द साबरमती रिपोर्ट: गोधरा कांड की यादें

(नैवेद्य पुरोहित) एक फिल्म जो सच्चाई को उजागर करती है भारतीय सिनेमा हमेशा से सामाजिक मुद्दों, ऐतिहासिक घटनाओं और मानवीय भावनाओं को उकेरने का एक सशक्त माध्यम रहा है। फिल्म द साबरमती रिपोर्ट इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए 2002 में गुजरात में हुए गोधरा कांड पर आधारित एक मार्मिक प्रस्तुति है। निर्माता एकता कपूर और निर्देशक धीरज सरना की सूझबूझ, कलाकारों के प्रभावशाली अभिनय के जरिए यह फिल्म न केवल एक घटना का दस्तावेज़ है, बल्कि पत्रकारिता के सिद्धांतों, सत्य की खोज और सत्ता के प्रभावों का गहन विश्लेषण भी है। विक्रांत मेस्सी, राशी खन्ना और रिद्धि डोगरा जैसे प्रतिभाशाली कलाकारों के अभिनय से सजी यह फिल्म पत्रकारिता की जटिलताओं और सत्ता के खेल का आईना दिखाती है। 23 नवंबर शनिवार को जब मैंने यह फिल्म देखी तो यह केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि एक अनुभव था। जिसने मुझे पत्रकारिता में चौथी पीढ़ी होने के नाते समाज के प्रति अपने कर्तव्य पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर कर दिया। हर उस व्यक्ति को जो सत्य के प्रति सजग है उसे यह फिल्म जरूर देखनी चाहिए।
फिल्म की कहानी: सच का सफर फिल्म की शुरुआत 2002 के गोधरा कांड की पृष्ठभूमि से होती है। ट्रेन में आग लगने की घटना, उसमें मारे गए 23 पुरुष,16 महिलाएं, 20 बच्चें समेत कुल 59 लोग और उसके बाद भड़की हिंसा के दृश्य दर्शकों को झकझोर देते हैं। कहानी का केंद्र है एक युवा पत्रकार समर कुमार (विक्रांत मेस्सी), जो इस घटना की सच्चाई को सामने लाने का प्रण करता है। फिल्म दर्शाती है कि पत्रकारिता केवल खबरें दिखाने, समाज को सूचित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक जिम्मेदारी है। सच्चाई को सामने लाने की जिम्मेदारी, चाहे उसके लिए जीवन में कितनी भी कठिनाई क्यों न झेलनी पड़े। विक्रांत मेस्सी और राशि खन्ना, ट्रेन में आग लगने के पीछे की साजिश, राजनीतिक षड्यंत्र और सत्ता के खेल की तह तक पहुंचने के लिए संघर्ष करते हैं।
पत्रकारिता की चुनौतियों का यथार्थ चित्रण फिल्म का एक मजबूत पक्ष यह है कि पत्रकारिता के वास्तविक संघर्षों को सटीकता से उजागर किया गया है। 1. सत्ता और मीडिया का गठजोड़: फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे मीडिया पर सत्ता का दबाव होता है। जब सच को उजागर करने की एक पत्रकार कोशिश करता है, तो उसे न केवल धमकियां मिलती हैं बल्कि उसे अपने संस्थान से नौकरी से निकाल दिया जाता है। फिल्म का एक डायलॉग है, "पूरा देश सच जानने के लिए मीडिया की तरफ देखता हैं और हमारी मीडिया सच को दिखाने से पहले अपने ऊपर बैठे मालिकों को देखती हैं।" 2. सच और झूठ की लड़ाई: कहानी यह सवाल उठाती है कि क्या समाचार वह सच है जिसे पत्रकार अपने हिसाब से सामने लाना 'चुनते' है? क्या वाकई आज के अधिकांश मीडिया संस्थान झूठ बेच रहे हैं? झूठ परोसने से जो झूठ है वो सच नहीं बन जाएगा! फिल्म का संदेश साफ है - सच को छुपाया जा सकता है, पर उसे खत्म कभी नहीं किया जा सकता। फिल्म का एक डायलॉग है, "बदलते हिंदुस्तान में सबकुछ बदल जाएगा सिवाय सच के!" 