ई-सिगरेट: आधुनिक जहरीले नशे की लत!
(नैवेद्य पुरोहित)
सरकार की सख्ती के बावजूद बाजार में खुलेआम उपलब्ध हैं 'वेप्स'
भारत सरकार ने साल 2019 में ई-सिगरेट को प्रतिबंधित कर एक बड़ा कदम उठाया था। "इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट निषेध (उत्पादन, निर्माण, आयात, निर्यात, परिवहन, बिक्री, वितरण, भंडारण और विज्ञापन का निषेध) अधिनियम, 2019" के तहत न केवल इनके उत्पादन और बिक्री पर रोक लगाई गई, बल्कि इसके उल्लंघन पर कड़ी सजा और जुर्माने का भी प्रावधान किया गया है। इसके बावजूद, आज यह जहरीली लत बाजार में आसानी से उपलब्ध है। वेप्स और ई-सिगरेट आधुनिक नशे का नया रूप है जो कि युवाओं के लिए एक गंभीर स्वास्थ्य संकट बन चुका हैं।
सरकार की नीयत मजबूत, लेकिन जमीनी हकीकत अलग
भारत सरकार ने ई-सिगरेट के खिलाफ कड़े कानून बनाए है। पहली बार उल्लंघन पर एक लाख रुपये का जुर्माना और एक साल की जेल का प्रावधान है, जबकि दोबारा पकड़े जाने पर जुर्माना पांच लाख रुपये और तीन साल की जेल हो सकती है। इतने नियम कानून होने के बावजूद आज बाजार में ई-सिगरेट उतनी ही आसानी से उपलब्ध हैं जैसे कोकीन, एमडीएमए और अन्य अवैध नशीले पदार्थ।
किशोरों को जकड़ती यह जहरीली आदत
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट के अनुसार, 13-15 साल के किशोरों में वेप्स का इस्तेमाल वयस्कों की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है। कनाडा और इंग्लैंड जैसे देशों में युवाओं के बीच इन इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट्स का चलन पिछले तीन वर्षों में तिगुना हो गया है। भारत में भी हालात बेहतर नहीं हैं। आज का युवा ऐसे जहरीले पदार्थों को फैशनेबल और आधुनिक जीवनशैली का हिस्सा बनाकर पेश कर रहा है। किशोरों में इसकी बढ़ती लोकप्रियता सिर्फ एक आदत नहीं, बल्कि निकोटिन की गहरी लत का कारण बन रही है। निकोटिन, जो ई-सिगरेट के मुख्य तत्वों में से एक है इंसान के अंदर बेहद नशे की लत पैदा करता है। विशेषज्ञों का कहना है कि ई-सिगरेट का उपयोग मस्तिष्क के विकास को प्रभावित करता है, सीखने की क्षमता को कम करता है, युवाओं को शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर बनाता है।
सेहत के लिए सबसे बड़ा जहर
ई-सिगरेट में निकोटिन के अलावा प्रोपलीन ग्लाइकोल, ग्लीसरीन और 30 से अधिक अन्य रसायन मौजूद होते हैं। जब इन्हें गर्म करके एरोसोल (वाष्प) में बदला जाता है, तो यह जहरीले पदार्थों का उत्पादन करते हैं। ये पदार्थ फेफड़ों और हृदय को नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ कैंसर का भी मुख्य कारण बन सकते हैं। यहां तक कि एक साधारण वेप पॉड में उतना ही निकोटिन होता है जितना 20 सिगरेट में! डब्ल्यूएचओ ने चेतावनी दी है कि वेप्स की अधिक खपत से मिर्गी और झटके आने का खतरा भी रहता है।
अवैध बाजार पर रोक क्यों नहीं?
सवाल यह है कि इतने सख्त कानूनों के बावजूद वेप्स और ई-सिगरेट आसानी से कैसे उपलब्ध हैं? क्या यह सरकारी एजेंसियों की लापरवाही है या फिर अवैध कारोबारियों और तस्करों का प्रभाव इतना मजबूत हो चुका है कि ये कानून को ठेंगा दिखा रहे हैं? एक ओर जहां सरकार के अधिकारी नशामुक्ति के बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर ई-सिगरेट का कारोबार बड़े पैमाने फल-फूल रहा है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि बड़े-बड़े शहरों के स्कूलों, कॉलेजों और यहां तक कि ऑफिस में भी वेप्स का इस्तेमाल फैशन और स्टाइल के नाम पर बढ़ावा पा रहा है। दिल्ली एनसीआर के लगभग सभी कॉलेजों में इसे बेचने का, युवाओं को लत लगवाने का बड़ा रैकेट चल रहा है।
सरकार की सभी एजेंसियों को मिलकर इन तस्करों पर शिकंजा कसना होगा। स्कूलों और कॉलेजों में जागरूकता अभियान चलाए जाएं ताकि युवाओं को इस खतरनाक लत और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों के बारे में जानकारी दी जा सके। ई-सिगरेट और वेप्स आज की पीढ़ी के लिए एक धीमा जहर हैं। यह फैशन नहीं, बल्कि बीमारी का प्रारंभ है। सरकार, समाज और परिवारों को मिलकर इसके खिलाफ लड़ाई लड़नी होगी। इस जहरीली लत को खत्म करना न केवल कानून की जिम्मेदारी है, अपितु हर नागरिक का दायित्व भी। यदि आज हमने इस समस्या को नहीं रोका तो यह आने वाली पीढ़ियों को विनाश की ओर धकेल देगा।
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इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट, और किसी भी तरह का नशा, खराब ही होता हैं, इसे सरकार को रोकना होगा अन्यथा आने वाली पीढ़ी नशे की गिरफ्त में होगी,
ReplyDeleteतुम्हारे जैसे नौजवान पत्रकार इस तरफ ध्यान आकर्षित करवा कर, जिम्मेदारों को अपनी जिम्मेदारी पूर्ण करने की याद दिला रहे है । ऐसे ही निष्पक्ष पत्रकार की जरुरत है देश को
जी सरकार को नियमों का पालन करवाना होगा। आपको मेरा लेख पसंद आया इसके लिए शुक्रिया।
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