सच्चाई का दम घुटता भारत: पत्रकारिता की हत्या और समाज की चुप्पी!

(नैवेद्य पुरोहित)
पत्रकारिता, जो कभी लोकतंत्र का चौथा स्तंभ थी समाज के सबसे सम्मानित और निडर पेशे में गिनी जाती थीं! अब एक ऐसा पेशा बन चुकी है जहां सच बोलने की कीमत जान देकर चुकानी पड़ती है। छत्तीसगढ़ के बीजापुर (बस्तर) में पत्रकार मुकेश चंद्राकर की निर्मम हत्या ने भारतीय मीडिया के उस काले पक्ष को उजागर कर दिया है, जिसे सत्ता और पूंजी ने मिलकर दबा रखा है।
पत्रकारिता की कीमत: एक और सच कुचला गया! मुकेश चंद्राकर का गुनाह क्या था? उन्होंने सड़क निर्माण में हो रहे भ्रष्टाचार को उजागर किया। इसके लिए उनकी हत्या कर दी गई। उनकी लाश एक सेप्टिक टैंक में पाई गई, जो इस बात का प्रमाण है कि सच बोलने वालों को किस हद तक खामोश किया जा सकता है। इस घटना ने साबित कर दिया कि लोकतंत्र में पत्रकारिता की आवाज को दबाने के लिए माफिया और सत्ता किस हद तक गिर सकते हैं। जिस नगर निगम के ठेकेदार सुरेश चंद्राकर को इस हत्या का जिम्मेदार माना जा रहा है, उसे 1 जनवरी को खुद को देश के नंबर 1 अख़बार और 14 करोड़ से ज्यादा पाठक संख्या वाले 'दैनिक भास्कर' ने ‘बस्तर का हीरो’ के रूप में प्रचारित किया। सवाल यह है कि यह विज्ञापन क्या एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा था? क्या पैसे की ताकत इतनी बड़ी हो गई है कि सच के पैरोकारों का खून अब खबरों और विज्ञापनों में छुपा दिया जाएगा? आज के हालात पर 1989 में काला बाजार मूवी के बहुचर्चित गाने की याद आ रही है, "ठन ठन की सुनो झंकार...ये दुनिया है काला बाज़ार...ये पैसा बोलता है...ये पैसा बोलता है...!"
आज पत्रकार बनना युद्ध में उतरने जैसा है, लेकिन इस युद्ध में दुश्मन अज्ञात है। हथियार केवल कलम और कैमरा है, और शत्रु हर जगह मौजूद है—माफिया, राजनेता, ठेकेदार और यहां तक कि आम जनता की उदासीनता। मुकेश चंद्राकर जैसे युवा साहसी पत्रकारों की हत्याएं इस बात का प्रमाण हैं कि भारत में अब पत्रकारिता ईमानदारी से करना कितना कठिन कार्य हो चुका है! जो युवा इस पेशे में 'जिगर' के साथ कदम रखते हैं, उनके परिवार हर दिन डर और तनाव के साये में जीते हैं। सच बोलने की कीमत अब केवल मानसिक तनाव तक सीमित नहीं है, बल्कि जान गंवाने तक जा पहुंची है। आज का युवा, जो एक समय में कैमरे के सामने सच को उजागर करने और अपनी लेखनी से समाज में बदलाव लाने का सपना लेकर इस पेशे में आता था, अब अपने सपनों को तिलांजलि देकर दूसरे क्षेत्रों में पलायन कर रहा है। मार्केटिंग, एडवरटाइजिंग, पब्लिक रिलेशंस जैसे पेशे अब उनके लिए आकर्षक विकल्प बन गए हैं। यह बदलाव केवल बेहतर करियर के लिए नहीं है, बल्कि अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा की चिंता से उपजा है। इस पेशे में अब सच्चाई की जगह खौफ ने ले ली है। जो पत्रकार अपनी लेखनी या रिपोर्टिंग से सत्ता और माफिया को चुनौती देते हैं, उन्हें न केवल जान से मार दिया जाता है, बल्कि उनकी छवि को भी तोड़ने की कोशिश की जाती है। परिवारवालों को धमकियां दी जाती हैं। उनके बच्चों, पत्नी, माता-पिता को डराया-धमकाया जाता है। एक समय था जब पत्रकारिता को समाज के बदलाव का सबसे बड़ा माध्यम माना जाता था। लेकिन आज, इस पेशे में आने का सपना देखने वाले युवाओं को अपने फैसले पर पुनर्विचार करना पड़ता है। क्या वे अपने परिवार की सुरक्षा से समझौता कर सकते हैं? क्या वे खुद को ऐसी परिस्थितियों में डाल सकते हैं जहां हर दिन मौत का खतरा मंडराता है? नतीजा यह है कि पत्रकार बनने का सपना लेकर आए युवा मार्केटिंग, एडवरटाइजिंग और पीआर जैसी सुरक्षित नौकरियों में चले जाते हैं। ये क्षेत्र उन्हें सुरक्षा और स्थिरता प्रदान करते हैं, जो पत्रकारिता अब नहीं दे सकती। बचे हुए जो कुछ 'जिगर वाले' रहते हैं, वे हर दिन जान जोखिम में डालकर सच्चाई की लड़ाई लड़ते हैं। आज हम उस कायर व्यवस्था में जी रहे हैं जहां सच्चाई को कुचलना सबसे आसान हो गया है। सरकार, प्रशासन और समाज सबने मिलकर सच को दबाने का ऐसा माहौल बना दिया है जहां एक ईमानदार पत्रकार का सांस लेना भी मुश्किल हो गया है। सरकारें अपनी विफलताओं को छुपाने के लिए मीडिया को दबाती भी है और उसका इस्तेमाल भी करती रही हैं। ठेकेदार और माफिया, जो सत्ता के सबसे बड़े सहयोगी हैं अपने अपराधों पर पर्दा डालने के लिए पत्रकारों की जान लेने से भी नहीं कतराते। और सबसे दुखद पहलू यह है कि समाज इस सब पर चुप है।
