काशी से अयोध्या तक का सफर: जब महादेव खुद बुलाए तब रास्ते अपने आप बनते चले जाते है!
कभी-कभी जीवन में अचानक लिए गए निर्णय सबसे अद्भुत अनुभवों में बदल जाते हैं। ऐसा ही कुछ मेरे साथ हुआ जब 29 मार्च की शाम को मैंने अचानक बनारस जाने का विचार किया। उस समय मैं रोहतक रोड स्थित पवन गंगा एजुकेशन सेंटर से अपनी सीयूईटी पीजी की परीक्षा देकर लौट रहा था और शाम के छह बजे करीब अपने दोस्तों माही और आयुष के साथ बेनेट यूनिवर्सिटी कैंपस में स्नैक्स कर रहा था। मैं उन्हें मेरी एग्जाम के बारे में बता रहा था और बातचीत के दौरान मैंने आयुष से कहा, "2 दिन की छुट्टी है...सोमवार को ईद है...अपन बनारस चल लेते हैं!" वह हंसते हुए बोला, "भैया, 12 घंटे का ट्रैवल होगा और उसके लिए हमें पहले से प्री प्लानिंग करना चाहिए थी।" लेकिन मेरा मन पूरी तरह बन चुका था। मैंने पापा को फोन कर बताया कि हमारा प्लान बन रहा है बनारस जाने का...और उन्होंने कहा, "बेटा, शुभ काम में देरी किस बात की?, बनारस जा रहे हो तो अयोध्या भी हो आना पास में ही है वहां से...ज्यादा दूर नहीं है।" मैंने तत्काल बस की टिकट बुक की, आउटपास बनाया और 2 दिन के लिए ज़रूरी सामान रख के मै और आयुष कुमावत निकल पड़े हमारी बनारस - अयोध्या की यात्रा पर।
रात 11 बजे हमारी बस ग्रेटर नोएडा के ज़ीरो पॉइंट से थी। बस में बैठते ही नींद आ गई और जब आँख खुली, तो हम काशी की पावन धरती पर थे। सुबह के ग्यारह बजे बनारस पहुंचे, बस से बाहर निकलते ही एक अलग तरह की ऊर्जा महसूस हुई। बनारस की गलियों में हलचल थी...वीकेंड की वजह से बहुत पर्यटक आए हुए थे।
हमने पहले एक होटल लिया, स्नान किया और सीधे संकट मोचन हनुमान मंदिर की ओर चल पड़े। मंदिर में प्रवेश करते ही मन में बजरंग बली के प्रति शांति और भक्ति का भाव उमड़ पड़ा। वहाँ से निकलकर हमने बनारस की प्रसिद्ध पहलवान लस्सी का आनंद लिया और फिर बनारस की अलग-अलग संकरी गलियों में बहुत देर तक घूमते हुए होटल पहुंचे। होटल लौटने पर गाइड गणेश भैया हमारा इंतज़ार कर रहे थे, उन्होंने हमें बनारस घुमाया। हम सबसे पहले बनारस के विभिन्न घाट देखने के लिए पहुंचे। हर घाट की अपनी विशेषता थी, लेकिन जब हम मणिकर्णिका घाट पहुँचे, तो मेरा मन एक गहरे अनुभव में डूब गया वो जो एहसास हुआ बयां करना मुश्किल है। वहाँ एक के बाद एक शव आ रहे, जलती चिताएँ और मनुष्य की अंतिम यात्रा की शाश्वत सच्चाई देख मन सोचने पर मजबूर हो गया कि आख़िर में इंसान अपना पैसा, प्रतिष्ठा, घमंड, इज्जत शोहरत, प्रेम, दया, करुणा लेकर जाता कहां है ? सब राख ही तो बन जाते हैं। अमीर, गरीब, मोटा, पतला, काला, गोरा सबको अंत में मिट्टी से ही आया है मिट्टी में ही मिल जाएगा की तर्ज़ पर चले जाना है। फिर भी इंसान अपने अंदर दुःख का बड़ा पहाड़ लेकर घूमता है...सब तरह से नेगेटिव बातें सुनता है नेगेटिव सोचता है और नेगेटिव ही बोलता है। आखिर क्यों मनुष्य कभी संतुष्ट नहीं हो पाया जबकि वास्तव में उसे पता है कि सत्य या अंत जैसा तो कुछ है ही नहीं, बल्कि जीवन का परम सत्य तो मृत्यु है! और कुछ भी नहीं! शायद इसीलिए कबीरदास जी कह गए है,
"माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर।
आशा, तृष्णा ना मरी, कह गए दास कबीर।।
अर्थात शरीर का अंत हो जाएगा लेकिन इच्छाएं कभी नहीं मरतीं और दिल कभी नहीं भरता। मनुष्य को उम्मीद और किसी न किसी चीज की चाहत हमेशा जीवित रहती है। इसका मतलब यह नहीं है कि हमें उसके पीछे भागना चाहिए। हमें अपनी इच्छाओं को संतुलित करना चाहिए ताकि जीवन की सच्ची खुशी को समझ पाए। जब हम अपनी इच्छाओं को संतुलित करते हैं और जीवन की सच्ची खुशी को समझते हैं, तब ही हमेशा खुश रह पाएंगे और जीवन का आनंद ले पाएंगे।
