सच की तस्वीर: दानिश सिद्दीकी की विरासत और स्वतंत्र पत्रकारिता की अग्निपरीक्षा!

(लेखक - नैवेद्य पुरोहित)
जब सच को शब्दों से नहीं, तस्वीरों से बयान करना हो तब पत्रकारिता में दानिश सिद्दीकी जैसा नाम सामने आता है। उनकी शहादत सिर्फ एक पत्रकार की मृत्यु नहीं थी, वह एक विचार, एक दृष्टिकोण, और ‘ग्राउंड जीरो’ पत्रकारिता का प्रतीक थी। ऐसे समय में जब भारतीय मीडिया संस्थान टीआरपी की होड़ में खबरों की आत्मा को बेच चुके हैं, दानिश सिद्दीकी की यादें और उनके नाम पर उनके परिजनों द्वारा स्थापित दानिश सिद्दीकी फाउंडेशन एक जरूरी हस्तक्षेप बनकर सामने आए हैं।
दानिश सिद्दीकी कौन थे? फोटोग्राफी के लिए पुलित्जर पुरस्कार जीतने वाले पहले भारतीय दानिश सिद्दीकी थे। अदनान आबिदी के साथ 2018 में विश्व की सबसे बड़ी समाचार एजेंसी रॉयटर्स के लिए काम करते हुए रोहिंग्या शरणार्थी संकट की कवरेज के लिए पुरस्कार जीता था। उन्होंने अफगानिस्तान युद्ध, रोहिंग्या संकट, दिल्ली दंगे, और कोविड-19 जैसी घटनाओं को कैमरे के माध्यम से विश्व के सामने लाकर न केवल पत्रकारिता की परिभाषा को विस्तृत किया, बल्कि पत्रकार की जोखिम भरी भूमिका को उजागर किया। जुलाई 2021 में कंधार में तालिबान के साथ संघर्ष के दौरान उनकी हत्या हो गई लेकिन उनकी तस्वीरें आज भी चीख-चीखकर सच कहती हैं।
दानिश सिद्दीकी फाउंडेशन: उद्देश्य और सरोकार दानिश की विरासत को सहेजने के उद्देश्य से स्थापित दानिश सिद्दीकी फाउंडेशन एक स्वतंत्र गैर-लाभकारी संस्था है जो युवा पत्रकारों को प्रशिक्षण, संरक्षण और प्रेरणा देने का कार्य करती है। फाउंडेशन पत्रकारों की सुरक्षा, ग्राउंड रिपोर्टिंग के महत्व, मीडिया में विविधता और पत्रकारिता की नैतिकता जैसे मुद्दों पर लगातार संवाद आयोजित करता है।
पहला दानिश सिद्दीकी पत्रकारिता पुरस्कार समारोह: एक विचारशील पहल दिनांक 4 मई 2025 को नई दिल्ली में आयोजित Danish Siddiqui Journalism Awards: Honouring Impactful Journalism का उद्घाटन समारोह अपने आप में एक ऐतिहासिक क्षण था। इसमें भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस. वाय. क़ुरैशी, वरिष्ठ पत्रकार रविश कुमार, राजदीप सरदेसाई, बीबीसी के संजय मजूमदार, द क्विंट की रितु कपूर और फाउंडेशन के अन्य पदाधिकारी उपस्थित रहे। समारोह में यह विचार उभरकर सामने आया कि "अच्छी पत्रकारिता पुरस्कारों से अधिक जरूरी है।" पुरस्कार केवल प्रतीक हैं, पर पत्रकारिता जनता के साथ संवाद है।
