डिजिटल युग में फैक्ट-चेकिंग की जरूरत: दिल्ली स्कूल ऑफ जर्नलिज्म में मीडिया साक्षरता पर कार्यशाला !
(नैवेद्य पुरोहित)
डिजिटल युग में जब फेक न्यूज़ तेजी से बढ़ रही है, तब हर व्यक्ति के लिए मीडिया साक्षरता एक आवश्यक कौशल बन गया है। इसी विषय पर जागरूकता बढ़ाने के लिए 19 मार्च 2025 को दिल्ली स्कूल ऑफ जर्नलिज्म (DSJ), दिल्ली विश्वविद्यालय में "फैक्टशाला वर्कशॉप" का आयोजन किया गया। यह सत्र फैक्टशाला यूनिवर्सिटी नेटवर्क के मीडिया लिटरेसी ट्रेनर डॉ. तिलक झा द्वारा संचालित किया गया। इस कार्यशाला का आयोजन डेटालीड्स और गूगल न्यूज़ इनिशिएटिव के सहयोग से किया गया था। सत्र में पत्रकारिता के छात्रों को गलत सूचना से बचाव और सही जानकारी की पहचान करने के लिए महत्वपूर्ण रणनीतियों से अवगत कराया गया।
डॉ. तिलक झा ने बताया कि "रिडक्शनिस्ट थिंकिंग" यानी किसी भी विषय को जरूरत से ज्यादा साधारण बनाकर देखना, आज के डिजिटल युग की सबसे बड़ी चुनौती है। उन्होंने समझाया कि जब हम किसी समूह के बारे में यह कहने लगते हैं कि "सभी बिहारी बेवकूफ हैं" या "सभी लड़के लापरवाह होते हैं" तो हम असलियत को तोड़-मरोड़कर देख रहे होते हैं। सोशल मीडिया का मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव भी कार्यशाला का एक महत्वपूर्ण विषय रहा। डॉ. झा ने बताया कि, "सोशल मीडिया पर लोग अपने जीवन के केवल सुखद पल दिखाते हैं, जिससे दूसरों को यह आभास होता है कि उनकी जिंदगी कम खुशहाल है। यही कारण है कि कई लोग अवसाद में चले जाते हैं।"
उन्होंने यह भी बताया कि हमें केवल बाहरी जानकारियों पर ही नहीं, बल्कि अपने खुद के विचारों और मान्यताओं पर भी चिंतन करना चाहिए। "जब हम दूसरों को आंकते हैं तो जज बन जाते हैं, लेकिन जब खुद को सही ठहराने की बात आती है तो वकील बन जाते हैं!" इस गहरी बात ने हमें सोचने पर मजबूर कर दिया कि हम सूचना को किस प्रकार समझते हैं और उसे प्रॉसेस करते हैं।
कार्यशाला में मीडिया मैनिपुलेशन और प्रोपेगेंडा पर भी चर्चा हुई, जिसमें वरिष्ठ पत्रकार निधि राज़दान का उदाहरण दिया गया, जिन्हें एक बार नकली हार्वर्ड जॉब ऑफर से ठगा गया था। अगर एक अनुभवी पत्रकार भी गलत सूचना का शिकार हो सकता हैं, तो आम नागरिकों को और भी अधिक सतर्क रहने की जरूरत है।
इस सेशन की सबसे अच्छी बात यह लगी कि छात्रों को गूगल रिवर्स इमेज सर्च और इनविड जैसे फैक्ट चेकिंग टूल्स का उपयोग करके सही जानकारी की जांच करने के तरीके भी सिखाए गए। एक यह महत्वपूर्ण संदेश भी था कि, "तथ्य कभी स्थिर नहीं होते, बल्कि समय के साथ विकसित होते हैं। आज जो सत्य है, वह कल बदल सकता है।" इसलिए समाचारों और सूचनाओं को आंख मूंदकर स्वीकार करने के बजाय, हमेशा उनका विश्लेषण और सत्यापन करना आवश्यक है।
फेक न्यूज़ के बढ़ते खतरे के बीच, फैक्टशाला जैसी पहल समाज को जिम्मेदार मीडिया उपभोक्ता बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। यह कार्यशाला डिजिटल युग में सच और झूठ के बीच फर्क समझने की दिशा में एक सार्थक कदम साबित हुई।
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इसी तरफ श्रेष्ठ, शिक्षकों के सानिध्य में रहो, हमेशा सीखते रहने की भूख बरकरार रखना, बहुत आसान और समझदारी भरा आर्टिकल ब्लॉग लिखा है, जो कि मास कॉम के हर स्टूडेंट्स के काम आ सकता हैं, और ऐसे सेशन अटेंड करते रहना
ReplyDeleteजी बिल्कुल, बहुत बहुत धन्यवाद आपका 😊
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