3. भीड़ और हिंसा का सच: फिल्म में यह बात बहुत प्रभावशाली ढंग से सामने आती है कि भीड़ का इस्तेमाल कैसे किया जाता है। 27 फरवरी 2002 में गोधरा कांड में मारे गए निर्दोष लोगों का दर्द, उनके परिवारों की पीड़ा और राजनीतिक उद्देश्यों के लिए की गई हिंसा की सच्चाई दर्शकों को अंदर तक झकझोर देती है। निर्देशक ने नाटकीयता से बचते हुए इस घटना के हर पहलू को दर्शाने की कोशिश की है। रियल लाइफ फुटेज दिखा कर, डॉक्यूमेंट्री के रूप में सबकुछ बताया गया है आग कैसे लगी या लगवाई गई? यह मात्र एक दुर्घटना थी या सोची समझी साजिश? क्या इसे जानबूझकर सांप्रदायिक रंग दिया गया? फिल्म इन सवालों को उठाती है और दर्शकों को अपने विवेक से जवाब ढूंढने का मौका देती है। फिल्म का डायलॉग है, "ग़लती कुछ लोग करते है और सज़ा पूरी कौम को मिलती है। अपना मक़सद पूरा करने के लिए लोग इस्तेमाल करते है बेगुनाहों का।" 4. पत्रकार का संघर्ष: समर कुमार का किरदार उन सभी पत्रकारों का प्रतीक है, जो सच दिखाने के लिए अपनी जान की बाजी लगा देते हैं। एक पत्रकार अपने जीवन में किन कठिनाइयों से गुजरता है। एक संस्थान से बेवजह निकाले जाने पर किसी भी जगह नौकरी नहीं मिलती, हर जगह वह भटकता है। जो पत्रकार पहले जलने वालों को इंसाफ दिलाता था अब वो खुद ही झुलस रहा था। फिल्म का एक डायलॉग है, "जब कोई पूरी तरह गिर जाता है तो उसके पास ऊपर खड़े होने के अलावा कुछ नहीं बचता!"
फिल्म के मुख्य दृश्य: जो दिल पर गहरी छाप छोड़ते हैं ट्रेन में आग लगने का दृश्य: इस दृश्य में ट्रेन में आग लगाने की घटना का सजीव चित्रण किया गया है। यह दृश्य इतना वास्तविक है सारी रियल फुटेज दिखाई गई है जिससे कि दर्शक खुद को उस पल का हिस्सा महसूस करते हैं। भीड़ को उकसाना और हिंसा: फिल्म दिखाती है कि कैसे भीड़ को झूठ बोलकर भड़काया जाता है, एक आदमी दो झूठी कहानी बोलकर भीड़ को उकसाता है। फिल्म में सद्दाम सुपारीवाला नाम का किरदार भीड़ लाने के लिए अपनी बस्ती में जाकर कहता है कि स्टेशन पर सादिया बानो के साथ यात्री छेड़छाड़ कर रहे है फिर भीड़ अपने हाथों में पत्थर और डंडे लिए दौड़ पड़ती है। दूसरी कहानी में सद्दाम सुपारीवाला लोगों को जाकर कहता है स्टेशन पर चायवाले शाजिद बाटला का यात्रियों के साथ झगड़ा होता है और फिर सद्दाम भीड़ लेकर आता है। इस फिल्म में बताया गया कि कैसे निर्दोष लोग हिंसा की चपेट में आते हैं। यह दृश्य हमारी संवेदनाओं को झकझोर कर रख देता है। फिल्म का एक डायलॉग है, "असल में झगड़ा तो सिर्फ बहाना था पुरानी रंजिश का बदला लेने के लिए, झगड़ा कौम का नहीं था एक सोच का था जो दोनों को एक होने देना नहीं चाहती थी, उसी का नतीजा था यह कलंक - गोधरा कांड।"
फिल्म में हिंदी भाषा को लेकर जो कुछ डायलॉग्स है वे हमारे समाज में भाषा आधारित भेदभाव और मानसिकता को उजागर करते हैं। यह कटु सत्य है कि हिंदी बोलने वालों को आज भी अक्सर कई जगह पिछड़ा या कमतर समझा जाता है (कुछ लोग उन्हें बीमारू राज्यों से आएं हुए कहते है)। जबकि हिंदी न केवल हमारी मातृभाषा है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक पहचान और विरासत का आधार है। फिल्म की शुरुआत में एक डायलॉग में कहा गया है, "हिंदी मीडियम लोगों के लिए इंग्लिश मीडियम गर्लफ्रेंड नहीं सिर्फ़ इंग्लिश मीडियम कोर्स ही होता है।" यह