डॉ प्रकाश हिन्दुस्तानी से एक सार्थक संवाद!

आज जन्मदिन के एक दिन पहले, मुझे हिंदी वेब पत्रकारिता के अग्रदूत वरिष्ठ पत्रकार डॉ. प्रकाश हिंदुस्तानी से उनके निवास स्कीम नंबर 54, विजय नगर इंदौर पर मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यह मुलाकात मेरे लिए सिर्फ एक भेंट नहीं, बल्कि लगभग दो घंटे का ऐसा सार्थक संवाद हो गई जिसने मेरे दृष्टिकोण को और अधिक स्पष्टता दी। उन्होंने नईदुनिया, धर्मयुग, नवभारत टाइम्स, दैनिक भास्कर में विभिन्न पदों पर कार्य किया। वे आठ वर्षों तक नवभारत टाइम्स के संडे संस्करण के संपादक रहे। दुनिया के पहले हिंदी पोर्टल वेबदुनिया डॉट कॉम के संस्थापक संपादक रहे। वे हिंदी इंटरनेट पत्रकारिता में पीएचडी करने वाले पहले पत्रकार हैं। उनका आग्रह था कि जब भी इंदौर आओ, अवश्य मिलना और आज शाम लगभग 4:45 बजे से लेकर 6:45 तक चला यह संवाद कब बीत गया, इसका एहसास ही नहीं हुआ। इस दौरान उनके यहाँ मयंक अग्रवाल से भी भेंट हुई। मेरे सभी प्रश्नों का उन्होंने अत्यंत धैर्य, सहजता और बड़े इत्मीनान से उत्तर दिया। हमारी बातचीत पत्रकारिता के भविष्य, मीडिया की वर्तमान स्थिति, अखबारों में विज्ञापन के आंकड़ों और भारतीय प्रिंट मीडिया के बाज़ार की रणनीतियों पर केंद्रित रही। उन्होंने विस्तार से बताया कि कैसे टाइम्स समूह ने मार्केट लीडर बनने के लिए अपनी रणनीतिक सोच, मार्केटिंग की ताकत और साहसिक निर्णयों का उपयोग किया। उन्होंने समझाया कि मार्केट लीडर होने का अर्थ केवल लोकप्रियता नहीं, बल्कि विज्ञापन के बाज़ार पर नियंत्रण भी है। टाइम्स समूह के मार्केटिंग विभाग ने कैसे अपनी लाइन बड़ी करके दूसरों की लाइन छोटी की थी। मार्केट लीडर होने के नाते जो रेट टाइम्स समूह तय करता था कंपनियों को उसी रेट पर विज्ञापन देना पड़ता था क्योंकि सबसे अधिक प्रसार संख्या टाइम्स समूह की थी। इस कारण बड़ी कंपनियों की विज्ञापन पर व्यय क्षमता टाइम्स ग्रुप को देने में ही निकल जाती थी और दूसरे मीडिया समूहों का नंबर भी नहीं आ पाता था। इसी सिद्धांत ने इंडियन एक्सप्रेस जैसे कई दिग्गज अखबारों को विज्ञापन के क्षेत्र में टाइम्स के मुकाबले बहुत पीछे कर दिया था।
टाइम्स समूह के प्रमुख समीर जैन के एक प्रसंग को भी उन्होंने साझा किया जब उनके पुत्र के निधन की सूचना उन्हें मुंबई में बोर्ड मीटिंग के दौरान मिली। दरअसल उनके पुत्र का निधन विदेश में मछली खाते समय मछली का कांटा गले में अटकने के कारण हो गई थी। मालिक के बेटे की मौत की यह मनहूस खबर अब कौन देगा। फिर तय हुआ कि मैनेजर उन्हें एक पर्ची पर लिखकर बताएगा। मीटिंग के बीच में जब मैनेजर ने उन्हें चिट्ठी हाथ में सौंपी तब कुछ क्षण स्तब्ध रहने के बाद समीर जैन ने उस चिट्ठी को अपनी जेब में रखा और पूरी बैठक समाप्त करने के बाद ही निकले। 3 बजे की मीटिंग थी और 5 बजे समीर जैन की दिल्ली के लिए फ्लाइट थी। यह प्रसंग दो विपरीत दृष्टिकोणों से देखा जा सकता है एक ओर अत्यधिक असंवेदनशीलता या दूसरी ओर अपने दायित्वों के प्रति दृढ़ निष्ठा। अपने काम के लिए प्रतिबद्धता क्योंकि जो हो गया सो हो गया। विधि के विधान को बदला तो नहीं जा सकता। डॉ. हिंदुस्तानी ने यह भी बताया कि समीर जैन अख़बार और पत्रिका को हमेशा एक "प्रोडक्ट" मानते थे। धर्मयुग पत्रिका के प्रकाशन बंद होने के कारणों पर भी हमने चर्चा की। उन्होंने स्वीकार किया कि मीडिया में हुए अधिकांश नवाचार चाहे वह तकनीकी हो, मेट्रो सप्लीमेंट्स, पुलआउट्स, यहां तक की मीडिया में पेड न्यूज़ चलन इन सभी की शुरुआत टाइम्स समूह ने ही की। बाद में कई संस्थानों, विशेष रूप से भास्कर समूह ने उन्हीं रणनीतियों को अपनाया। आखिर में उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात कहीं, कि जिन लोगों ने पत्रकारिता को अपना मुख्य पेशा बनाया वे अक्सर घाटे में रहें। जबकि जिन्होंने इसे साइड प्रोफ़ेशन की तरह अपनाया, वे प्रायः लाभ की स्थिति में रहे। कुल मिलाकर, आज उनके साथ हुए इस सार्थक एवं ज्ञानवर्धक संवाद ने न केवल मेरी समझ को विस्तृत किया, बल्कि मीडिया उद्योग के कई पहलुओं को स्पष्ट भी किया। उनकी बातों ने मेरे भीतर सीखने की नई ऊर्जा भी उत्पन्न की। ईश्वर से प्रार्थना है कि डॉ. प्रकाश हिंदुस्तानी सदैव स्वस्थ, प्रसन्न और सक्रिय रहें। उनका स्नेह और आशीर्वाद मुझ पर यूँ ही बना रहे। आने वाले समय में उनसे और भी सीखने का अवसर प्राप्त होता रहे यही विनम्र कामना है। ~ नैवेद्य पुरोहित #डॉ_प्रकाश_हिंदुस्तानी #वेब_पत्रकारिता #टाइम्स_समूह #भास्कर_समूह #पत्रकारिता #मीडिया

Comments

  1. बढ़िया...लिखते रहें। आगे बढ़ते रहें। सार्थक संवाद ज्ञान की खिड़कियां खोलने में मददगार साबित होते हैं।

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