नकारात्मक सोच से समस्याएँ बढ़ती हैं, सकारात्मक सोच ही एकमात्र उपचार है - डॉ. स्वप्न गुप्ता

बेहतर मानसिक स्वास्थ्य के लिए मस्तिष्क को फिर से जोड़ने के लिए एक न्यूरोलॉजिस्ट की मार्गदर्शिका: बेनेट यूनिवर्सिटी में विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाया गया 10 अक्टूबर 2024 को बेनेट यूनिवर्सिटी के एचआर विभाग ने एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम आयोजित कर विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाया। मानसिक स्वास्थ्य के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए समर्पित इस दिन यूनिवर्सिटी के सारे डिपार्टमेंट्स के डीन, फैकल्टीज और एनएसएस वॉलंटियर्स ने भाग लिया। एनएसएस वॉलंटियर्स ने अपनी भागीदारी प्रोजेक्ट संवाद के अंतर्गत की थी। बेनेट यूनिवर्सिटी की एनएसएस इकाई में 6 प्रोजेक्ट्स चल रहें हैं। उन्हीं में से एक प्रोजेक्ट संवाद नाम की पहल है जो स्वास्थ्य जैसे विभिन्न विषय जिस पर समाज में जागरूकता लाने की ज़रूरत है उससे संबंधित कार्यशालाओं और कार्यक्रमों को आयोजित करता है। बहरहाल, डॉ. स्वप्न गुप्ता एमबीबीएस जो कि जी.बी. पंत इंस्टीट्यूट ऑफ पोस्टग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च, नई दिल्ली में न्यूरोलॉजी के प्रोफेसर है। उनके द्वारा संचालित इस सत्र में मानव मस्तिष्क के जटिल कामकाज और मानसिक स्वास्थ्य में इसकी भूमिका के बारे में गहन जानकारी प्राप्त हुई। एक ऐसी अवधारणा पर उन्होंने जोर दिया जिसने न्यूरोलॉजिकल और मनोवैज्ञानिक हलकों में बहुत अधिक लोकप्रियता हासिल की है: 'रिवायरिंग ऑफ ब्रेन'। उनका यह भाषण नहीं था बल्कि वास्तविक जीवन के उदाहरणों से भरा हुआ व्याख्यान था। जिनमें से एक उदाहरण ने वहां बैठे सभी लोगों को गहराई से प्रभावित किया।
निराशा के बीच आशा का मामला: सकारात्मक सुदृढीकरण के माध्यम से रिवायरिंग डॉ. गुप्ता ने एक बुजुर्ग व्यक्ति की दिल दहला देने वाली लेकिन प्रेरणादायक कहानी साझा की। बकायदा एक वीडियो के जरिए उन्होंने बताया कि कोरोना महामारी के दौरान उस बुजुर्ग व्यक्ति ने अपना सब कुछ खो दिया था - अपनी संपत्ति, परिवार और अंततः अपना स्वास्थ्य। भविष्य की चिंता, तनाव और डर की वजह से यह व्यक्ति एक गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारी से पीड़ित था साइकोसोमेटिक डिसऑर्डर याने मनोदैहिक विकार से पीड़ित था। जिसके कारण वह वॉकर की सहायता के बिना सीधा चलने में असमर्थ था। यहां तक कि वह वॉकर से भी ठीक से चल नहीं पा रहा था। विभिन्न अस्पतालों में उपचार करवाने और बुढ़ापे में जो कुछ भी बची हुई जमापूंजी की भारी रकम खर्च करने के बावजूद कोई भी डॉक्टर उसका इलाज नहीं कर पाया। आखिरकार, वह व्यक्ति डॉ. गुप्ता के पास पहुँचा जिनका उपचार करने का तरीका सबसे अलग रहा। केवल पारंपरिक उपचारों या महंगी दवाओं पर निर्भर रहने