साहित्य आज तक 2024: एक अविस्मरणीय अनुभव

(नैवेद्य पुरोहित) बीते रविवार को मैंने इंडिया टुडे ग्रुप के लिट फेस्ट साहित्य आज तक में एक विज़िटर के रूप में भाग लिया। सप्ताह का आखिरी दिन एक बेहतरीन जगह पर बिताने के इरादे से मैंने इस कार्यक्रम के लिए रजिस्टर करने का फैसला लिया। मात्र ₹499 में सुबह से लेकर देर रात तक सभी स्टेज पर आयोजित कार्यक्रमों में शिरकत करने का मौका मिल रहा था जिसमें लल्लनटॉप का भी विशेष कार्यक्रम लल्लनटॉप अड्डा शामिल था। सुबह जुबिन नौटियाल के शो से लेकर देर रात श्रेया घोषाल के संगीत कार्यक्रम तक यह आयोजन कला, साहित्य और संगीत के दिवानों के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं था। कार्यक्रम की शुरुआत सबसे पहले सुबह जुबिन नौटियाल के ऊर्जा से भरपूर परफॉर्मेंस के साथ हुई जिसने पूरे दिन के लिए शरीर में एनर्जी भर दी। जुबिन ने अपने लगभग सारे फेमस गाने गाए दिल ग़लती कर बैठा है ग़लती कर बैठा है दिल....हम्मा हम्मा हम्मा...मेरी मां के बराबर कोई नहीं....आखिर में सबसे फेमस कबीर सिंह मूवी का बात बिगड़ी है इस कदर दिल है टूटा टूटे है हम तुझे कितना चाहे और हम....! पूरे दिन में मुझे सिर्फ़ दो चीज़ों ने काफी आकर्षित किया पहला शशि थरूर और राजदीप सरदेसाई का 'सियासत और साहित्य साथ-साथ' वाला सेशन और दूसरा 'ग्रैंड मुशायरा' जिसमें देश के नामी शायरों ने भाग लिया था वसीम बरेलवी से लेकर बॉलीवुड गीतकार शायर शकील आज़मी तक अज़हर इक़बाल से लेकर आलोक श्रीवास्तव तक इनके अलावा गौतम राजऋषि, फरहत एहसास, नवाज़ देवबंदी और एएम तुराज़।
सियासत और साहित्य साथ-साथ जुबिन नौटियाल के सेशन के बाद शशि थरूर और राजदीप सरदेसाई का सेशन था। 'सियासत और साहित्य साथ-साथ' इस विषय पर राजदीप सरदेसाई ने हर पहलू को छुआ बटेंगे तो कटेंगे से लेकर बांग्लादेश, कोहिनूर हीरा, हिंदुत्व और हिंदुइज्म, जातिगत जनगणना, हर चीज़ पर बेबाकी के साथ सवाल पूछे। वहां उन्हें देख कर ऐसा बिल्कुल नहीं लगा कि ये किसी एक विंग के पत्रकार है (जैसा कि कुछ तथाकथित लोग कहते है)। सामने कांग्रेस का नेता बैठा है उसकी पार्टी से भी निष्पक्ष होकर तीखे सवाल पूछे और सत्तारूढ़ दल के ऊपर भी बेबाकी से अपने विचार रखें। बात कांग्रेस अध्यक्ष पद को लेकर चली राजदीप ने बोला आपकी पार्टी के नेता एक ही परिवार के व्यक्ति को अध्यक्ष बनाते है या जो उनकी बात सुने उस व्यक्ति को इस पद पर बैठाते है। इस पर शशि थरूर ने कहा, "अगर उन्हें लगता है कि खड़गे साहब अध्यक्ष बने तो बनाए वे अच्छे आदमी हैं मैं तो कोई शिकायत नहीं करता। ये कोई भी नहीं कह सकता आज कि मैंने कोशिश नहीं की...