पालीवाल ब्राह्मण समाज इन्दौर के प्रथम पत्रकार स्वर्गीय गणेशचन्द्र पुरोहित की 55वीं पुण्यतिथि पर कोटि कोटि नमन!

मैं अंश तुम्हारे वंश का हूं , ये हस्ती ये नाम तुम्हई से है !
(नैवेद्य पुरोहित) जुलाई महीने की 10 तारीख़ मेरे लिए एक साधारण दिन नहीं है। ये दिन मुझे उस चेहरे की याद दिलाता है जिसे मैंने कभी देखा नहीं, उस आवाज़ की याद जो मेरे कानों तक कभी नहीं पहुँची, लेकिन उनकी तस्वीर में से उनकी निगाहों के नीचे मैं हमेशा पलता रहा हूं...! उनकी उपस्थिति कुछ ऐसी है जिसे मैं गहराई से महसूस करता हूँ। ऐसा लगता है कि उनकी उपस्थिति मुझे एक ऐसे तरीके से जोड़ती है जो समय और स्थान से परे है। मेरे आस-पास का हर कोना उनकी उपस्थिति की याद दिलाता है, मुझे उनकी विरासत की याद दिलाता है। यह कुछ ऐसा है जिसे मैं अपनी आत्मा के सबसे गहरे हिस्से में महसूस कर सकता हूँ। कभी-कभी, मैं अपनी आँखें बंद करता हूँ और कल्पना करता हूँ कि उनकी आवाज़ कैसी थी। मैं उन्हें अपने पास खड़े हुए कल्पना करता हूँ उनका हाथ थामे हुए जो मुझे ताकत और ज्ञान प्रदान कर रहा है। मैं कभी भी व्यक्तिगत रूप से उनसे नहीं मिला, लेकिन उनकी आत्मा जो अजर अमर है वह मुझे जीवन की यात्रा में आज भी मार्गदर्शन दे रही है। मेरे परदादाजी स्वर्गीय गणेशचन्द्र पुरोहित की इस वर्ष 55वीं पुण्यतिथि है। पालीवाल ब्राह्मण समाज इंदौर के प्रथम पत्रकार, निर्भीक विचारक, और एक जीवंत व्यक्तित्व के धनी मेरे परदादाजी का जीवन जितना प्रेरणादायक था, उतना ही रहस्यमयी भी...! परिवार के बुज़ुर्ग बताते हैं कि वे शुरू से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा से प्रभावित थे। सन 1947 का वो दौर जब देश का बँटवारा हुआ, चारों ओर दंगे भड़क उठे। हिंदू-मुस्लिम तनाव अपने चरम पर था, और संघ से जुड़े लोगों को ढूंढने के लिए पुलिस उनके घर तक पहुँच गई थी। ऐसे भयावह समय में, उन्हें नाथद्वारा के पहले नौगामा नामक गाँव में उनके मामा के घर भेजा गया था। यह निर्णय सिर्फ सुरक्षा का नहीं, बल्कि एक विचारशील व्यक्ति के भविष्य को बचाने का प्रयास था।
उनका व्यक्तित्व सचमुच दुर्लभ था। एक ओर जहाँ वे संघ की राष्ट्रवादी विचारधारा से प्रभावित थे, वहीं दूसरी ओर उनके मित्रों की सूची में विभिन्न दलों के दिग्गज राजनेता शामिल थे। राजस्थान के यशस्वी मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया, जिन्होंने 17 साल लगातार शासन किया उनके साथ मेरे परदादाजी की कई तस्वीरें आज भी हमारे घर में मौजूद हैं। केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि वैचारिक स्तर पर भी उनके सभी लोगों के साथ रिश्ते मजबूत और व्यापक थे। वे सिर्फ़ विचारों से तेज़ नहीं, बल्कि शरीर से भी उतने ही सक्षम थे। तलवार चलाना और अखाड़ों के दांव-पेंच दिखाना उनके लिए आम बात थी। हमारे परिवार की वरिष्ठ कमला बुआजी मुस्कुराते हुए बताती हैं, "उनके पास एक बड़ा बाँस हुआ करता था वे उसे ज़मीन पर टिका कर उस पर ऐसे छलांग लगाते जैसे कोई बंदर किसी शाखा पर लपक जाए। हँसते, खेलते, करतब दिखाते हुए हम बच्चों के लिए वे एक करिश्माई नायक थे।"
जब बात पत्रकारिता की आती थी, तो उनकी कलम तलवार से भी तेज़ हो जाती थी। वर्ष 1955 में उन्होंने पालीवाल मासिक पत्रिका की शुरुआत की जो रॉयल प्रिंटर्स जवाहर मार्ग इंदौर से मुद्रित होती थी। इसके कुछ सालों बाद उन्होंने दैनिक सांध्यकालीन समाचार पत्र के तौर पर टाइम्स ऑफ इंदौर की नींव रखी, जिसे 1970 में उनके असामयिक निधन के बाद मेरे दादाजी ने 1986 में फिर से शुरू किया और आज भी साप्ताहिक समाचार पत्र के रूप में जारी है। बीच में उन्होंने लड़खड़ाती दुनिया नामक साप्ताहिक अख़बार भी चलाया। इन सभी पत्र-पत्रिकाओं के ज़रिए उन्होंने समाज को चेतना, जागरूकता और विचारों की गहराई दी। कभी-कभी जब मैं घर में रखी परदादाजी की उन पुरानी तस्‍वीरों को देखता हूं, उनकी तस्वीरों में उनकी आंखों की चमक, उनके चेहरे की दृढ़ता और मुस्कान की गहराई मुझे बहुत कुछ सिखा जाती है। वो सिर्फ़ मेरे परदादाजी नहीं है वो मेरे विचारों की भी नींव हैं, वो मेरे खून में बहता हुआ आत्मबल हैं!
उनकी जिंदगी ने मुझे सिखाया कि सच्चा नेतृत्व नारे नहीं लगाता, एक उदाहरण पेश करता है। उनकी कलम ने बताया कि सत्य केवल बोला और लिखा नहीं जाता उसे तो जिया भी जाता है। और उनके साहस ने यह समझाया कि विचारों के लिए खड़े होने की एक कीमत चुकानी पड़ती है लेकिन उसका असर पीढ़ियों बाद तक रहता है। आज, जब मैं पत्रकारिता के पथ पर उनके पदचिह्नों पर चलने की कोशिश करता हूं, तो मन कह उठता है:- "तुम कहीं नहीं गए परदादाजी, तुम तो मेरी रगों में हो, हर विचार में, हर शब्द में, हर उस निर्णय में, जहां सही को चुनना होता है।" आपका यह चौथी पीढ़ी का पौत्र, आपको शत् शत् नमन करता है।💐🙏🏼

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