डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (डीपीडीपी अधिनियम): पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर बड़ा खतरा !

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया, डिजिपब, इंडियन वूमेंस प्रेस कॉर्प और दिल्ली यूनियन जर्नलिस्ट्स की संयुक्त बैठक में डीपीडीपी अधिनियम के खिलाफ उठी मजबूत आवाज
(नैवेद्य पुरोहित) सोमवार 21 अप्रैल 2025 को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के प्रांगण में एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई, जिसमें डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट 2023 (DPDP) के प्रावधानों पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई। इस बैठक में पत्रकारों, कानूनी विशेषज्ञों और आरटीआई कार्यकर्ताओं ने इस कानून के कार्यान्वयन से पत्रकारिता की स्वतंत्रता और सूचना के अधिकार पर पड़ने वाले प्रभावों पर चर्चा की। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के अध्यक्ष गौतम लाहिड़ी के नेतृत्व में आयोजित इस बैठक में मुख्य चिंता डेटा प्रोटेक्शन एक्ट की धारा 44(3) को लेकर थी, जो सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 8(1)(j) में संशोधन करती है। यह संशोधन सभी "व्यक्तिगत जानकारी" के प्रकटीकरण से छूट देता है, जिससे जन हित में सूचनाओं तक पहुँच पर गंभीर प्रतिबंध लगता है। बैठक में कानून विशेषज्ञों को भी बुलाया गया था जिन्होंने इस कानून पर गहन शोध किया है। एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के अध्यक्ष अनंत नाथ ने अपने वक्तव्य में कहा, "यह कानून पत्रकारों को सरकार के पीआर एजेंट में बदल देगा। पत्रकारों से उनका आजीविका का अधिकार छीना जा रहा है, जो कि मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।"
250 करोड़ का जुर्माना और सरकारी नियंत्रण अंजलि भारद्वाज, जो सूचना के अधिकार के लिए राष्ट्रीय अभियान से जुड़ी हैं उन्होंने बताया कि इस कानून के तहत डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड के पास व्यक्तियों या संस्थाओं पर 250 करोड़ रुपये तक का जुर्माना लगाने का अधिकार होगा, जिसे बढ़ाकर 500 करोड़ रुपये तक किया जा सकता है। उन्होंने कहा, "यह डेटा प्रोटेक्शन कानून नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार प्रोटेक्शन कानून है।" सूचना के अधिकार पर प्रहार अमृता, जो आरटीआई कार्यकर्ता रही है उन्होंने कई उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे इस संशोधन से आरटीआई के माध्यम से प्राप्त की जाने वाली महत्वपूर्ण जानकारियां अब प्राप्त नहीं हो पाएंगी। उन्होंने कहा, "अगर कही दुर्घटना हुई है अब अगर कोई पूछना चाहे कि कौन लोग मरे है? उनका क्या नाम है? या अगर कहीं बिल्डिंग गिर जाती है तो किस अधिकारी ने निरीक्षण किया था? किस ठेकेदार को बनाने का ठेका दिया गया था? तो हमें कहा जाएगा कि यह सब 'व्यक्तिगत जानकारी' है, जिसे सार्वजनिक नहीं किया जा सकता।"
बैठक में उपस्थित विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि पिछले 20 वर्षों में आरटीआई अधिनियम पर किसी ने आपत्ति नहीं जताई है क्योंकि आज दिन तक आरटीआई अधिनियम के माध्यम से कभी भी ऐसी संवेदनशील व्यक्तिगत जानकारी सार्वजनिक नहीं हुई है, जिसे गोपनीय रखा जाना चाहिए था। इसलिए कानून में संशोधन का कोई औचित्य ही नहीं बचता है।
