हिमाचल की बर्फीली वादियों में 7 दिवसीय एनएसएस कैंप का अनमोल अनुभव
(नैवेद्य पुरोहित)
कहते हैं, हर यादगार यात्रा की शुरुआत एक छोटे से सपने से होती है। ऐसा ही एक सपना हमने एनएसएस कैंप के लिए देखा था। कैंप के नाम पर यह सिर्फ एक यात्रा नहीं थी, बल्कि एक ऐसा अनुभव था जिसने हमारे जीवन में कई खूबसूरत पल जोड़ दिए। यह 7 दिन का स्पेशल एनएसएस कैंप था जो हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में स्थित पुलगा गांव में आयोजित किया गया था। इसका आयोजन बेनेट यूनिवर्सिटी (टाइम्स आफ इंडिया ग्रुप) की एनएसएस यूनिट ने किया जो हम सभी की मेहनत और प्रतिबद्धता का नतीजा था।
शुरुआत की कहानी
आज से करीब एक महीने पहले सबकुछ तब शुरू हुआ जब हमने अपने डीन ऑफ स्टूडेंट अफेयर्स, डॉ. तनवीर अहमद सर को एनएसएस कैंप का प्रस्ताव दिया। यूजीसी की गाइडलाइंस में एनएसएस कैंप अनिवार्य है। उन्होंने तुरंत कहा था, "कसोल चलते हैं फिर।" इसके बाद की तैयारियां किसी फिल्म की पटकथा से कम नहीं थी। हमने तय किया कि हम वहां 25 से अधिक गतिविधियां करेंगे। हमारी पूरी टीम ने अपने फाइनल एंड सेमेस्टर परीक्षाओं के बावजूद इस कैंप को एक वास्तविकता बनाने के लिए दिन-रात मेहनत की। इस कैंप की योजना और क्रियान्वयन के लिए हमें कई चरणों से गुजरना पड़ा। सरकारी अधिकारियों से अनुमति लेने, बजट तैयार करने, स्थान और आवास सुनिश्चित करने जैसे महत्वपूर्ण कार्य से लेकर छोटी से छोटी बात भी ध्यान में रखते हुए सभी ने काम किया। आखिरकार, हमारी टीम के वाइस प्रेसिडेंट (मल्टीमीडिया) विशांत रंधावा ने कुल्लू जिले में पुलगा गांव और 'इंटू द वुड्स' नामक होमस्टे को हमारे कैंप के लिए उपयुक्त स्थान के रूप में चुना। हमारे ट्रेज़रर केशव गुप्ता और उनकी टीम ने बजट की पूरी तैयारी की, जिसे यूनिवर्सिटी से मंजूरी मिली। सरकारी अधिकारियों जैसे कि हिमाचल सरकार के पंचायती राज मंत्रालय के एडिशनल डायरेक्टर केवल शर्मा, कुल्लू के जिला पंचायत अधिकारी दयाराम ठाकुर, डिप्टी कमिश्नर कुल्लू तोरुल रवीश, एसएचओ, एडीएम, और पुलगा गांव की सरपंच ईश्रुदेवी से सभी आवश्यक अनुमतियाँ मेरे द्वारा ली गईं।
टीम के सदस्य:
16 सक्रिय एनएसएस वॉलंटियर्स और दो फैकल्टी सदस्यों की टीम तैयार की गई जो इस प्रकार थी:
1. वंश गुप्ता - एडवाइजर
2. आंचल मित्तल - एनएसएस प्रेसिडेंट
3. नैवेद्य पुरोहित - वाइस प्रेसिडेंट (पीआर एंड फाइनेंस)
4. साहिल अरोड़ा - वाइस प्रेसिडेंट (सोशल मीडिया)
5. विशांत रंधावा - वाइस प्रेसिडेंट (मल्टीमीडिया)
6. निक्षय ढींगरा - वाइस प्रेसिडेंट (मैनेजमेंट)
7. नमन गर्ग - ऑपरेशन्स हेड
8. आद्या रस्तोगी - सोशल मीडिया हेड
9. केशव गुप्ता - कोषाध्यक्ष
10. इश्विता बाटला - कंटेंट हेड
11. कुणाल बोथरा
12. धवल जैन
13. पियूष जैन
14. खुशी तंवर
15. मानव गर्ग
16. वंश राजपूत
फैकल्टी मेंबर्स:
1. डॉ. तनवीर अहमद
2. डॉ. अनुज भारती
