श्रद्धेय कृष्ण कुमार अष्ठाना जी का निधन – एक युग का अंत

(नैवेद्य पुरोहित)
आज सुबह मकर संक्रांति के पावन दिन, जैसे ही खबर मिली कि अष्ठाना जी नहीं रहे...मन अत्यंत व्यथित हो गया। मालवा प्रांत के प्रथम प्रांत संघचालक, दैनिक स्वदेश के पूर्व संपादक, मासिक पत्रिका ‘देवपुत्र’ के संस्थापक, इंदौर प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष और एक अद्वितीय व्यक्तित्व श्रद्धेय श्री कृष्ण कुमार अष्ठाना जी का निधन न केवल इंदौर शहर और समाज के लिए बल्कि मेरे व्यक्तिगत जीवन के लिए भी एक क्षति है।
वे मेरे परदादाजी स्वर्गीय गणेशचन्द्र जी पुरोहित के अंतिम जीवित मित्र थे। जब मैंने पहली बार उनसे इंदौर प्रेस क्लब में मुलाकात की थी और अपना परिचय दिया तो उन्होंने मुझे चौंका दिया। 'स्वर्गीय गणेशचन्द्र पुरोहित' नाम सुनकर उनकी आंखें अचानक चमक उठीं थी और थोड़ी देर बाद उन्होंने कहा, "हां, पुरोहित...जल्दी शांत हो गए थे।" इन शब्दों ने मेरे भीतर एक ऐसी भावना जगा दी थी जिसे मैं कभी भुला नहीं सकता। उनके शब्दों में जो स्नेह, जो गहरी स्मृति थी उसने मुझे भावुक कर दिया था यह जानकर कि मेरे परदादाजी, जिनका निधन पांच दशक पहले हो गया था वे आज भी उनकी यादों में जीवित थे, मैं स्तब्ध रह गया! हाल ही में 3 जनवरी को दशहरा मैदान में आरएसएस के ‘स्वर शतकम’ कार्यक्रम के दौरान उनसे फिर मिलना हुआ था। ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि वो मेरी उनसे आखिरी मुलाकात होगी। वे 84 साल के थे लेकिन उनके भीतर ऊर्जा और समर्पण एक ज्वाला थी। समाज के प्रति उनकी निष्ठा और सेवा भावना ने मुझे हमेशा प्रभावित किया।
मकर संक्रांति: मोक्ष प्राप्ति महाभारत के भीष्म पितामह, जिन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान था उन्होंने अपने प्राण त्यागने के लिए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की थी। क्योंकि हिंदू धर्म में यह माना जाता है कि इस दिन मृत्यु से आत्मा को मोक्ष प्राप्त होता है। 58 दिन बाणों की शैय्या पर पीड़ा सहने के बाद ही भीष्म पितामह ने अपने प्राण त्यागे थे। श्रद्धेय अष्ठाना जी का इस दिन प्रस्थान होना मात्र संयोग नहीं दिव्य विधान है।
उनका जीवन केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, वह एक विचार, एक प्रेरणा और एक युग थे। उनके नेतृत्व में ‘दैनिक स्वदेश’ और ‘देवपुत्र’ जैसे संस्थानों ने न केवल अपनी पहचान बनाई, बल्कि समाज को नई दिशा दी। आपातकाल के अंधकार में जब लोकतंत्र पर कुठाराघात हुआ तब उन्होंने अपनी कलम और साहस से सत्य का दीप जलाए रखा। कई तरह की यातनाएं सहते हुए अपने साथियों के साथ आपातकाल के पूरे समय मीसाबंदी रहें लेकिन सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया!
एक रिश्ता जो अब बस यादों में रह गया ! अष्ठाना जी मेरे परदादाजी के मित्र तो थे पर मुझे नहीं लगता कि उनका वह रिश्ता केवल एक दोस्ती का रहा होगा। मेरे हिसाब से वह विचारों, आदर्शों और राष्ट्रसेवा की भावना का एक संबंध था। जब उन्होंने मुझे कहा था "हां पुरोहित...जल्दी शांत हो गए थे," तो उनके स्वर में जो गहराई थी उसने मेरे भीतर कुछ छोड़ दिया था। बेहद भावुक क्षण था वह इतने वर्षों बाद भी उनके हृदय में मेरे परदादाजी की स्मृतियां थी यह जानकार मैं अभिभूत हो गया। आज जब मैं दोनों को याद कर रहा हूं तो मेरी आंखें भर आती हैं। ईश्वर से प्रार्थना है कि उनकी आत्मा को मोक्ष प्राप्त हो। मेरे जैसे कई व्यक्ति जो उनकी शिक्षाओं और आदर्शों से प्रेरित हैं, उनके दिखाए मार्ग पर चलते रहें। ॐ शांति।

Comments

Popular posts from this blog

20 की उम्र में चारधाम पूरे, रिश्तों का पंचधाम भी जी लिया!

जड़ों से जुड़ाव की पुकार: एक बार फिर कुलदेवता के दरबार में!

मन की शांति का रहस्य: स्वीकार्यता है!