ज्ञानतीर्थ में आत्मीय मिलन: सप्रे संग्रहालय ने मेरे परदादाजी की विरासत से कराया साक्षात्कार!
(नैवेद्य पुरोहित)
कुछ पल ऐसे आते है जो अतीत और वर्तमान का मिलन होता है...कुछ अधूरी खोजों को पूर्णता मिलती है...और कभी-कभी, अतीत की किसी धूल जमी पगडंडी पर चलते-चलते, आपको अपने ही वंशवृक्ष की जड़ों से मिलवा देती है।
आज मेरे साथ कुछ ऐसा ही भोपाल के माधवराव सप्रे स्मृति समाचारपत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान में हुआ। इस संस्थान के बारे में बहुत सुना था, लेकिन जब अपने मित्र हर्ष कर्णवाल के साथ वहां पहुँचा, तो महसूस हुआ कि ये जगह केवल एक संग्रहालय नहीं, बल्कि सचमुच ज्ञानतीर्थ है। और मेरे लिए तो आज ये तीर्थ सिर्फ ज्ञान का नहीं, भावनाओं का, स्मृतियों का और अपने वंश से जुड़े इतिहास का भी बन गया।
सप्रे संग्रहालय : एक चेतना का तीर्थ
साल 1984 में स्थापित हुआ ये संस्थान सिर्फ किताबों और अखबारों का ढेर नहीं है...यहाँ वो स्याही महकती है जिससे इतिहास रचा गया। वो पन्ने सहेजे गए हैं जो समय की आँधियों में बिखर सकते थे। हर दीवार, हर रैक, हर दस्तावेज़ जैसे मुझसे कुछ कह रहे थे... "तुम यहाँ सिर्फ जानने नहीं, 'खोजने' आए हो।" जैसे ही हमने प्रवेश किया, सौभाग्य से मुलाकात हुई इस संस्थान के संस्थापक और वरिष्ठ पत्रकार पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर जी से उनका स्नेहिल आशीर्वाद मिला। उनकी पुस्तक "भारतीय पत्रकारिता कोश – भाग 2" के पृष्ठ संख्या 851 पर मेरे परदादाजी स्व. गणेशचन्द्र जी पुरोहित का उल्लेख भी है। एक सिहरन-सी दौड़ गई पूरे शरीर में...अपने पुरखों का नाम इतिहास में दर्ज देखना एक चौथी पीढ़ी के पत्रकार के लिए इससे बड़ा सौभाग्य क्या हो सकता है?
वो पल, जब बीते हुए कल की आहट सुनाई दी!
मैंने संग्रहालय की प्रभारी डॉ मंगला शर्मा मैडम से पूछा कि क्या उनके पास मेरे परदादाजी द्वारा प्रकाशित दैनिक सांध्यकालीन 'टाइम्स ऑफ इन्दौर', साप्ताहिक 'लड़खड़ाती दुनिया' या मासिक 'पालीवाल' पत्रिका की कोई प्रति मौजूद है? तो उन्होंने रजिस्टर में देखा…और फिर एक मुस्कान के साथ बताया – "लड़खड़ाती दुनिया और टाइम्स ऑफ इन्दौर तो हमारे पास नहीं है, लेकिन पालीवाल मासिक पत्रिका के कुछ अंक ज़रूर हैं। कुछ समय पहले आगरा के चिरंजीवी पालीवाल जी ने ये पुरानी पत्रिकाएं संग्रहालय को भेजी थीं।"
फिर उन्होंने मुझे वो पांच अंक दिखाएं –
मार्च 1957, अप्रैल 1957, सितम्बर 1958, अक्टूबर 1958 और मार्च 1961...उस वक्त मेरे हाथ कांप रहे थे मेरे लिए ये सिर्फ कागज़ के पन्ने नहीं थे। ये मेरे परदादाजी की आत्मा की स्याही से लिखे हुए शब्द थे। जब मैंने उन्हें छुआ, पढ़ा…मेरे लिए बेहद गर्व करने वाला पल था और फिर जैसे वक़्त की परतों से निकलकर वो मेरे सामने खड़े हो गए।
जब मेरी आंखों में पूरा इतिहास उतर आया!
उनके लेख पढ़ते हुए एहसास हुआ कि कैसे सत्तर साल पहले भी वो समाज की बुराइयों से लड़ रहे थे, रूढ़ियों को तोड़ने का साहस कर रहे थे। उनकी लेखनी में आग थी, लेकिन शब्दों में मर्यादा भी थी। वो निडर थे, लेकिन संयमी भी। उस जमाने में उनके विरुद्ध कोर्ट-कचहरी में मुकदमे चले उसका भी उन्होंने डटकर मुकाबला किया। यह कोई साधारण बात नहीं, एक निर्भीक और स्पष्टवादी पत्रकारिता का प्रतीक है। आज से पहले मेरे पास केवल 1970 का एक अंक था, जो उनके निधन से पहले का था। अब मेरे पास पालीवाल मासिक पत्रिका के छह अनमोल अंक हैं। यह मेरी पत्रकारिता की विरासत ही नहीं, बल्कि मेरे खून में बहता आत्मबल है।
ज्ञान का महासागर, भावनाओं का तूफ़ान
सप्रे संग्रहालय ने न केवल मेरा अतीत लौटा दिया, बल्कि यह भी दिखाया कि एक पत्रकार क्या होता है — समाज का प्रहरी, सच्चाई का लेखक और भावी पीढ़ियों का मार्गदर्शक। यहाँ पर मौजूद पाँच करोड़ से भी अधिक पृष्ठों की सामग्री, 1.66 लाख पुस्तकें, हजारों पत्रिकाएं और 1200+ शोधार्थियों का विश्वास इस संस्थान को असाधारण बनाता है। यहाँ पर 15 अगस्त 1947 के दिन के देशभर के समाचारपत्र भी सुरक्षित रखे हैं। इतिहास को महसूस करना हो, तो आपको यहाँ आना होगा...पढ़ना नहीं, उसे जीना होगा।
एक विनम्र आग्रह…जब भी भोपाल जाएं, तो एक बार सप्रे संग्रहालय जरूर जाएं।
यह केवल किताबों की जगह नहीं, यह संवेदना की पाठशाला है, जहाँ शायद आपको भी किसी पन्ने पर अपने ही किसी पुरखे की आवाज़ सुनाई दे जाए। बहुत बहुत धन्यवाद, सप्रे संग्रहालय...इस स्थान ने मेरे लिए सिर्फ इतिहास नहीं, मेरी पारिवारिक आत्मा लौटा दी।
अगर आपके पास भी किसी पूर्वज की कोई कृति, अखबार या पत्रिका हो, जो समय के हवाले हो रही हो…तो उसे सहेजने के लिए इस ज्ञानतीर्थ तक जरूर पहुँचाएं।
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एक खोजी पत्रकार के लिए ज्यादा जरूरी होता हैं कि वह अपना इतिहास को जाने, खोजे, और समझे......।
ReplyDeleteतुम में वो आग है, जूनून है जो अच्छे पत्रकार में होना चाहिए,अपने परदादा जी की विरासत को आगे बढ़ाओ।
और अपना नाम समाज शहर देश विदेश में रोशन करो।