मैं हर चीज़ के लिए प्रयास करने के लिए तैयार हूं।" इसके बाद बात शशि थरूर की बहुचर्चित किताब "व्हाय आई एम अ हिंदू"/ "मैं हिंदू क्यों हूं" पर हुई। बिना लागलपेट के राजदीप सरदेसाई ने सवाल पूछा कि आप कहते है आई एम प्राउड टू बी अ हिंदू लेकिन हिंदुइज्म और हिंदुत्व में फर्क देखते हैं। शशि थरूर ने भी इस सवाल का स्वामी विवेकानंद का उदाहरण देकर अच्छे से जवाब दिया। उन्होंने कहा, "बहुत बड़ा फर्क है मैं हिंदू हूं मेरे पिता हिंदू थे मेरा जन्म हिंदू परिवार में हुआ। स्वामी विवेकानंद ने कहा है जैसे कि कई नदियां कोई पहाड़ से कोई वैली से कहीं से निकल कर समुद्र में मिल जाती है वैसे ही हर किस्म के धर्म हर किस्म की प्रार्थना एक ही भगवान तक पहुंचते है। इक़बाल ने धर्म पर लिखा था, मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना। छोटे मन के लोग हिंदुत्व को एक राजनीति बनाए हुए है हिंदुइज्म कई सिद्धांतों और प्रथाओं वाला एक धर्म है, जबकि लोग हिंदुत्व को मान्यताओं, सिद्धांतों और प्रथाओं का एक संकीर्ण छोटी सोच थोपना चाहता है। हिंदुइज्म सबको स्वीकार करता है स्वीकृति का धर्म है, जबकि हिंदुत्व एक बहिष्कार का सिद्धांत है।"
इसके बाद बात सबसे ज्वलंत मुद्दे पर हुई बटेंगे तो कटेंगे! राजदीप सरदेसाई ने कहा, "हिंदुत्व का बहुत प्रचार होता है खासकर चुनाव के समय कि कुछ लोग बड़े गर्व से कहते है हम 'हिंदुत्ववादी' है और कुछ लोग समझते है कि हिंदू धर्म की सबसे बड़ी खूबी है "टॉलरेंस एंड एक्सेप्टेंस"/ सहनशीलता और स्वीकृति। आज के ज़माने के कई लोग समझते है कि यह हिंदुइज्म की कमज़ोरी है। इसलिए बटेंगे तो कटेंगे का नारा लगता है।" शशि थरूर ने इस बात पर कहा, "बहुत दुख की बात है लोग मज़हब के नाम पर, जाति के नाम पर बंटवारा करते है। हम सब एक है हिन्दी है हम वतन है हिन्दुस्तान हमारा।" राजदीप सरदेसाई ने बड़ी बेबाकी से कहा, "देश की राजनीति का यह तो कड़वा सच है हर नेता वोटबैंक की राजनीति करता है कोई हिंदू के नाम पर, कोई मुसलमान के नाम पर, कोई यादव के नाम पर, कोई ब्राह्मणवादी, यह तो हकीकत है शशि जी आप लेखक है इसलिए कह रहे है कि हमें इस सबसे दूर हट कर नई राजनीति बनानी चाहिए। लेकिन सच्चाई तो आप जानते है।" इस बात का जवाब शशि थरूर ने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर दिया और कहा, "इस्लामिक देशों के साथ आज हमारे देश के इतने अच्छे संबंध है तो मैं मोदी जी को कह रहा हूं कि जैसे आप मुसलमानों के साथ इतना अच्छा रूप दिखाते है दूसरे देशों के तो भारत के मुस्लिमों के साथ ऐसा क्यों नहीं दिखाते।" यहां से एक शब्द चर्चा में आया 'इस्लामोफोबिया' इसका मतलब इस्लाम धर्म या मुसलमानों के प्रति भय, घृणा, या पूर्वाग्रह पैदा करना। खैर, इस सवाल के बाद शशि थरूर ने कहा, "धर्मनिरपेक्षता हमारे देश में कभी नहीं चलेगी क्योंकि कोई भी धर्म से दूर नहीं रहना चाहता लेकिन पंथनिरपेक्षता तो चल