शुरुआत से अंत तक: आंगन ओल्ड एज होम में हमारी एनएसएस यात्रा!
(नैवेद्य पुरोहित)
25 फरवरी 2023...तारीख़ अब भी ज़हन में जस की तस बसी हुई है। एक फर्स्ट ईयर के छात्र के रूप में एनएसएस सदस्य होने के नाते मैं आंगन एल्डरली होम, सेक्टर 105, नोएडा में ओल्ड एज होम विजिट के तौर पर गए थे। उस वक़्त चिराग पाहूजा भैया अध्यक्ष थे। पहली बार जब मैं वहाँ गया तो बस एक मासूम जिज्ञासा थी, एक भाव था बुजुर्गों से मिलने का। फिर उसी साल 22 अप्रैल 2023 में हम फिर से वहाँ लौटे...हर बार और करीब आते गए वहां रह रहे सभी बुजुर्गों से, उनकी अधूरी कहानियों से...उसके बाद वाले सत्र में वंश गुप्ता भैया के अध्यक्षीय काल में 24 अप्रैल 2024 को हम एक बार फिर वहाँ पहुँचे। इस बार हमने एक डॉक्युमेंट्री भी शूट की थी जिसमें उन बुजुर्गों की दुखभरी कहानियां सुनी, जिनके बच्चे अभी विदेशों में नौकरी कर रहे हैं...और किसी की माँ किसी के पिता अकेलेपन के इस "आंगन" में अपने आख़िरी दिन गिन रहे हैं। वो कहानियाँ चुभती थीं, रुलाती थीं, सवाल करती थीं।
इस बार 2025 में आंचल मित्तल दीदी की अध्यक्षता में, हमारा इस बार कार्यकाल वहीं समाप्त हुआ जहां से सब शुरू हुआ था। हर बार की तरह हमने गाना गाया, बुजुर्गों के साथ मिलकर नाचे, खेले कूदे, शेरो-शायरी का मजा लिया। पर उससे भी खास था हमारे ऑपरेशन्स हेड, नमन गर्ग का जन्मदिन और हमारी फैकल्टी डॉ. सीमा श्रीवास्तव मैम का जन्मदिन भी वहीं मनाया गया। सीमा मैम की तरफ से सभी के लिए लंच की व्यवस्था थी। वहाँ सिर्फ बुजुर्ग ही नहीं थे — वहाँ काम करने वाले कर्मचारियों के छोटे बच्चे भी थे, जिनके साथ हमने खेला, हँसे — जैसे सब कुछ सामान्य हो।
पर सबकुछ इतना भी सामान्य नहीं था...
जब हम वहाँ से जाने लगे, तभी कुछ ऐसा हुआ जिसने हम सबका दिल तोड़ दिया। एक बुज़ुर्ग महिला को उनके परिवार वाले छोड़ने आए थे... शायद उनकी ज़िंदगी का पहला दिन था उस "आंगन" में...और वो चीज़ उनके चेहरे से हावभाव से दिख रही थी...वो बिलख-बिलख कर रो भी रही थीं। छटपटा रही थीं अपने बच्चों के पीछे जाने के लिए। जब उनके बच्चे सीढ़ियाँ उतर रहे थे, वो माँ उनके पीछे दौड़ीं, शायद आख़िरी बार पकड़ना चाह रही थीं वो रिश्ता, जो पहले ही कब से मर चुका था।
हम बच्चों ने वहां पहली बार जीवन में ऐसा मंज़र अपनी आँखों से देखा...कलेजा कांप गया। पर जो चीज़ सबसे ज़्यादा चुभी वो ये कि उन बच्चों के चेहरे पर ना कोई शिकन थी, ना कोई पछतावा, ना कोई शर्म। ऐसा लगा जैसे पत्थर चल रहे हों, इंसान नहीं...आश्चर्य नहीं होता कि ऐसे लोगों को समाज "जानवर" कहता है लेकिन जानवर भी अपनी माँ को यूँ बेसहारा नहीं छोड़ते।
आख़िर क्यों करते हैं लोग ऐसा? क्या काम, पैसा, प्रतिष्ठा सब इतना ज़रूरी हो गया है कि हमें वो आँखें नहीं दिखतीं, जो कभी हमारे लिए जागती थीं? वो हाथ नहीं दिखते जो बचपन में हमारी थाली सजाया करते थे? वो थपकी नहीं याद जो हमें रातों में सुलाया करती थी...? वहां के ओल्ड एज होम स्टाफ ने उस बूढ़ी माँ को जैसे-तैसे संभाला...और हम वहाँ से जल्दी निकल गए। उस माँ का वह बर्बस चेहरा दिलो-दिमाग पर हमेशा के लिए छप गया!
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नैवेद्य बेटा , तुम करुणा से भरे बहुत नेक , अच्छे दिल वाले, युवा हो। तुम्हारी भावनाओं की जितनी तारीफ करी जाए कम है,तुम्हारा निस्वार्थ प्रेम,उन बुजुर्गों के लिए, ये दर्शाता हैं कि तुम्हारी परवरिश अच्छी हुई हैं। तुम्हारी लेखनी की, जितनी तारीफ करी जाए कम है तुम्हारे हर ब्लॉग में एक ताजगी लगती हैं हर लेख तुम्हारा सच्चा लगता हैं, और सच्चा है। उन बुजुर्गों के बच्चे क्षमा योग्य नहीं हैं। तुम्हारी बात से सहमत हु कि जानवर भी अपने अपनो को ऐसे नहीं छोड़ते है।
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