सीतापुर में दैनिक जागरण के पत्रकार की गोली मारकर हत्या!

(नैवेद्य पुरोहित)
सीतापुर (उ.प्र) में एक पत्रकार की हत्या ने पूरे देश में सनसनी फैला दी है। शनिवार 8 मार्च 2025 की दोपहर को सीतापुर लखनऊ-दिल्ली राष्ट्रीय राजमार्ग पर मोटरसाइकिल सवार बदमाशों ने पत्रकार राघवेंद्र बाजपेई पर गोलियां बरसाकर उनकी जान ले ली। यह घटना एक प्रमुख दैनिक हिंदी समाचार पत्र "दैनिक जागरण" में कार्यरत 35 वर्षीय राघवेंद्र बाजपेई के साथ हुई, जो क्षेत्रीय संवाददाता के रूप में काम करते थे। स्थानीय पुलिस के अनुसार यह घटना इमलिया सुल्तानपुर थाना इलाके में हुई, जहां बाजपेई अपनी मोटरसाइकिल पर सवार थे। हमलावरों ने उन पर तीन गोलियां चलाईं,जिससे उनकी तत्काल मृत्यु हो गई।
इस घटना के बाद, पुलिस ने कई टीमें बनाईं और अपराधियों को पकड़ने के लिए जोरदार कार्यवाही शुरू कर दी है। उत्तर प्रदेश कांग्रेस ने इस घटना को "जंगल राज" कहकर निंदा की है और कहा कि राज्य में हर रोज किसी न किसी की जान ली जाती है, लेकिन सत्ताधारियों को इसकी परवाह नहीं है। नेशनल यूनियन जर्नलिस्ट ऑफ इंडिया (एनयूजेआई) ने भी इस हमले की कड़ी निंदा की और पत्रकारों के लिए अधिक सुरक्षा की मांग की है।
यह हत्या एक ऐसे समय में हुई है जब पत्रकारिता की आजादी और सुरक्षा पर कई सवाल उठ खड़े हो रहे हैं। राघवेंद्र बाजपेई की हत्या एक उदाहरण है कि किस तरह से भ्रष्टाचार और अपराध के खिलाफ आवाज उठाने वाले लोगों को खामोश करने की कोशिश की जा रही है। इस मामले में जल्द से जल्द न्याय होना चाहिए और दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके। उल्लेखनीय है कि राघवेन्द्र बाजपेई ने हाल ही में उत्तरप्रदेश में धान खरीदी में गड़बड़ी और स्टाम्प चोरी की खबर उजागर की थी जिसे दैनिक जागरण ने प्रमुखता से प्रकाशित किया था।
पत्रकारों की हत्या अब कोई आश्चर्यजनक घटना नहीं है ! उत्तर प्रदेश के सीतापुर में ब्राह्मण कुल के राघवेंद्र वाजपेई की हत्या अब आश्चर्यजनक घटना नहीं रही। छत्तीसगढ़ में भी ऐसी कई हत्याएं हो चुकी है, दिल्ली में हत्याएं हुई, बिहार में भी हुई है, बंगाल में हुई है, मध्यप्रदेश में हत्या हुई। भले ही उसे दुर्घटना का नाम दे दे लेकिन हत्याएं तो हुई है। कई पत्रकारों को तो पीड़ित किया जा रहा है। कई राष्ट्रीय स्तर के पत्रकार अपनी नौकरी छोड़ चुके है, तथा वे और कोई काम कर रहे है। किसी ने अपने निजी चैनल बना लिए है। कोई निजी एजेंसियों का काम कर रहे हैं। कई सारे छोटे लघु समाचार पत्र बंद हो चुके है तथा समाचार पत्रों में लगने वाली स्याही कागज़ व अन्य उपकरण पर इतना टैक्स लगा दिया गया है कि वो अनाप शनाप महंगे हो गए है। समाचार पत्र निकालना मुश्किल हो गया है। जहां एक ओर इस पवित्र पेशे में निष्पक्षता से बिना डरे काम करने वाले लोगों की संख्या दिन प्रतिदिन कम होती जा रही है वहीं दूसरी ओर अधिकारियों राजनीतिबाजों की धींगा मस्ती बढ़ती जा रही है!

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