जाति का जुआ, संघ की रणनीति ने दिल छुआ: हरियाणा में भाजपा की जीत की कहानी
(नैवेद्य पुरोहित) हरियाणा विधानसभा चुनाव 2024 में भारतीय जनता पार्टी ने निर्णायक जीत हासिल की है हरियाणा के इतिहास में पहली बार किसी दल ने तीसरी बार राज्य में बहुमत के साथ सरकार बनाई है। एंटी इनकंबेंसी और कुछ आंतरिक मतभेदों के बावजूद, भाजपा ने जातिगत समीकरण और कूटनीति के तहत नेतृत्व परिवर्तन की बदौलत अपना दबदबा कायम रखा।
नेतृत्व परिवर्तन: खट्टर की जगह सैनी को लाया गया
चुनाव से पहले सबसे महत्वपूर्ण कदमों में से एक मार्च 2024 में मनोहरलाल खट्टर की जगह अचानक ही किसी नायाब सिंह सैनी नाम के व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाना था। खट्टर के नेतृत्व की आलोचना बढ़ती जा रही थी, क्योंकि उनके अंदर अहंकार और लोगों से बदतमीजी से बात करने के आरोप लग रहे थे। कई मतदाताओं में साफ़ तौर पर खट्टर के खिलाफ़ नाराज़गी देखी जा रही थी। दूसरी ओर, नायाब सिंह सैनी जो मिलनसार और लोगों के बीच में से आएं हुए व्यक्ति थे। भाजपा के लिए सत्ता विरोधी लहर से निपटने का हथियार बन गए थे। नायाब सिंह सैनी के नेतृत्व और उनकी गैर-जाट पहचान ने हरियाणा में भाजपा की लंबे समय से चली आ रही गैर-जाट राजनीतिक रणनीति को मजबूती दी। हरियाणा में 36 बिरादरियों में सबसे ज्यादा लगभग 27% आबादी जाट होने के बावजूद, भाजपा ने गैर-जाट वोट बैंक को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित किया। जिसमें ब्राह्मण, पंजाबी, बनिया, राजपूत और महत्वपूर्ण दलित और पिछड़ी जाति के मतदाता शामिल रहे। यह रणनीति 2014, 2019 में भी सफल रही थी और 2024 में एक बार फिर कारगर साबित हुई।
जातिगत गतिशीलता: भाजपा की गैर-जाट रणनीति
हरियाणा में जाति-आधारित मतदान पैटर्न बहुत गहराई से जड़ जमाए हुए हैं। भाजपा ने लंबे समय से गैर-जाट वोटों पर अपनी पकड़ मजबूत बनाएं रखी है और इन समुदायों पर भरोसा करना जारी रखा है। जबकि जाट आबादी ने पारंपरिक रूप से कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों का समर्थन किया है। पिछड़े और दलित समुदायों पर भाजपा का ध्यान निर्णायक साबित हुआ। हरियाणा में अनुसूचित जाति (एससी) की आबादी लगभग 20% है, जिसमें एससी उम्मीदवारों के लिए 17 आरक्षित सीटें हैं। 2019 में भाजपा ने इनमें से केवल 4 सीटें जीती थीं। हालाँकि इस बार भाजपा ने 8 एससी आरक्षित सीटें जीतने में कामयाबी हासिल की जो एक महत्वपूर्ण सुधार है।
संघ की भूमिका: इन दो बातों के अलावा जो तीसरी महत्वपूर्ण बात है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आरएसएस की महत्वपूर्ण भूमिका है। आरएसएस के तमाम स्वयंसेवको ने लोगों के घरों में डोर टू डोर कैंपेन किया। जिस किसी के घर में जाते उसे भाजपा की उपलब्धियां बताई और आने वाली पहल बताई। जिस घर में गए वहीं नाश्ता किया खाना खाया चाहे वो गरीब का घर हो या अमीर का। ये आरएसएस की परंपरा भी रही है। ऐसा नहीं है कि इस काम में कोई बाधाएं नहीं आई होंगी। जमीन पर भाजपा की नाराजगी को आरएसएस ने झेला और सभी रूठों को मनाया। जिस हरियाणा में जनता बीजेपी के नेताओं को क्षेत्र में घुसने नहीं दे रही थी, किसान लगभग दो साल से ललकारने के लिए लट्ठ लेकर बैठा था, युवा जवान अग्निवीर योजना से आगबबूले थे, पहलवानों पर हुए अत्याचार से हर तरफ़ आक्रोश था। ऐसे समय संघ ने घर-घर पर्चे पहुंचाए जिस पर कई सारे सवाल लिखे हुए थे जैसे कि, "क्या मेरा वोट ‘न एक जिला-न एक जाति, 36 बिरादरी अपने साथी’ के लिए जा रहा है?" (ध्यान रहे कि ये चुनाव जाट बनाम दूसरी सारी जातियों के बीच हुए) पर्चे के बाकी सभी पॉइंट्स भी ये तय कर रहे थे कि कांग्रेस के खिलाफ जबरदस्त माहौल बन सके। यह सबकुछ संघ की सफलतापूर्वक रणनीति के तहत चल रहा था।
सोनीपत: हुड्डा का गढ़ होने के बावजूद यह किला कैसे ढहा?