उस मानसिकता पर कटाक्ष करता है जो अंग्रेज़ी को श्रेष्ठता का प्रतीक मानती है। हमारी सादगी और गहराई से भरी हिंदी, जिसे लोग "सीधी-सादी" समझते हैं, असल में हमारी आत्मा है। फिल्म में एक जगह डायलॉग आता है, "यहीं तो विडंबना है आज हमारे देश की सीधी-सादी हिंदी टेढ़ी लगती है और वो टेढ़ी-मेढ़ी अंग्रेजी सीधी लगती है।" ऐसा मुझे महसूस होने लगा है धीरे-धीरे ही सही पर अब विश्व में हिंदी हमारी पहचान बन रही है और 'इंडिया' सचमुच 'भारत' में परिवर्तित हो रहा हैं। फिल्म का एक डायलॉग यह भी है, "हिंदी पत्रकारों को कितनी ही तवज्जों मिलती हैं?" यह संवाद हिंदी पत्रकारों और हिंदी भाषी वर्ग की उन अनदेखी कठिनाइयों और संघर्षों को उजागर करता है, इसके बावजूद वे लोग सच्चाई और समाज के लिए काम करते हैं। हिंदी सिर्फ एक भाषा नहीं, बल्कि हमारे विचारों और संस्कृति की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है और यह जरूरी है कि हम अपनी इस पहचान पर गर्व करें।
मुझे फिल्म का अंतिम भाग जब स्क्रीन पर लिखा आता है सुप्रीम कोर्ट 2011 में इस घटना को सोची समझी साजिश करार देता है बहुत ही प्रभावशाली लगता है। मेरे लिए यह न्याय की जीत और सच की ताकत है। उस पत्रकार की जीत है जिसने अपनी जान की बाज़ी लगा कर, जीवन में हर मोड़ पर कठिनाई और संघर्षों का सामना किया। उसके बावजूद अपने कर्तव्य पथ पर अडिग रहा। निर्देशक ने हर दृश्य को इतनी खूबसूरती से गढ़ा है कि कहानी गहराई और गंभीरता के साथ दर्शकों तक सीधे पहुंचती है।
क्यों देखनी चाहिए यह फिल्म? यह फिल्म उन सभी के लिए है, जो समाज में सच्चाई और न्याय के पक्षधर हैं। पत्रकारिता के छात्रों और पेशेवरों को यह फिल्म इसलिए देखनी चाहिए, क्योंकि यह उनके पेशे की जटिलताओं और जिम्मेदारियों को बारीकी से दर्शाती है। यह फिल्म हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि हम किस हद तक सच्चाई से जुड़े हैं और क्या हम अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं?
सच्चाई का आईना द साबरमती रिपोर्ट केवल एक फिल्म नहीं है यह सच्चाई, पत्रकारिता और इंसाफ का एक आईना है। यह फिल्म दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती है कि समाज में सच्चाई को उजागर करना कितना कठिन है और इसके लिए कितना साहस चाहिए। यह फिल्म एक सशक्त संदेश है कि चाहे कितनी भी बाधाएं आएं, सच को दबाया नहीं जा सकता। हर उस व्यक्ति के लिए यह एक प्रेरणा है, जो सच्चाई और न्याय के लिए खड़ा होना चाहता है। "सच वही है, जो अडिग है। झूठ की इमारत चाहे कितनी भी ऊंची हो, एक दिन ढह जाती है।" #द_साबरमती_रिपोर्ट #एकता_कपूर #धीरज_सरना #विक्रांत_मेस्सी #राशि_खन्ना #रिद्धि_डोगरा #गोधरा_कांड #गुजरात_दंगे_2002

Comments

  1. अच्छी समीक्षा लिखीं है नैवेद्य
    निरंतर निखरते जा रहे हो, ऐसे ही अलग अलग विषय पर अच्छे, सरल शब्दों में नए नए ब्लॉग लिखते रहो , साबरमती रिपोर्ट देखना पढ़ेगी

    ReplyDelete
    Replies
    1. बहुत बहुत धन्यवाद

      Delete

Post a Comment

Popular posts from this blog

20 की उम्र में चारधाम पूरे, रिश्तों का पंचधाम भी जी लिया!

जड़ों से जुड़ाव की पुकार: एक बार फिर कुलदेवता के दरबार में!

मन की शांति का रहस्य: स्वीकार्यता है!