स्थानीयता के संघर्ष: जानलेवा जोखिम हम अमेज़न के जंगलों की कटाई पर चिंता करते हैं। हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने पर बहस करते हैं। बड़े पावर प्लांट्स के विरोध में एक्टिविज्म करते हैं। लेकिन जब बात स्थानीय रेत माफिया, भ्रष्ट ग्राम प्रधान या सड़क निर्माण में हो रहे घोटाले की आती है तो हम पीछे हट जाते हैं। मुकेश चंद्राकर जैसे लोग जो इन स्थानीय मुद्दों को उजागर करते हैं उनकी हत्या कर दी जाती है! क्योंकि स्थानीयता के संघर्ष सबसे अधिक खतरनाक हैं। बड़ी चीज़ों का विरोध, लाइमलाइट में रहने वाली खबरें अधिक ग्लैमरस लगती है, लेकिन पास की नदी से अवैध रेत खनन की शिकायत करना जानलेवा साबित हो जाती है। पत्रकारिता का गिरता स्तर: कौन जिम्मेदार? आज पत्रकारिता को खत्म करने का काम केवल माफिया और सत्ता ही नहीं कर रहे हैं, बल्कि मीडिया संस्थान भी इसके बराबर जिम्मेदार हैं। कई मीडिया संस्थान जो जनता की आवाज बनने का दावा करते हैं, अब पूंजी के गुलाम बन गए हैं। मुकेश चंद्राकर की हत्या के आरोपी सुरेश चंद्राकर को ‘बस्तर का हीरो’ बताने वाला विज्ञापन क्या पत्रकारिता के उस गिरते स्तर का प्रमाण नहीं है, जहां पैसों के लिए सच्चाई की हत्या कर दी जाती है?
समाज की चुप्पी: सबसे बड़ा अपराध मुकेश चंद्राकर जैसे पत्रकार केवल अपने लिए नहीं लड़ते। वे समाज के लिए लड़ते हैं। उनकी लड़ाई भ्रष्टाचार, अन्याय और अत्याचार के खिलाफ होती है। लेकिन जब वे मारे जाते हैं, तो समाज चुप रहता है। यह चुप्पी ही सच्चाई की सबसे बड़ी दुश्मन है। आज जरूरत है कि हम अपनी चुप्पी तोड़ें। पत्रकारों के खिलाफ हो रहे इन अपराधों का विरोध करें। ऐसे दोषियों को फांसी की सजा दिलाने के लिए दबाव बनाएं। सरकार से पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कड़े कानून बनाने की मांग करें। अगर हम ऐसा नहीं करते, तो आने वाले समय में अन्याय के खिलाफ़ आवाज़ उठाने वाले खत्म हो जाएंगे और हम झूठ और भ्रष्टाचार के दलदल में डूब जाएंगे। अब वक्त आ गया है जागने का! मुकेश चंद्राकर की हत्या केवल एक पत्रकार की हत्या नहीं है। यह सच्चाई और न्याय की हत्या है। यह घटना हमें चेतावनी देती है कि अगर हम अब भी नहीं जागे, तो हर सच कुचल दिया जाएगा। यह केवल पत्रकारों की लड़ाई नहीं है। यह पूरे समाज की लड़ाई है। अगर आप चुप हैं, तो आप इस हत्या में उतने ही जिम्मेदार हैं जितना कि वह व्यक्ति जिसने यह हत्या की। #पत्रकार #मुकेश_चंद्राकर_अमर_रहें #ठेकेदार #सुरेश_चंद्राकर_को_फांसी_दो #बस्तर #बीजापुर #छत्तीसगढ़

Comments

  1. तुम्हारी उम्र के लिए ऐसा कह सकते है कि अभी तो अंकुर ही फूटा है यह पौधा,पेड़ बनकर,जब बरगद होगा तब क्या तूफान होगा......।
    अभी नैवेद्य तुम सिर्फ 20 साल के हो और तुम जिस तरह से लिख रहे हों, ऐसा लगता हैं तुम्हारे अंदर वो काबिलियत है कि तुम चाहो तो अपनी लेखनी से लोगो को हंसा, रुला, सकते हो, या समाज को नई दिशा दे सकते हो, तुम्हारी लिखावट में एक गुस्सा, एक दर्द झलक रहा है कि ऐसे कैसे, किसी पत्रकार को मारा जा सकता हैं।यह बिल्कुल सही है कि सुरक्षा की वज़ह से ही पत्रकार बनने का सपना लेकर जर्नलिजम में करियर बनाने वाले बाद में मार्केटिंग,एडवरटाइजमेंट , आदि में जा रहे है। अभी देश में निडर और समझदार पत्रकारों की बहुत कमी हैं। उस कमी को तुम भरोगे, ऐसा मेरा विश्वास है

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