के बजाय डॉ. गुप्ता का तरीका मौलिक रूप से अलग था। उन्होंने उस व्यक्ति को बताया कि ये कुछ गोलियां हैं हाई पॉवर की इन्हें लेकर आप ठीक हो जाओगे। वास्तव में वो सामान्य मल्टीविटामिन की गोलियाँ थी जो कि उस व्यक्ति के ठीक होने की कुंजी बन गई। क्योंकि उन दवाओं के भीतर वह भावनाओं निहित थी जिन्हें डॉ. स्वप्न गुप्ता और उनकी टीम ने ट्रीटमेंट के वक्त उस बुजुर्ग व्यक्ति के मन में डाला: प्रेम, आनंद, खुशी, सशक्तिकरण, सपने, आशा, सच और किस्मत।
इस उपचार के माध्यम से डॉ. गुप्ता ने उस व्यक्ति को ठीक होने में मदद की न केवल उसके शरीर को, बल्कि उसके दिमाग को भी। उन्होंने उस व्यक्ति को फिर से सपने देखना, सकारात्मकता को अपनाना और ठीक होने की अपनी क्षमता पर विश्वास करना सिखाया। आखिर में उन्होंने उस व्यक्ति का दूसरा वीडियो बताया जिसमें ट्रीटमेंट के बाद वह व्यक्ति पूर्णतः स्वस्थ हो गया। बिल्कुल सीधा बिना झुके अपना मेरुदंड सीधा रख कर बिना वॉकर की सहायता के चल नहीं बल्कि दौड़ रहा था। इस उदाहरण ने उस अपार शक्ति को रेखांकित किया जो सकारात्मक सुदृढ़ीकरण और मानसिक पुनर्रचना शारीरिक स्वास्थ्य और समग्र कल्याण पर डाल सकती है। ब्रेन की रिवायरिंग करने का विज्ञान डॉ. गुप्ता की प्रस्तुति के मूल में यह विचार था कि मस्तिष्क में खुद को पुनर्रचना करने की क्षमता है। एक अवधारणा जो आधुनिक तंत्रिका विज्ञान में गहराई से निहित है। इसके लिए शब्द न्यूरोप्लास्टिसिटी है, जो मस्तिष्क की खुद को अनुकूलित करने और पुनर्गठित करने की क्षमता को संदर्भित करता है जिससे जीवन भर नए तंत्रिका संबंध बनते हैं। यह लचीलापन इस बात का आधार है कि हम कैसे नए कौशल सीखते हैं, चोटों से उबरते हैं और सबसे महत्वपूर्ण बात अवसाद और चिंता जैसी मानसिक स्वास्थ्य चुनौतियों पर काबू पाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, डिप्रेशन वैश्विक स्तर पर 300 मिलियन से अधिक लोगों को प्रभावित करता है और डब्ल्यूएचओ का अनुमान है कि डिप्रेशन 2030 तक लोगों में विकलांगता का एक प्रमुख कारण होगा। यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 15 से 24 वर्ष के बीच के सात में से एक युवा हमेशा डिप्रेसिव महसूस करता है या उसे कोई काम करने में बहुत कम रुचि होती है।
डॉ. गुप्ता के अनुसार इस समय भारत एक महत्वपूर्ण मानसिक स्वास्थ्य संकट का सामना कर रहा है। देश में वैश्विक स्तर पर डिप्रेशन के सबसे अधिक मामले हैं जिसमें 5.7 करोड़ लोग इस विकार से पीड़ित हैं। डिप्रेशन से थोड़ा कम एंग्जाइटी एक और व्यापक मुद्दा है, जिसे आम भाषा में मैं बेमतलब की चिंता कहना पसंद करूंगा। जो 3.8 करोड़ व्यक्तियों को प्रभावित करता है। ये चौंका देने वाले आंकड़े उन समाधानों की तत्काल आवश्यकता को उजागर करते हैं जो पारंपरिक दवा और चिकित्सा से परे हैं। इस बीमारी को केवल ब्रेन रिवायरिंग के जरिए या सकारात्मक सोच को अपना कर ही ठीक किया जा सकता है। मस्तिष्क को पुनः प्रोग्राम करना: पावलोव का डॉग एक्सपेरिमेंट और हेब्स लॉ
