कॉलेज लाइफ की सबसे मूल्यवान याद - आर्ट ऑफ लिविंग YES!+ और सहज समाधि ध्यान योग वर्कशॉप!
लेखक - नैवेद्य पुरोहित
कभी-कभी ज़िन्दगी हमें ऐसे लम्हे देती है जो सिर्फ यादें नहीं बनती बल्कि हमारी आत्मा का एक हिस्सा बन जाते हैं। अप्रैल 2025 का दूसरा सप्ताह मेरे जीवन का ऐसा ही एक अध्याय रहा। 8 अप्रैल से 13 अप्रैल तक, बेनेट यूनिवर्सिटी में जब तीसरी बार आर्ट ऑफ लिविंग की YES!+ वर्कशॉप आयोजित हुई, तब मुझे एहसास हुआ कि कैसे एक 'बीज' जिसे हमने सालभर पहले बड़ी मेहनत से बोया था आज एक हरे भरे पेड़ में बदलता हुआ दिखाई दे रहा है।
यह वर्कशॉप मेरे लिए पहले से अलग और खास थी क्योंकि बेनेट यूनिवर्सिटी के एक छात्र के रूप में यह मेरी आखिरी वर्कशॉप थी। कॉलेज लाइफ खत्म होने में सिर्फ डेढ़ महीना बचा है और मेरी इंटर्नशिप चल रही है जाते-जाते इस कोर्स ने मुझे एक बार फिर वह सौगात दी जो शब्दों में बयां कर पाना आसान नहीं है। 2024 में जब पहली बार अप्रैल में यह वर्कशॉप हुई थी, तो हम सिर्फ 30 प्रतिभागी थे। फिर नवंबर में जब संख्या 60 के करीब पहुंची, तो एक उम्मीद जागी थी कि "अब यह कारवां रुकेगा नहीं।" और इस बार हमने वो कर दिखाया। कुल 105 प्रतिभागी! हॉस्टल वॉर्डन्स से लेकर पीएचडी स्कॉलर तक, यूजी-पीजी स्टूडेंट्स से लेकर बाहर से आए प्रतिभागियों तक हर कोई इस वर्कशॉप का हिस्सा बना।
ये संख्या केवल आँकड़ा नहीं थी ये था विश्वास। वो विश्वास जो हमारी टीम ने इस यात्रा में एक-एक कदम पर महसूस किया। वंश गुप्ता, अदिति शर्मा, नितिन अमन के साथ उस समय की हमारी टीम जिन्होंने इस पौधे को रोपा...फिर साहिल अरोरा, अर्थ सक्सेना, रिवितिका गुप्ता, अनन्या गुप्ता, वैभव गुप्ता, स्नेहा पांडे, वासुर कानूनगो, लखन गुप्ता, रिया पंवार और अन्य समर्पित वॉलंटियर्स ने इस पौधे को हर दिन अपना समय निकाल कर पानी दिया। यूनिवर्सिटी के मैनेजमेंट में बैठे लोगों का भी बहुत- बहुत धन्यवाद जिन्होंने इस वर्कशॉप को सफल बनाया।
पहली बार सहज समाधि ध्यान योग कोर्स: आत्मा की गहराइयों तक शांति
इस बार एक खूबसूरत अध्याय और जुड़ा सहज समाधि ध्यान योग। यह पहली बार था जब टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप की बेनेट यूनिवर्सिटी में YES!+ के साथ-साथ यह सहज समाधि ध्यान योग कोर्स भी आयोजित किया गया। YES!+ के विपरीत इस कोर्स को सिर्फ सीमित प्रतिभागी ही कर सकते है। मैंने और कुछ समर्पित वॉलंटियर्स ने जब इसमें रजिस्टर किया और इसे अनुभव किया, तो हमें समझ आया कि शांति केवल एक शब्द नहीं, बल्कि एक अहसास है जिसे आप महसूस करते हैं, भीतर तक। सहज कोर्स ने मुझे और ज्यादा स्थिर, फोकस्ड बनाया। भागम भाग ज़िंदगी से परे हटकर मेडिटेशन की उस गहराई में उतरकर लगा मानो सबकुछ ठहर सा गया है और उस ठहराव में जो शांति है, वह सबसे अमूल्य है।