स्थानीय राजनीति की गहराई से समझ रखने वाले युवा प्रबल गर्ग के साथ हुए साक्षात्कार में उन्होंने बारीकी से हर पहलू बताएं। जिसका विश्लेषण करने के बाद मेरी समझ में यह आया कि हरियाणा में सोनीपत विधानसभा सीट सबसे ज़्यादा कांटे की टक्कर वाली सीटों में से एक थी। यहाँ भाजपा ने महापौर निखिल मदान को मैदान में उतारा जो चुनाव से ठीक 2 महीने पहले कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हो गए थे। भाजपा में अपेक्षाकृत नए होने के बावजूद, मदान की उम्मीदवारी पंजाबी समुदाय के वोट को सुरक्षित करने की पार्टी की रणनीति का हिस्सा थी। उल्लेखनीय है कि सोनीपत विधानसभा में कुल 2,50,000 के करीब मतदाता हैं जिनमें 72,000 मतदाता पंजाबी समुदाय के हैं। ये वहीं निखिल मदान है जिन्होंने राजनीति कांग्रेस की सीढ़ी पर चढ़ी, जिन्हें कांग्रेस ने महापौर का टिकट दिया और वह जीते भी। सवाल यह उठता है कि ऐसा क्या हुआ जो ऐनवक्त पर जज़्बात बदल गए? अंदरखाने की ख़बर यह थी कि निखिल के पिता और चाचा के खिलाफ ईडी ने केस दर्ज किया था। मौजूदा राजनीतिक हालातों को देखते हुए भाजपा को शायद इसी वजह से वाशिंग मशीन कहा जाता है। "माफ़ हो जाएंगे आरोप सारे, वाशिंग मशीन में धुल के तो देखो!" कहने वाले तो यह कहने से नहीं चूक रहे है कि निखिल मदान ने हरियाणा बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष मोहनलाल बड़ौली से 25 करोड़ रूपए में खरीदा!
निखिल मदान का मुक़ाबला कांग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवार 'सुरेंद्र पंवार' से था। जी हां 'सुरेंद्र पंवार' मुस्लिम समुदाय से आते हैं बताया जाता है कि उनके घर में मंदिर भी बना हुआ है। चौंकाने वाली बात यह है कि हरियाणा के इतिहास में दूसरी सबसे बड़ी जीत कांग्रेस के इन्हीं सुरेंद्र पंवार के नाम दर्ज है! उन्होंने 2019 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की कविता जैन को 32,861 वोटों से हरा दिया था। पेंच तब फसता है जब चुनाव से कुछ महीने पहले उनके ऊपर भी ईडी ने कारवाई कर दी मामला मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों से जुड़ा था। पंवार ने दो महीने जेल में भी बिताए थे लेकिन चुनाव प्रचार के लिए समय पर रिहा हो गए थे। कुछ समय बाद कोर्ट ने उन्हें बकायदा बाइज्जत बरी किया और यह माना कि सुरेंद्र पंवार की गिरफ्तारी अवैध थी! उनके परिवार ने तब तक मोर्चा संभाल रखा था। खासकर उनकी बहू समीक्षा पंवार ने उनकी अनुपस्थिति के दौरान उनके अभियान को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके बावजूद सुरेंद्र पंवार की कानूनी परेशानियों और भाजपा के पंजाबी कैंडिडेट और मजबूत प्रचार अभियान के कारण मुकाबला काफी करीबी रहा जिसमें निखिल मदान अंततः विजयी हुए। ऐतिहासिक रूप से भी देखा जाएं तो पंजाबी उम्मीदवारों ने अच्छा प्रदर्शन किया है पिछले 13 विधायकों में से 8 पंजाबी समुदाय से थे। मदान के जीत की राह पंजाबी मतदाताओं के समर्थन और मुस्लिम-ओबीसी, जाट समुदायों के विभाजन से आसान हुई।
परिणाम: भाजपा की राज्यव्यापी जीत
हरियाणा में भाजपा की जीत का श्रेय काफी हद तक उसकी गैर-जाट रणनीति और नेतृत्व परिवर्तन को दिया जा सकता है। कई प्रमुख मंत्रियों को खोने के बावजूद पार्टी एक सम्मानजनक वोट शेयर बनाए रखने में सफल रही। 2019 में भाजपा ने लगभग 37% वोट हासिल किए थे। 2024 में यह थोड़ा बढ़कर लगभग 40% हो गया जो मामूली बढ़त को दर्शाता है। दूसरी ओर कांग्रेस ने 2019 में अपने वोट शेयर में 28% से लगभग 40% की वृद्धि देखी जो दर्शाता है कि कांग्रेस ने बेहतर प्रदर्शन किया लेकिन वह अपने वोट शेयर को सीट शेयर में नहीं बदल सकी।
निष्कर्ष:
2024 के हरियाणा विधानसभा चुनावों ने यह दर्शाया है कि सत्ता विरोधी लहर और आंतरिक कलह जैसी महत्वपूर्ण चुनौतियों के बीच भी भाजपा की गैर-जाट रणनीति मजबूत बनी हुई है। यहां तक कि खट्टर से सैनी के नेतृत्व में बदलाव ने पार्टी की छवि को फिर से जीवंत करने में मदद की। सोनीपत जैसे निर्वाचन क्षेत्रों में जहां जातिगत गतिशीलता महत्वपूर्ण है भाजपा ने सावधानीपूर्वक उम्मीदवार चयन किया और सामुदायिक समर्थन पर ध्यान केंद्रित रखते हुए जीत हासिल की। जबकि कांग्रेस ने अपने वोट शेयर में तो सुधार किया पर राज्य नेतृत्व के भीतर भयंकर अंदरूनी कलह और कमज़ोर हाईकमान के कारण सीटें नहीं ला पाई। जो गलतियां आसानी से सुधारी जा सकती थी, बैठे बिठाए मिल रही जीत को हाईकमान ने हार में परिवर्तित कर दिया।
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गुड ,सही चुनावी विश्लेषण है यह
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