यात्रा की शुरुआत और रोमांचक सफर
22 दिसंबर की रात, हम सभी ने यूनिवर्सिटी की ही 25-सीटर ट्रैवलर और इनोवा में बेनेट यूनिवर्सिटी से पुलगा गांव के लिए प्रस्थान किया। इनोवा में वंश गुप्ता, साहिल अरोड़ा, निक्षय ढींगरा, और तनवीर सर थे बाकी सभी ट्रैवलर में सवार थे। इनोवा इस वजह से लेना पड़ी क्योंकि हमारे साथ 50 किलो तक का राशन, स्टेशनरी किट, हाइजीन किट, शॉल, और भी बहुत कुछ सामान वितरित करने के लिए था। रास्ते में इनोवा के ड्राइवर को नींद आने लगी, एक पल ऐसा तक आया जिसमें इनोवा में बैठे लोगों की सुरक्षा तक खतरे में पड़ गई थी। वंश गुप्ता ने स्थिति संभाली और लगभग 200 किमी तक ड्राइव किया। बाद में ज़ीरकपुर में हमने स्टॉप लिया और इनोवा को बीच रास्ते में ही छोड़कर सभी को ट्रैवलर में समायोजित कर लिया क्योंकि इनोवा के ड्राइवर की हालत हिमाचल ले जाने तक की नहीं दिख रही थी!
जीवन की पहली बर्फबारी: 23 दिसंबर
हिमाचल प्रदेश की पतली, घुमावदार सड़कों और भारी ट्रैफिक के बीच 23 दिसंबर की दोपहर करीब 12 बजे मैंने अपनी जिंदगी की पहली बर्फ़बारी देखी। सफेद बर्फ़ की चादर ने मानो हमें स्वर्ग जैसा अनुभव कराया। जब मैंने पहली बार बर्फ गिरते देखा तो वह पल सचमुच मेरे लिए जादुई था।
पुलगा पहुंचने के लिए हमें 8000 फीट की ऊंचाई पर ट्रेक करना पड़ा। इतना सारा सामान लादना असंभव था इसलिए हम सभी ने बड़े सूटकेस पोर्टर्स को दे दिए। वह हमारा सामान लेकर ऊपर आए और थोड़ा बहुत जो बचा सामान था उसे हम पीठ पर टांग के भारी बर्फबारी के बीच संकरी पगडंडियों पर ट्रेकिंग करते हुए ऊपर ले आए। वह ट्रेकिंग वास्तव में किसी रोमांच से कम नहीं थी। हमारा ठहराव ‘इंटू द वुड्स’ में था, जो बर्फीले पहाड़ों के बीच बसा एक सुंदर सा होमस्टे था। यहां पहुंचते-पहुंचते हमें शाम 4 बज गई थी। ‘इंटू द वुड्स’ का माहौल किसी स्वर्ग से कम नहीं था हर तरफ सफ़ेद बर्फ़ की मोटी चादर ऐसा लगा मानो हम स्वर्ग में आ गए हो। वहाँ के मालिक प्रेम यरपा, उनकी पत्नी पालज़ुम यरपा और हेल्पर राहुल भैया ने हमें ऐसा महसूस कराया जैसे हम उनके परिवार का ही एक हिस्सा हों। प्रेम यरपा हिमाचल के कसोल में पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने 1992 में इस तरह के होमस्टे का कांसेप्ट शुरू किया था। आज जो आधुनिक सुविधाएं और नवाचार कसोल में देखे जाते हैं, इसका श्रेय प्रेम यरपा को जाता है। उनकी जीवनसाथी पालज़ुम यरपा ने हर कदम पर उनका साथ दिया। कई दशकों पहले उन्होंने लव मैरिज की थी उस समय उनके परिवार वालों ने उनके रिश्ते का विरोध किया, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। दोनों ने घर से भागकर अपनी नई जिंदगी शुरू की। दिन-रात मेहनत की और कसोल में पर्यटन के विकास का बीज बोया। उनके प्यार और संघर्ष की कहानी ने हम जैसी युवा पीढ़ी में प्रेरणा भर दी थी। रात में सारा सामान कमरे में रख, खाना खाने के बाद सभी आराम करने अपने-अपने कमरे में सोने चले गए थे।
