आत्महत्या की बढ़ती घटनाएं: क्या हम संवादहीन हो गए हैं?

(नैवेद्य पुरोहित)
पिछले 24 घंटे में इंदौर शहर ने एक भयावह स्थिति देखी, जहां पांच युवाओं ने अपनी जिंदगी को खत्म कर लिया। इनमें एक गेम डिज़ाइनिंग का छात्र, एक कर्ज में डूबा युवक, एक छात्रा (जो स्कूल होमवर्क न भेज पाने के कारण तनाव में थी), एक अन्य नाबालिग छात्रा और एक नर्स शामिल हैं। हर घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर समाज में ऐसा क्या हो रहा है जो युवा अपनी जिंदगी से हार मान रहे हैं। इन घटनाओं ने न केवल पीड़ित परिवारों को सदमे में डाला, बल्कि पूरे समाज को झकझोर दिया है।
युवाओं की बढ़ती आत्महत्या: एक गंभीर समस्या ऐसी घटनाएं केवल आंकड़े नहीं, बल्कि समाज के एक टूटे हुए हिस्से का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। हर आत्महत्या एक ऐसी कहानी है जिसे सही समय पर न तो सुना गया और न ही समझा गया। इसके कई कारण हो सकते हैं:- 1. मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी: तनाव, अवसाद, व्यर्थ की चिंता जैसी समस्याओं को अक्सर लोग अनदेखा कर देते है। यहीं चीज़ आगे चलकर जब अपना विकराल रूप धारण करती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती हैं। 2. आर्थिक तनाव: कर्ज़ का बोझ, नौकरी में असफलता और जीवनयापन के संघर्ष ऐसे मुद्दे है जहां आमतौर पर एक व्यक्ति आसानी से हार जाता है। पहले के समय ऐसा नहीं था, अगर हम गौर करेंगे तो पाएंगे कि हमारे पुरखों ने बाप दादाओं ने अथक परिश्रम कर संघर्ष के साथ गरीबी में भी जीवन हस्ते मुस्कुराते हुए बिताया। 3. शैक्षिक तनाव: एक छात्रा सिर्फ़ होमवर्क पूरा न कर पाने पर आत्महत्या कर लेती है। आज के समय यह घटना दिखाती है कि बच्चों पर दिन ब दिन बढ़ रहा शैक्षिक दबाव कितना घातक हो सकता है। 4. सामाजिक तुलना: माता-पिता, शिक्षकों कई बार जाने-अनजाने में विद्यार्थियों की दूसरों से तुलना कर बैठते हैं। किसी से तुलना करना एक ऐसा कारण बन जाता है जो खुद को दूसरों से कमतर समझने की प्रवृत्ति पैदा करता है।
आत्महत्या रोकने के उपाय: व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर प्रयास 1. संवाद को बढ़ावा दें: मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर चर्चा करना जरूरी है। मानसिक स्वास्थ्य के अलावा भी हर मसले को, अपनी हर समस्याओं को अपने दोस्तों, परिवार या जिस किसी से भी आप कंफर्टेबल है उससे साझा करना चाहिए। 2. सामाजिक सहयोग: समाज की भी इसमें बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका है क्योंकि आत्महत्याएं कुछ हद तक इसलिए भी होती है क्योंकि उस व्यक्ति की आवाज़ किसी ने ना तो सुनी और ना ही समझी। दोस्तों और परिजनों को संकट के समय किसी व्यक्ति को अकेला न छोड़ कर उसका सहारा बनना चाहिए। 3. शैक्षिक सुधार: आज के समय लगभग सभी स्कूलों और कॉलेजों में काउंसलिंग सेवाएं उपलब्ध है। विद्यार्थियों को काउंसलिंग सेवा का लाभ उठाना चाहिए। मानसिक स्वास्थ्य जैसे विषयों पर शैक्षणिक संस्थानों में नियमित रूप से वर्कशॉप सेमिनार आयोजित होना चाहिए। 4. सामाजिक सहभागिता: युवाओं को रचनात्मक गतिविधियों और समाज सेवा में जुड़ना चाहिए। जितना सामाजिक मेलजोल बढ़ेगा उतना व्यक्ति मन से हल्का होता है। इन युवाओं की मौत हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या हमारा समाज संवादहीन हो चुका है? क्यों कोई व्यक्ति इतना अकेला महसूस करता है कि उसे अपनी जान देना ही आखिरी विकल्प लगता है? कुंवर नारायण की पंक्तियां याद आ रही है, "कोई दुख मनुष्य के साहस से बड़ा नहीं, हारा वहीं है जो कभी लड़ा नहीं!" हर व्यक्ति का जीवन अनमोल है। कठिन समय में आत्महत्या के बजाय, हमें समस्याओं का समाधान खोजने की कोशिश करनी चाहिए। यह लेख लिखते वक्त भी अपने ही शहर से फिर एक आत्महत्या की ख़बर पढ़कर दुःख हुआ, इंदौर विजय नगर थाने में पुलिस आरक्षक रहे मुकेश लोधी ने फांसी लगाई। भारत में दुनिया भर में सबसे ज़्यादा आत्महत्याएँ होने का रिकॉर्ड है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की नवीनतम अप्रैल की रिपोर्ट के अनुसार, अकेले 2022 में क़रीब 171,000 लोगों की मौत आत्महत्या से हुई। जो देश की इतिहास में अब तक की सबसे ज़्यादा है।
जीवन: एक अनमोल तोहफा हर कठिनाई का समाधान संभव है, बशर्ते हम खुलकर अपनी समस्याएं साझा करें। आत्महत्या कोई समाधान नहीं, बल्कि एक पल की कमजोरियों का स्थायी फैसला है। समाज को साथ आकर एक ऐसा माहौल बनाना होगा, जहां हर व्यक्ति सुरक्षित और मूल्यवान महसूस करे। जीवन एक अनमोल तोहफा है ऊपर से मनुष्य का जीवन और भी ज़्यादा कीमती है। सनातन धर्म के मुताबिक, 84 लाख योनियों में भटकने के बाद ही मनुष्य जन्म मिलता है। पद्म पुराण में लिखा गया है कि 84 लाख योनियों में से 9 लाख जलचर, 30 लाख पशु, 20 लाख पेड़-पौधे, 11 लाख कीड़े, 10 पक्षी और 4 लाख मानवीय नस्लों के बाद मनुष्य जीवन नसीब होता है। इसे यूं ही ज़ाया नहीं किया जा सकता। कुछ दिनों पहले कही पढ़ा था, "संघर्ष के अंधेरे से अपने हौसलें कमजोर ना होने दें... समय का ग्रहण तो सूरज और चंद्रमा भी झेलते हैं!"

Comments

  1. आज के समय में ऐसा लगता हैं कि यही सच है सब संवादहीन हो रहे है, आत्महत्या कायर लोग करते है, नैवेद्य जी हारा वही जो लड़ा नहीं, बहुत खूब लिखा है।
    ऐसा लगता हैं तुम परिपक्व होते जा रहे हों अपनी उम्र से ज्यादा समझदार हो रहे हों । गुड।

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