इस 6 दिवसीय वर्कशॉप का हर दिन किसी सुंदर आध्यात्मिक यात्रा की तरह था। 'सुदर्शन क्रिया' की शक्ति ने फिर एक बार अंतर्मन छू लिया। कई चेहरों पर जो थकावट, असमंजस और उलझन हमने पहले दिन देखी थी, आखिरी दिन वही चेहरे किसी बच्चे की तरह मासूम, मुक्त और निश्छल मुस्कान से भरे थे। किसी के लिए ये इमोशनल हीलिंग थी, किसी के लिए मानसिक तनाव से मुक्ति और कई लोगों के लिए ये नई शुरुआत साबित हुई।
बिलॉन्गिंगनेस: हर व्यक्ति को अपना समझने की कला
पहली बार से लेकर तीसरी बार तक एक प्रतिभागी के साथ एक आयोजक दोनों के रूप में मेरे लिए यह सिर्फ वर्कशॉप नहीं थी अपितु यह सामूहिक चेतना के लिए एक पुनर्जागरण अभियान सा लगा। हमें पता लगा कि रिश्ते कैसे बेहतर बनाए जाते हैं, कैसे लोगों को वैसे ही स्वीकार किया जाए जैसे वे हैं, और कैसे बिना किसी अपेक्षा के प्यार किया जाए। जब हर प्रतिभागी मैं से ऊपर उठकर 'हम' के भाव में डूब गया, तब लगा यही है वो 'बिलॉन्गिंगनेस' जिसकी इस समाज को सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। इस कोर्स की कीमत ₹2500 थी लेकिन जो अनुभव मिला, वो लाखों का सुकून बनकर आत्मा में समा गया। आज जब मैं इस यात्रा को पीछे मुड़कर देखता हूं, तो लगता है कॉलेज की डिग्री जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी है ‘जीवन जीने की कला- आर्ट ऑफ लिविंग’।
सिर्फ संख्या ही नहीं बढ़ी सोच भी बदली है। अब जब हम हर हफ्ते फॉलोअप सेशन्स कर रहे हैं, तो लगता है कि ये वर्कशॉप एक 'इवेंट' नहीं रही यह एक 'अभियान' बन चुकी है। जिस भी व्यक्ति ने यह कोर्स किया वह अब अपने तनाव, चिंता और अस्थिरता को खुद संभाल पा रहा हैं। कई छात्रों ने इसे अपनी डेली लाइफ का हिस्सा बना लिया है।
एक बीज जो वटवृक्ष बनने को तैयार है!
आज जब मैं इस अनुभव को लिख रहा हूं, तो मेरी आंखें नम हैं लेकिन यह नमी दुःख की नहीं, कृतज्ञता की है। जो बीज हमने सालभर पहले बोया था, वह अब अपनी जड़ें जमा चुका है। और मैं निश्चिंत हूं कि यह बीज आने वाले समय में विशाल वटवृक्ष बनेगा, जो हर विद्यार्थी को छाया देगा, शांति देगा। मुझे नहीं पता मैं अगली बार कब इस कोर्स का हिस्सा बन पाऊंगा सब समय के गर्भ में छुपा है लेकिन इतना जरूर जानता हूं कि ये अनुभव मेरे साथ हमेशा रहेगा। हर साँस में, हर निर्णय में, हर मुस्कान में...! अगर आप भी जीवन में स्थिरता, सुकून और शक्ति चाहते हैं तो एक बार आर्ट ऑफ लिविंग के कोर्सेस का अनुभव जरूर कीजिए। धन्यवाद आर्ट ऑफ लिविंग, बेनेट यूनिवर्सिटी और उन सभी साथियों का जिन्होंने इस यात्रा को अविस्मरणीय बना दिया।
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नैवेद्य तुम्हारा लेख पढ़ कर,इतनी अच्छी फिलिंग आ रही है कि ऐसा लगता हैं मुझे भी करना चाहिए। यही तुम्हारी लेखनी की काबिलियत है
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