फेसबुक का मानवाधिकारों पर दोहरा रवैया: विश्व मानवाधिकार दिवस पर एक विश्लेषण
(नैवेद्य पुरोहित)
विश्व मानवाधिकार दिवस पर यह सवाल उठाना बेहद जरूरी है कि क्या टेक दिग्गज कंपनियां मानवाधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को निभा रही हैं? फेसबुक, जो कभी बोलने की आजादी का प्रतीक माना जाता था, आज मानवाधिकारों और नफ़रत फैलाने वाली सामग्री के प्रति अपने दोहरे रवैये के कारण कटघरे में है।
न्यूज़लॉन्ड्री की वरिष्ठ पत्रकार निधि सुरेश के एक लेख में बताया गया है कि फेसबुक पर भारत में सत्ताधारी दल और उससे जुड़े लोगों के भड़काऊ बयानों और नफ़रत भरे कंटेंट पर कार्रवाई न करने का आरोप है। भारतीय जनता पार्टी के नेता कपिल मिश्रा ने फरवरी माह में एक भड़काऊ भाषण दिया था, जिसकी रिकॉर्डिंग सोशल मीडिया पर जमकर साझा की गई। इस भाषण को उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों को उकसाने वाली घटना के तौर पर माना गया, जिसमें 53 लोगों ने अपनी जान गंवाई और 200 के करीब घायल हुए।
जून में, फेसबुक के मालिक मार्क जुकरबर्ग ने अपनी कंपनी के 25,000 कर्मचारियों के साथ मीटिंग के दौरान इसी भाषण का सरसरी तौर पर ज़िक्र, सोशल मीडिया और हिंसा के बीच के रिश्ते को रेखांकित करते हुए किया। भारतीय बाजार में अपना व्यवसाय बचाने के लिए फेसबुक ने जानबूझकर अपनी नीतियों को अनदेखा किया। कंपनी के भारतीय अधिकारियों ने राजनीतिक दबाव के चलते सत्ताधारी दल से जुड़े व्यक्तियों के विवादास्पद पोस्ट्स को प्लेटफॉर्म पर बनाए रखा। भारत, जहां फेसबुक के 37 करोड़ से अधिक सक्रिय उपयोगकर्ता हैं, कंपनी के लिए सबसे बड़ा बाजार है और इसे खोने का खतरा उठाने के बजाय फेसबुक ने अपने नियमों की बलि दी।
यह रवैया न केवल फेसबुक की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि इसके एल्गोरिदम भी विवादास्पद और नफ़रत भरी सामग्री को प्राथमिकता देते हैं। इसका सीधा असर समाज में ध्रुवीकरण और हिंसा के बढ़ते मामलों के रूप में देखा जा सकता है।
यह लेख न्यूज़लॉन्ड्री द्वारा प्रकाशित किया गया है, जो एक स्वतंत्र मीडिया संगठन है। हाल ही में ग्लोबल इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म नेटवर्क (जीआईजेएन) ने न्यूज़लॉन्ड्री, द न्यूज मिनिट और स्क्रॉल के साझा प्रयास ‘प्रोजेक्ट इलेक्टोरल बॉन्ड’ को 2024 में भारत की सर्वश्रेष्ठ खोजी रिपोर्टिंग में से एक के रूप में चुना है। मालूम हो कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम को असंवैधानिक करार दिया था। साथ ही कोर्ट ने इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए मिले चंदे की जानकारी सार्वजनिक करने की भी बात कही थी। न्यूज़लॉन्ड्री की खासियत यह है कि यह न तो सरकारी और न ही निजी विज्ञापनों पर निर्भर है। यह पूरी तरह से 'सब्सक्रिप्शन मॉडल' पर काम करता है, जहां इसका स्वामित्व आम जनता के पास है।
बीबीसी और डीडब्ल्यू जैसे अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने दशकों से इस मॉडल की सफलता को साबित किया है। यह यूरोपीय देशों में तेजी से बढ़ता चलन है, ताकि मीडिया किसी भी प्रकार के सरकारी या कॉरपोरेट दबाव से मुक्त रहे और निष्पक्षता बनाए रख सके।
आज जब दुनिया भर में अभिव्यक्ति की आज़ादी पर खतरे मंडरा रहे हैं, निष्पक्ष और पारदर्शी मीडिया का समर्थन करना पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। फेसबुक जैसी बड़ी कंपनियों के मानवाधिकारों पर दोहरे मापदंडों को उजागर करना और स्वतंत्र मीडिया का समर्थन करना हमारे लोकतंत्र और समाज की रक्षा के लिए बेहद जरूरी है।
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