कैंप का पहला दिन: 24 दिसंबर
हमने एनएसएस कैंप की शुरुआत संविधान की प्रस्तावना पढ़ने से की। इसके बाद रसोई में मदद, सहभोज, स्नो क्लिनिंग ड्राइव, क्रिसमस डेकोर, पारंपरिक कला सीखी और स्नोमैन बनाने जैसी गतिविधियां की। ये गतिविधियां न केवल हमारे शरीर को थका रही थीं (खासकर स्नो क्लिनिंग ड्राइव के दौरान फावड़े से और भी अन्य उपकरणों से हमने हमारे कॉटेज से लेकर कॉमन रूम तक का रास्ता बनाया), बल्कि हमें टीम वर्क और सेवा का महत्व भी सिखा रही थीं। सभी कार्य करने के बाद रात में क्रिसमस ईव के समय मज़ा आ गया था। सारा काम खत्म करके, क्रिसमस की सजावट और सफाई निपटाने के बाद, हमने साथ बैठकर पालज़ुम आंटी के हाथ का स्वादिष्ट डिनर किया। लेकिन शाम को भारी बर्फबारी के कारण बिजली चली गई और हम सबके फोन की बैटरी भी खत्म हो चुकी थी। इस स्थिति के बावजूद, हमने सबकुछ सकारात्मक बनाए रखा। हमने बाहर एक अलाव जलाया और उसके पास बैठकर आनंद लिया। प्रेम अंकल हमारे लिए क्रिसमस के जश्न के लिए 60 शॉट्स वाले पटाखे लेकर आए थे। राहुल भैया, जो 'इंटू द वुड्स' के हेल्पर हैं, उन्होंने हमारे लिए स्वादिष्ट ब्राउनीज बनाईं। हम सबने मिलकर डांस किया, गाने गाए, और खूब मस्ती की। आजकल ट्रेंड हो रहे प्रभु यीशु को लेकर पंजाबी गायको के द्वारा बनाए गए गीत पर नाचे। रात के 12 बजते ही हमने सारे पटाखे फोड़कर क्रिसमस मनाया। पहाड़ों पर बर्फबारी में रात के अंधेरे में घने जंगल के बीच वह पल वाकई अविश्वसनीय और जादुई था जैसे किसी सपने को जी रहे हों।
पुलगा गांव में सेवा कार्य: 25 दिसंबर
अगले दिन, हमने पुलगा गांव के निवासियों के साथ संवाद स्थापित किया और उनकी ज़रूरतों के आधार पर जो चीजें थीं उन्हें वितरित की। पुलगा जाने के लिए मैंने सरपंच ईश्रुदेवी से बात की और उन्हें कहा कि क्या वे कुछ लोग पहुंचा सकती है क्योंकि हमारे पास सामान बहुत सारा था करीब 50 किलो राशन, शॉलें, हाइजीन किट्स, मेडिकल किट्स, सेनेटरी पेड्स और भी बहुत कुछ जो हमें गांव में वितरित करना था। सरपंच ईश्रुदेवी ने न केवल सामान के लिए लोगों को भिजवाया बल्कि गांव के सरकारी स्कूल के शिक्षक शेर सिंह ठाकुर के साथ में स्वयं भी हमारा स्वागत करने और हमें गांव में ले जाने के लिए आई। हमारा होमस्टे एक ऊंचाई पर था और गांव जाने के लिए हमें पहाड़ उतर के नीचे जाना था और यह पहाड़ पूरा बर्फ से भरा हुआ पहाड़ था। बर्फीला पहाड़ एकदम स्टीप बीच में छोटी सी नदी जिसे पार करनी थी जैसे-तैसे हमने शुरू किया। एक पॉइंट पर आकर मैं इतना घबरा गया था क्योंकि मेरे लिए पहाड़ उतरना काफी मुश्किल है बजाय पहाड़ चढ़ने के। पहाड़ उतरने के लिए अच्छा बैलेंस चाहिए होता है और पहाड़ चढ़ने के लिए ऊर्जा ताकत चाहिए होती है। ऊर्जा तो मुझमें भरपूर है लेकिन बैलेंस बनाना मेरे लिए बड़ा कठिन है। वह तो सरकारी स्कूल के शिक्षक शेर सिंह ठाकुर सर का