खैर, अब आते है मेरी यात्रा पर मणिकर्णिका घाट पर साँझ होते ही हम गंगा आरती के लिए दशाश्वमेध घाट पहुँचे। आरती का दिव्य रूप अलग ही ऊर्जा दे रहा था, सैकड़ों की संख्या में लोग सिर्फ गंगा आरती का इंतज़ार करने के लिए अपनी जगह रोक कर बैठे थे, दीपों की रौशनी, घंटियों की ध्वनि और मंत्रोच्चार की गूँज। ऐसा लगा मानो स्वयं माँ गंगा हमें आशीर्वाद दे रही हों। आरती के बाद हम बाबा काशी विश्वनाथ ज्योर्तिलिंग मंदिर के दर्शन करने निकले। जब हम मंदिर पहुंचे, और भोलेनाथ का दिव्य सप्तऋषि श्रृंगार स्वरूप देखा तो मन में असीम शांति का अनुभव हुआ। यह यात्रा मेरे लिए बेहद विशेष थी क्योंकि इससे मेरे दस ज्योतिर्लिंगों के दर्शन पूर्ण हो गए। अब केवल देवघर के बैद्यनाथ और महाराष्ट्र के घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन शेष हैं। दर्शन के बाद जब रात में मंदिर से निकले तब भी मणिकर्णिका घाट पर रात में भी चिताएं जल रही थी इसलिए इसे महाश्मशान कहा जाता है। वहां से हम घाटों के पीछे बनीं दुकानों पर खाने के लिए गए और बनारस की प्रसिद्ध काशी चाट भंडार की टमाटर चाट खाई जो कि वाकई स्वाद में लाज़वाब थी। फिर थोड़ा बहुत नाश्ता करने के बाद हमने बनारसी पान खाया। सच में बनारस के पान के अपने अलग ही मज़े है। बजाय बड़े-बड़े होटलों के काशी का मज़ा उन छोटी दुकानों में ही है। रात 10 बजे होटल पहुंचकर चेक आउट किया फिर हम बस स्टैंड की ओर बढ़े जहां से 11:30 बजे की अयोध्या के लिए बस पकड़ी। रातभर सफर करते हुए हम सुबह 4 बजे अयोध्या पहुँचे। वहाँ एक स्थानीय रिक्शा चालक हमें उसके रिश्तेदार पंडित अजय पांडे के घर ले गया। पंडितजी के घर पहुँचकर हमें आत्मीय आतिथ्य मिला। पुरातन शैली से बना उनका वह घर अयोध्या की पारंपरिक जीवनशैली का साक्षात्कार करवा रहा था। उस वक्त तो हम सो गए फिर सुबह 9 बजे उठने के बाद तैयार होकर दिन की शुरुआत सरयू नदी के दर्शन से हुई घाट पर कई पर्यटक अपने परिजनों के साथ आनंद ले रहे थे। इसके बाद हम प्राचीन हनुमान गढ़ी मंदिर पहुँचे, जहाँ श्रद्धालुओं की अपार भीड़ थी। हर तरफ धक्का मुक्की हो रही थी, छोटे बच्चे गर्मी और घबराहट से रो रहे थे। अच्छे से दर्शन करने के बाद हम वहां से जल्द ही हनुमान जी आज्ञा लेकर निकल पड़े प्रभु श्रीराम के दर्शन करने श्री रामजन्मभूमि मंदिर। रामनवमी आने वाली और इस वजह से पूरा मंदिर परिसर भव्य तरीके से सजा हुआ था, रामलला की मूर्ति में जो वह मनमोहक छवि थी वह हृदय में हमेशा के लिए बस गई। मंदिर अभी पूरी तरह बनकर तैयार नहीं हुआ है, करीब सालभर बाद पूरी तरह से तैयार हो जाएगा। अयोध्या में हमने लोकल बाजार भी घूमा। वहाँ की गलियों में घूमते हुए हमें विभिन्न रामनामी वस्त्र, लकड़ी की कलाकृतियाँ और मिठाइयों की दुकानें देखने को मिलीं। दोपहर में खाना खाने के बाद हम पंडित जी के घर पहुंचे जहां से अपना सामान लेकर उनसे विदा ली और वापसी की तैयारी शुरू की। शाम 7 बजे बस पकड़ी और 1 अप्रैल की सुबह 6 बजे ग्रेटर नोएडा पहुँच गए।
यह यात्रा मेरे जीवन के सबसे अविस्मरणीय अनुभवों में से एक रही। बिना किसी प्लानिंग के शुरू हुई यह यात्रा वास्तव में आनंददायक सिद्ध हुई। बनारस की ऊर्जा और अयोध्या के भक्तिमय माहौल ने मेरे भीतर नई चेतना का संचार किया। बनारस और अयोध्या की गलियों में बिताया गया हर पल, हर अनुभव, हर मंदिर का दर्शन और हर भावना मेरे हृदय में अंकित हो गई। वास्तव में, कुछ यात्राएँ आपके जीवन के यादगार अनुभवों में से एक होती है, और यह यात्रा उन्हीं में से एक थी!
~ नैवेद्य पुरोहित






ब्लॉग पढ कर, ऐसा लग रहा है कि मैं खुद बाबा काशी विश्वनाथ बनारस और अयोध्या घूम रहा हूं , बहुत अच्छे से वर्णन किया है। नैवेद्य।
ReplyDeleteमणिकर्णिका घाट जीवन की सच्चाई बताता है, 10 ज्योतिलिंग दर्शन पूरे होने पर बधाई
बहुत बहुत धन्यवाद आपका 🥰
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