सकती है।" अंत में वहां मौजूद लोगों ने प्रश्न पूछे वहां मौजूद एक महिला ने कहा कि हर राजनीतिक दल किसी न किसी के लिए किसी भी नाम पर वोट मांगता है क्यों ना आप एक अपना स्वतंत्र राजनीतिक दल बनाए आपको अध्यक्ष बनने के लिए लड़ना भी नहीं पड़ेगा! इस सवाल के बाद सबने तालियां बजाई सीटियां बजी। शशि थरूर ने कहा, "क्या आप कोई पुजारी के लिए वोट दे रहे है या किसी काम के लिए वोट दे रहे है। नेता का काम मंदिर चलाना नहीं है सरकार चलाना है तो काम के लिए लोग उन्हें वोट दे।" इस सवाल के बाद वहां मौजूद एक बुजुर्ग महिला ने पूछा, "जब इंग्लिश में हम 'यूनाइटेड वी स्टैंड, डिवाइडेड वी फॉल' कहते है तो किसी को दिक्कत नहीं होती लेकिन हिंदी में हम बटेंगे तो कटेंगे कहते है तो इतना बवाल क्यों?" इस पर शशि थरूर ने कहा, "मैं आपसे सहमत हूं हम एक है तो हमें एक भारतवासी की तरह रहना चाहिए। भारतवासी एक है तो भारतवासी सेफ है।" राजदीप सरदेसाई ने भी उस महिला को जवाब दिया, "मैडम स्लोगन एक बात होती है और स्लोगन के पीछे इरादा क्या है वह दूसरी बात होती हैं। अगर इरादा नेक है तो बहुत अच्छा है लेकिन जब इरादा नेक नहीं है तो प्रॉब्लम होती है।" सत्र का आखिरी सवाल भी दमदार था जातिगत जनगणना को लेकर जिस पर शशि थरूर ने कहा, "मैं कभी नहीं चाहता कि किसी भी प्रकार का बंटवारा हो एक बार हमारी भूमि में बंटवारा देश का बंटवारा हो चुका है मैं नहीं चाहता कि इस बार हमारी आत्मा में बंटवारा हो। नेहरू जी और अंबेडकर एक बात पर यूनाइटेड थे कि जातिवाद गायब हो जाना चाहिए इस देश से..." इस पर मौका पाते ही राजदीप सरदेसाई ने कह डाला, "आप ही की पार्टी के नेता कहते है जितनी आबादी उतना हक़! जातिगत जनगणना की मांग आपकी पार्टी कर रही है इसके बाद क्या होगा जातिगत जनगणना कर लीजिए लेकिन इसके बाद होगा क्या आखिर ?" शशि थरूर का इस विषय पर कहना था, "इसके बाद हम असली पिक्चर बता देंगे ज़रूरी नहीं है कि हम सबकुछ मैथेमेटिकल फॉर्मूला से करें कि जितनी आबादी उतना हक़। हम सिर्फ़ यह कह रहे है कि असली हकीकत जानने दीजिए।" राजदीप सरदेसाई ने आखिरी में जनता से भी अपील की, "अगली बार जब आप अख़बार में क्लासीफाइड में पढ़ेंगे न कि सर्चिंग फॉर अ फेयर लुकिंग ब्राह्मण गर्ल/बॉय तो उसका भी विरोध कीजिएगा, केवल आरक्षण से नहीं होगा आपको अपनी सोच भी बदलनी पड़ेगी" वाकई यह सत्र बेबाकी के साथ हर मुद्दे को छूने वाला रहा।
ग्रैंड मुशायरा मुशायरा में मुझे वसीम बरेलवी, शकील आज़मी, अज़हर इक़बाल और एएम तुराज़ की शायरियां सबसे बेहतरीन लगी जिन्हें मैंने रिकॉर्ड भी किया। आज के शायरों में मेरे पसंदीदा अज़हर इक़बाल है और उन्हें लाइव सुनना फिर अलग से फ़ोटो खिंचवाना मेरा दिन बन गया। कुछ शेर जो उन्होंने सुनाए मैं जस के तस यहां लिख रहा हूं...