धन्यवाद जिन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे लेकर चले। गिरते पड़ते फिसलते स्लाइड मारते हुए आखिरकार मैं सभी के साथ गांव पहुंच गया। उस दिन हमने एक ही दिन में करीब 25 से ज्यादा गतिविधियां की जो अब तक का हमारा एक दिन में की गई गतिविधियों का हाइएस्ट रिकॉर्ड है। हमने नुक्कड़ नाटक, महिला सशक्तिकरण पर सत्र, सैनिटरी पैड डिस्ट्रीब्यूशन, स्वच्छता पर सत्र, फर्स्ट एड किट वितरण, बच्चों के साथ खेल, स्टेशनरी किट वितरण, शॉल वितरण, स्कूल की दीवार पर वॉल पेंटिंग, सार्वजनिक स्थानों का सौंदर्यीकरण, पेंटिंग रंग वितरण, एनिमल फीडिंग, ग्रामीणों के साथ सामुदायिक भोजन, नोटबुक वितरण, भोजन और किराना वितरण, कागज़ के बैग बनाने की शिक्षा, इको बैग वितरण, मानवाधिकार सत्र जैसी गतिविधियां की। शाम को वापस ऊपर जाकर खाना खाया, आराम किया और हम सभी दोस्त बातें करके जल्दी सो गए।
क्रिसमस के अगले दिन: 26 दिसंबर
क्रिसमस की अगली सुबह हम लोग तीन ग्रुप में बंट गए। एक ग्रुप राहुल भैया के साथ '360 डिग्री ट्रेक' करने गया। जबकि दूसरा वापस पुलगा गांव में घूमने फिरने और गतिविधियां करने गया। तीसरा ग्रुप जिसमें मैं, वंश भैया, आंचल दीदी, साहिल और नमन थे होमस्टे में ही रहकर दूसरी गतिविधियां की जैसे कि वॉल पेंटिंग। शाम को सब वापस आए साथ बैठकर खाना खाया और अपने दिनभर के किस्से सुनाने लग गए। रात में गप्पे मारकर हंसी मज़ाक करते हुए सब सो गए।
27 दिसंबर: बर्फ़ीली वादियों में सुकून
मौसम अब धीरे धीरे बदल रहा था, बारिश होने लग गई साथ ही फोरकास्ट में अगले दो दिन भारी बर्फबारी दिखा रहा था। बारिश की वजह से हमने कही भी ना जाने का निर्णय लिया और बर्फ़ की चादर के बीच हमने चाय, मैगी, नाश्ते, दोस्तों के साथ हंसी-मज़ाक का आनंद लिया। दोपहर बाद मौसम बिगड़ता देख हमने कसोल जाने का निर्णय लिया। लेकिन प्रेम अंकल ने हमें अगले दिन सुबह जाने की सलाह दी और किसी भी हाल में सुरक्षित नीचे तक पहुँचाने की जिम्मेदारी ली। रात में खाना खाकर सारा सामान पैक करके हम सो गए।
हिमाचल में आखिरी रात: 28 दिसंबर
28 दिसंबर की सुबह भारी बर्फबारी होने लगी जब हम पहुंचे थे तब भी भारी बर्फबारी हो रही थी और अब हम जा रहे थे इस वक्त भी तेज़ बर्फबारी हो रही थी। ऐसा लग रहा था कि हम जन्नत में है आसमान से रुई के गोले टपक रहे हैं इतनी प्यारी इतनी सुंदर बर्फ दिख रही थी। सब कुछ स्वर्ग सा दिख रहा था। हम सभी ने माइंस 20 डिग्री के खतरनाक मौसम परिस्थितियों में रहकर साबित कर दिया कि हमारा शरीर माइंस का तापमान भी सह सकता है और 50 डिग्री की गर्मी भी झेल सकता है! नीचे पहुंचकर हम लोग कसोल के लिए निकल गए जो रास्ता एक से डेढ़ घंटे में पूरा किया जा सकता था उसे पूरा करने में हमें 4 से 5 घंटे लग गए क्योंकि रास्ते भर हमें ट्रैफिक जाम मिला। लाखों पर्यटक अभी हिमाचल घूम रहे हैं और वहां की सड़के भी काफी पतली है। कसोल पहुँचकर, हमने सारा सामान रखा आराम किया और रात में सब तैयार होके डिनर के लिए कैफे गए। यह हमारे कैंप की आखिरी रात थी। मैं, वंश भैया, नमन, कुणाल, पियूष और धवल ने पूरी रात जागकर गपशप की और ताश का मजा लिया। सुबह 4:30 बजे हम सोए वह भी सिर्फ 3 घंटे के लिए क्योंकि हमें जल्दी निकलना था यदि हम सुबह नहीं निकलते तो ट्रैफिक में फंस सकते थे क्योंकि रविवार का दिन था।