मुख्य वक्तव्य और चर्चा के बिंदु * राजदीप सरदेसाई ने कहा कि आज पत्रकार स्टूडियो में बैठकर शोर मचाने वाले बन गए हैं, जबकि दानिश जैसे पत्रकार मैदान में उतर कर सच के करीब जाते हैं। "TV is in a cage, journalism is not." * एस. वाय. क़ुरैशी ने आपातकाल के दौरान अपनी 'डायरेक्टर ऑफ़ पब्लिक रिलेशंस' की भूमिका को याद करते हुए कहा कि इमरजेंसी के समय सेंसरशिप करना मेरी मजबूरी थी, मन नहीं। उन्होंने कहा कि "हमारी सबसे बड़ी लोकतांत्रिक ताकत, मीडिया, अब अपनी साख वास्तव में खो चुकी है।" * रितु कपूर ने कहा कि आज के छात्र पत्रकार नहीं, ‘इन्फ्लुएंसर’ बनना चाहते हैं क्योंकि आर्थिक मॉडल पत्रकारिता को नहीं, लोकप्रियता को इनाम देता है। उन्होंने "खबर लहरिया" जैसे साहसी प्लेटफॉर्म्स का उदाहरण देते हुए कहा कि हमें फिर से ग्राउंड स्टोरीज़ की ओर लौटना होगा। जनता जो चाहती है वह न दिखाकर वास्तव में जो ज़रूरी है वह दिखाना चाहिए। * संजय मजूमदार ने इस बात पर ज़ोर दिया कि छोटे शहरों और युवाओं में अब भी पत्रकारिता के लिए उत्साह है, पर उन्हें संसाधन और मंच चाहिए। जिन पांच लोगों को यह अवॉर्ड मिला पांचों महिलाएं है। यह इस बात का प्रमाण है कि इस देश में आज पत्रकारिता जैसे जोखिम भरे क्षेत्र में जो एक समय सिर्फ पुरुष प्रधान क्षेत्र ही हुआ करता था वहां युवा महिला पत्रकारों अपना परचम लहरा रही हैं। वर्तमान में ऐसी महिला संवाददाताएं भी है जो वॉर ज़ोन में फ्रंटलाइन पर जाकर भी रिपोर्टिंग कर रही है। बहरहाल, दानिश सिद्दीकी फाउंडेशन की तरफ से मेघना बाली, (ऑस्ट्रेलियन ब्रॉडकास्ट कॉरपोरेशन) सर्वप्रिया सांगवान (बीबीसी), सौम्या खंडेलवाल (न्यूयॉर्क टाइम्स), ग्रीष्मा कुत्तर, (द कारवां) और वैष्णवी राठौर (द स्क्रॉल) को अवॉर्ड दिया गया।
पत्रकारिता का वर्तमान संकट और भविष्य इस आयोजन में यह तथ्य बार-बार सामने आया कि आज पत्रकारों से अधिक मालिक बिक चुके हैं। "The fourth pillar has become the fifth column of democracy." मीडिया अब सत्ता और बाजार के दोहरे दबाव में है — टीआरपी, अल्गोरिद्म, और बाजार इसे चला रहे हैं। लेकिन फिर भी, लल्लनटॉप जैसे प्लेटफॉर्म, खब़र लहरिया जैसी संस्थाएं और स्वतंत्र पत्रकारों के छोटे प्रयास आज भी उम्मीद की लौ जला रहे हैं।
निष्कर्ष दानिश सिद्दीकी केवल एक फोटो जर्नलिस्ट नहीं थे - वे एक दृष्टि थे। उनकी मौत एक त्रासदी थी, पर उनकी विरासत एक क्रांति बन सकती है, बशर्ते हम स्वतंत्र पत्रकारिता के मूल्यों को पुनः स्थापित करें। Danish Siddiqui Foundation का यह प्रयास इस दिशा में एक बड़ा कदम है — जिसमें पत्रकारिता को फिर से जन-जन से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। आज जब यह प्रश्न उठता है कि क्या स्वतंत्र पत्रकारिता जीवित है? तो जवाब है - हां, लेकिन उसे आपकी हिस्सेदारी चाहिए! #दानिश_सिद्दीकी #दानिश_सिद्दीकी_फाउंडेशन #स्वतंत्र_पत्रकारिता

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