की भावना, मनोरंजन और भावनात्मक गहराई के साथ यह फ़िल्म ज़रूर देखने योग्य है। पुरानी बॉर्डर के नाम पर एक बार तो देखना बनती है। प्रख्यात फिल्म समीक्षक वरिष्ठ पत्रकार डॉ प्रकाश हिन्दुस्तानी के शब्दों में कहे तो, "यह बॉर्डर ज़्यादा ब्रॉडर है!"
~ नैवेद्य पुरोहित
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सारी दुनिया के काम हमारे उस पर सितम ये की हम तुम्हारे......= वास्तव में बहुत गहराई है इस लाइन में....
ReplyDeleteअच्छी फिल्म समीक्षा लिखी हैं.... नैवेद्य