सफर का अंत: 29 दिसंबर
29 दिसंबर को हम सुबह-सुबह कसोल से रवाना हुए। पूरे दिन ट्रैवल किया बीच में सुबह नाश्ते, दोपहर भोजन, शाम का नाश्ता, और रात के खाने के लिए जगह-जगह रुके। रात 12 बजे हम बेनेट यूनिवर्सिटी पहुंचे।
अंत में मैंने यह एहसास किया कि एक साल को सबसे खूबसूरत अंत देने का यह सबसे बेहतरीन तरीका था...सामने पहाड़ हो, साथ में जिगरी यार हो, हाथ में चाय और मैगी हो...। यह मेरी आखिरी लंबी कॉलेज ट्रिप थी जिसे मैं मेरी आखिरी सांस तक नहीं भूलूंगा। क्योंकि 2 महीने बाद मुझे इंटर्नशिप पर जाना है यह मेरा ग्रेजुएशन का फाइनल ईयर है। साल 2024 इतनी खूबसूरती के साथ अंत होगा यह मैंने कभी नहीं सोचा था। मैं सारी अथॉरिटीज को धन्यवाद देना चाहता हूं जिन्होंने इस यात्रा को सफल बनाने में अपनी भूमिका निभाई। जिन्होंने हर वक्त अनुमति दी चाहे कॉलेज के वाइस चांसलर, सीओओ, डीएसए, एनएसएस प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर या हिमाचल प्रदेश के सरकारी अधिकारी। तनवीर सर और अनुज सर के लिए मेरे पास शब्द नहीं है जितना कहूं उतना कम। हमारे साथ वहां ऐसी खतरनाक मौसम परिस्थितियों में साथ रहे, कैंप का हिस्सा बने, अपना खुद का विंटर वेकेशन त्याग कर अपनी फैमिली के साथ एंजॉयमेंट को त्याग कर उसे छोड़ हमारे साथ आए! एक जिम्मेदारी ली 16 बच्चों की जवाबदारी ली। इस चीज का मैं जितना धन्यवाद दूं उतना कम है! इस यात्रा ने मुझे बहुत कुछ सिखाया सेवा, दोस्ती, टीम वर्क और भी बहुत कुछ चीज़ों का महत्व बताया।
यह कैंप बेनेट यूनिवर्सिटी के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। क्योंकि अब तक ऐसी कोई भी स्टूडेंट बॉडी नहीं है जो 8000 फीट ऊपर हिमालय में गई और 7 दिन तक -20°c के खतरनाक तापमान में रहकर सेवा करके आई हो!
यह कैंप न केवल एनएसएस का हिस्सा था, बल्कि मेरी जिंदगी का सबसे खूबसूरत अध्याय भी था। 2024 का अंत इससे बेहतर नहीं हो सकता था!
"सफ़र था बर्फ़ीला पर दिलों में गर्मी थी,
दोस्तों के साथ हर घड़ी में नर्मी थी...
पहाड़ों की गोद में जो हमने पाया,
वो पल, वो यादें, वो साथ हर पल निभाया!"
#एनएसएस #स्पेशल_कैंप #इंटू_द_वुड्स #पुलगा #कुल्लू #कसोल #हिमाचल_प्रदेश #बेनेट_यूनिवर्सिटी









तुम्हारा ब्लॉग पढ़कर ऐसा फिल होता हैं जैसे कि हम भी इन सब जगह घूम रहे है..... यही तुम्हारे लिखने की शक्ति है, क्वालिटी है, स्टाइल है,
ReplyDeleteऐसे ही अच्छे लिखते रहना
जी बिल्कुल, बहुत बहुत धन्यवाद आपका
Delete