"इतनी अच्छी क्यों नहीं लगती मुझे हकीकत में, जितनी मेरे ख्वाब में आती अच्छी लगती हो... इतना हसीं होकर भी आखिर कौन ना इतराए, तुम इतराओ तुम इतराती अच्छी लगती हो!" "बात बनाओ बात बनाती अच्छी लगती हो, खाओ झूठी कसमें खाती अच्छी लगती हो... सिगरेट बस यूं पीता हूँ तुम मना करो मुझको, तुम समझाओ तुम समझाती अच्छी लगती हो!" "वो चाँद और कोई आसमां पे रौशन है, सिया रात है उस की गली में जाना क्या!" "घुटन सी होने लगी है उसके पास जाते हुए, मैं खुद से रूठ गया हूं उसे मनाते हुए।" "तुम्हारे आने की उम्मीद बर नहीं आती, मैं राख होने लगा हूं दिए जलाते हुए" आखिरी में अज़हर इक़बाल ने अपनी कविता का पाठ किया 'यमुना ने पुकारा'। "वो सूर्य की बेटी है उसे मेघ ने पाला, है यम की बहन इसलिए कुछ रंग है काला, वो धरती पे आई तो सुमेरू ने संभाला, द्वापर में जिसे प्रेम से केशव ने निहारा, यमुना ने पुकारा यमुना ने पुकारा... यमुना ने पुकारा यमुना ने पुकारा... आकाश की ऊंचाई से एक बूंद में ढल कर, पर्वत की बुलंदी से वो आई थी निकलकर, रस्ता वो बना लेती थी चट्टानों पे चलकर, दिल्ली में जो पहुंची तो बनी जहर की धारा, यमुना ने पुकारा यमुना ने पुकारा... गस्त को बदलकर मुझे मजबूर किया है, तहजीब से अपनी ही मुझे दूर किया है, अनहद थी मैं तुमने मुझे महसूर किया है, मैं लाल किला ताज महल का थी सहारा, यमुना ने पुकारा यमुना ने पुकारा... सरसब्ज़ ही रहने दो मरुस्थल ना बनाओ, अमृत हूं मैं तुम मुझको हलाहल ना बनाओ, मैं आज हूं तुम गुजरा हुआ कल ना बनाओ, रूठी जो मैं तुमसे तो बदल दूंगी नजारा, यमुना ने पुकारा यमुना ने पुकारा... यमुना ने पुकारा यमुना ने पुकारा...! मुस्लिम शायरों का हिन्दू धर्म पर ज्ञान आज भी इस बात की तरफ इंगित करता है कि मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना। एएम तुराज़ के कुछ चुनिंदा शेर जो मुझे पसंद आए वे यहां लिख रहा हूं। उन्होंने शुरुआत इस बात से कहते हुए कि दुनिया की कोई भी तरक्की मोहब्बत के बिना मुमकिन नहीं है। "खुशी हमदम अगर होती मुझे रोने को क्या होता, उसे पा लिया होता तो फिर खोने को क्या होता!" "ख़राब हम हो गए सोहबत में जिसकी, बुरे हम हो गए सोहबत में जिसकी, बहुत मिस्टेक होती जा रही है... मोहब्बत फेक होती जा रही है, बुरे हम हो गए सोहबत जिसकी वो लड़की नेक होती जा रही है, तुझे मुझसे जुदा करने की खातिर ये दुनियां एक होती जा रही है, जन्मदिन तक सिमट आ गए है रिश्ते, मोहब्बत केक होती जा रही है!" "तुराज़ शेर सुनाने में सादगी लाओ, तुम्हारे बाल झटकने से लोग जलते है!" सभी शायरों में सबसे ज़्यादा तालियां और वाहवाही जिसने लूटी वे थे - शकील आज़मी साहब। मशहूर बॉलीवुड गीतकार शायर ने एक से बढ़कर एक शेर पढ़े।