पत्रकारों के लिए कोई छूट नहीं वरिष्ठ पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता ने न्यूजक्लिक के अनुभव को साझा करते हुए बताया कि किस तरह उनके कार्यालय पर छापेमारी की गई थी। उन्होंने कहा, "आज़ाद भारत के इतिहास में पहली बार सुबह 6:30 बजे देशभर में अलग अलग स्थानों पर लोगों के घर पर दबिश दी गई और हमारे व्यक्तिगत डिवाइसेस जब्त कर लिए गए जो आज तक नहीं मिले है। आप वास्तव में उस चीज को छीन रहे हैं जो लोगों की आजीविका है।" एडवोकेट अपार गुप्ता, जो कि निजता के अधिकार के लिए राष्ट्रीय अभियान से जुड़े है और विधि विशेषज्ञ है उन्होंने कहा, "आम नागरिक भी इससे सीधा प्रभावित है। आपके क्षेत्र में जिस स्थान पर आप रहते है वहां कोई ना कोई सरकारी अधिकारी होगा यदि वह काम नहीं कर रहा है या गलत काम कर रहा है इस कानून के आधार पर आप नहीं जान पाएगा कि वह अधिकारी कौन है उसका क्या नाम है? उदाहरण देते हुए उन्होंने समझाया कि आपके क्षेत्र में एक सरकारी स्कूल है उसका प्रिंसिपल अपने दफ्तर आता ही नहीं है, कई दिनों से नहीं आ रहा है आपने आरटीआई फाइल की ताकि प्रिंसिपल का पता चल सके कौन है उसका क्या नाम है वह क्यों नहीं आ रहा है लेकिन अब आप यह जान ही नहीं पाएंगे कि वह कौन है! क्योंकि यह अब 'व्यक्तिगत जानकारी' के तहत आ गया है जिसे सार्वजनिक नहीं किया जाएगा!" उन्होंने स्पष्ट किया कि इस कानून में पत्रकारों के लिए कोई विशेष छूट भी नहीं है, जैसा कि दुनिया के अन्य देशों के समान कानूनों में होता है।
हमारे देश में हर साल 60 लाख आरटीआई आवेदन दाखिल किए जाते हैं। अगर कहीं स्कूल की इमारत गिर गई और बच्चे मर गए, तो आप सवाल पूछना चाहें कि किसने भवन का निरीक्षण किया, किसने अधिकृत किया, तो आपको कहा जाएगा कि यह सब व्यक्तिगत जानकारी है और अब आप एक पत्रकार होने के नाते भी नहीं जान सकते। इस कानून में सीधे एफआईआर की भी जरूरत नहीं है सिर्फ डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड पर शिकायत जाएगी और सीधे तगड़ा जुर्माना लगेगा। दुर्भाग्य से कोई ऐसा प्रावधान नहीं है जो पत्रकारों को बचा पाए। बैठक में निर्णय लिया गया कि इस मुद्दे पर संबंधित मंत्री से मिलने का प्रयास किया जाएगा। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की उपाध्यक्ष संगीता बरूवा पिशारोटी ने कहा, "यह प्रेस की स्वतंत्रता के लिए एक संयुक्त लड़ाई है और इसलिए हम सभी की मदद और सलाह से आगे बढ़ेंगे। जल्द ही संबंधित मंत्री से बैठक की जाएगी" इस मामले में देश के अन्य हिस्सों में प्रेस क्लबों से भी संपर्क करने और एक मजबूत आवाज उठाने का आह्वान किया गया।
वक्ताओं ने सरकार से इस कानून की समीक्षा करने, इसे लागू न करने और पत्रकार समूहों से बातचीत करने का आग्रह किया है। इस कानून पर तुरंत रोक लगाई जानी चाहिए, क्योंकि यह न केवल पत्रकारिता की स्वतंत्रता को प्रभावित करेगा, बल्कि आम नागरिकों के सूचना के अधिकार को भी सीमित करेगा। इस अवसर पर प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के अध्यक्ष गौतम लाहिड़ी, एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के अध्यक्ष अनंत नाथ और वरिष्ठ पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता के साथ विशेष मुलाकात हुई। #डिजिटल_पर्सनल_डेटा_प्रोटेक्शन_एक्ट #DPDPA_2023 #सूचना_का_अधिकार #आरटीआई_एक्ट #Right_to_Information #प्रेस_की_स्वतंत्रता #Press_Freedom #प्रेस_क्लब_ऑफ_इंडिया #एडिटर्स_गिल्ड_ऑफ_इंडिया #दिल्ली_यूनियन_जर्नलिस्ट्स #इंडियन_वूमेंस_प्रेस_क्रॉप #डिजिपब

Comments

  1. सत्ता किसी भी पार्टी की हो जनता पर अंकुश लगाना चाहती हैं, पत्रकार सत्ताधारियों को आईना दिखाता हैं।
    इसलिए हमेशा आंख की किरकिरी होता हैं, असल बात यही है कि विपक्षी पार्टी की की बजाय, पत्रकारों ने सरकार से सवाल किए है और सरकार को सावल उठाने वाले पसंद कभी नहीं आते है।
    इस बिल का विरोध करने के साथ साथ जनता को जागरुक करना ज्यादा जरूरी है

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    1. जी बिल्कुल सही कहा आपने

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