"मैं थोड़ा-थोड़ा हर एक रास्ते में बैठा हूं, ख़बर नहीं है मुझे तू कहां से आई है।" "बादलों की तरह बारिश की कहानी में रहो, तुम मेरा ग़म हो आंख के पानी में रहो।" "इश्क़ किस से करूं बैराग कहां से लाऊं, दिल जलाने के लिए आग कहां से लाऊं, मेरे पानी से नमक छान लिया दुनिया ने... मैं किनारों के लिए झाग कहां से लाऊं!" "उसकी याद आई तो कुछ ज़ख्म पुराने निकले... दिल की मिट्टी को कुरेदा तो ख़ज़ाने निकले, शहर में करता था जो साँप के काटे का इलाज.. उसके तहख़ाने से साँपों के ठिकाने निकले !" "वो चोटी की बनावट हो या टोपी की सजावट हो, बिना इंसानियत के कोई सर पूरा नहीं होता!" "हर घड़ी चश्म-ए-ख़रीदार में रहने के लिए, कुछ हुनर चाहिए बाज़ार में रहने के लिए... मैंने देखा है जो मर्दों की तरह रहते थे, मसखरे बन गए हैं दरबार में रहने के लिए... अब तो बदनामी से शोहरत का वो रिश्ता है कि, लोग नंगे हो जाते हैं अख़बार में रहने के लिए!" "ख़ुदा पे छोड़ा दुआओं से घर नहीं बांधा, सफर पे निकले तो रख्ते-सफर नहीं बांधा, कमाया जैसे उसी शान से उड़ाया भी नोट पे कभी हमने रबर नहीं बांधा... नज़र से बांधा किसी ने किसी ने चेहरे से, तुम्हारी तरह मगर किसी ने उम्र भर नहीं बांधा !" "मैं तेरे बेवफा होने से परेशान नहीं, दिल लगाने को भी सारा जहां बाकी है"
अंत में प्रो वसीम बरेलवी साहब को बुलाया गया वो कहते है न कि सबसे महत्वपूर्ण चीज़ को आखिरी में ही बचा के रखा जाता है। उनकी शख्सियत का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब सभी शायरों का स्वागत किया जा रहा था सब तालियां बजा रहे थे लेकिन जैसे ही अंत में वसीम बरेलवी साहब का नाम लिया गया वहां मौजूद हर व्यक्ति खड़ा होकर सीटी बजा कर तालियां के साथ उनका स्वागत कर रहा था। उनके कुछ शेर प्रस्तुत है, "खफा तो क्या खफा सा हो गया है, ताल्लुक कितना गहरा हो गया है... ज़रा लड़ने की दिल में ठान ली तो, बड़ा खतरा ज़रा सा हो गया है!" "किसी कुटिया तक पहुंचकर ये सूरज कितना छोटा हो गया है, बढ़ी तो है गली कूचों की रौनक, मगर इंसान तन्हा हो गया है !" "तुझे सोचे तो फिर सोते कहां हैं, हम इतने बे अदब होते कहां हैं, बयान करते भी है, तो दिल की हालत... यह आंसू आंख के होते कहां है, बनाना पढ़ते हैं हिम्मत से अपनी, सफर में रास्ते होते कहां है, तेरा होने का वादा कैसे कर ले, हम अपने ही कभी होते कहां हैं!"
साहित्य आज तक और लल्लनटॉप अड्डा के इस कार्यक्रम में शामिल होकर मेरा दिन बन गया। इस आयोजन में शिरकत करना वाकई मेरे लिए अविस्मरणीय अनुभव रहा। राजदीप सरदेसाई, शकील आज़मी, अज़हर इक़बाल, बॉलीवुड अभिनेता अतुल तिवारी, पत्रकार पोहावाला के नाम से प्रसिद्ध दद्दन विश्वकर्मा, हिंद युग्म के शैलेश भारतवासी और कई अन्य मशहूर हस्तियों से मुलाकात करना और उनके साथ तस्वीरें खिंचवाना मेरे लिए किसी सौगात से कम नहीं था। साहित्य आज तक ने साहित्य, संगीत और कला के प्रति मेरे प्रेम को और गहरा कर दिया। यह दिन मेरे जीवन के सबसे खूबसूरत अनुभवों में से एक बन गया। #साहित्य_आजतक_2024 #लल्लनटॉप_अड्डा #सियासत_और_साहित्य_साथ_साथ #ग्रैंड_मुशायरा #जुबिन_नौटियाल #राजदीप_सरदेसाई #शशि_थरूर #वसीम_बरेलवी #अज़हर_इक़बाल #शकील_आज़मी #एएम_तुराज़ #पत्रकार_पोहावाला #हिंद_युग्म

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  1. बहुत अच्छा विवरण लिखा है साहित्य आज तक के कार्यक्रम का।
    ऐसे ही अच्छे कॉन्टेंट पर लिखते रहो

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