ब्रेन की पुनः वायरिंग करने की अवधारणा को समझाने के लिए डॉ. गुप्ता ने तंत्रिका विज्ञान में दो मूलभूत सिद्धांतों का उल्लेख किया: पावलोव का डॉग एक्सपेरिमेंट और हेब्बियन सिद्धांत प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक नोबेल पुरस्कार विजेता इवान पावलोव द्वारा किए गए डॉग एक्सपेरिमेंट में कुत्तों को घंटी सुनते ही लार टपकाने के लिए तैयार किया गया था क्योंकि उन्होंने ध्वनि को भोजन से जोड़ना सीख लिया था। इस सरल प्रयोग से पता चला कि बाहरी उत्तेजनाएँ किसी जानवर के मस्तिष्क को कैसे पुनः प्रोग्राम कर सकती हैं। मनुष्यों में यह सिद्धांत उसी तरह काम करता है जब हम बार-बार कुछ विचारों या भावनाओं का अनुभव करते हैं। उदाहरण के लिए, तनाव या नकारात्मक सोच के लगातार संपर्क में रहने से हमारा मस्तिष्क चिंता या अवसाद के साथ प्रतिक्रिया करने के लिए तैयार हो सकता है। हालाँकि, जिस तरह पावलोव के कुत्तों को तैयार किया गया था उसी तरह हम भी अपने मस्तिष्क को सकारात्मक उत्तेजनाओं को अधिक रचनात्मक भावनात्मक प्रतिक्रियाओं से जोड़ने के लिए तैयार कर सकते हैं।
हेब्ब का नियम: न्यूरोसाइंस में सबसे शक्तिशाली अंतर्दृष्टि में से एक हेब्ब का नियम है, "न्यूरॉन्स दैट फायर टुगेदर वायर टुगेदर" जो बताता है कि एक साथ काम करने वाले न्यूरॉन्स एक साथ तार बनाते हैं। इसका मतलब यह है कि जितना अधिक हम एक निश्चित विचार या व्यवहार को दोहराते हैं उस प्रक्रिया में शामिल न्यूरॉन्स के बीच संबंध उतने ही मजबूत होते जाते हैं। अगर हम लगातार नकारात्मक सोचते हैं या अपने डर पर ध्यान केंद्रित करते हैं तो नकारात्मकता आपके दिमाग के सारे न्यूरॉन्स पर हावी हो जाती हैं। लेकिन सचेत रूप से सकारात्मक विचारों पर ध्यान केंद्रित करके माइंडफुलनेस का अभ्यास करके और रचनात्मक गतिविधियों में संलग्न होकर हम अपने ब्रेन में नए फ्रेश हेल्दी न्यूरॉन्स सर्किट बना सकते हैं। मस्तिष्क के पुनर्निर्माण के लिए व्यावहारिक सुझाव काबिल ए गौर करने वाली बात यह है जैसा कि डॉ. गुप्ता ने जोर दिया स्वयं के मस्तिष्क का पुनर्निर्माण न केवल संभव है बल्कि एक गतिशील और सतत प्रक्रिया भी है। कैसे व्यक्ति बेहतर मानसिक स्वास्थ्य के लिए अपने मस्तिष्क को पुनः प्रोग्राम करना शुरू कर सकता हैं उसके लिए उन्होंने कुछ सुझाव दिए जैसे कि: 1. सकारात्मकता: सकारात्मक व्यवहार को दोहराना और वांछित परिणामों की कल्पना करना आशावाद और लचीलेपन से जुड़े न्यूरॉन्स कनेक्शन को मजबूत करने में मदद कर सकता है। उदाहरण के लिए असफलताओं या नकारात्मक विचारों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, "मैं मजबूत हूँ" या "मैं चुनौतियों पर काबू पाने में सक्षम हूँ" जैसे वाक्यों को दैनिक जीवन में रोज़ाना कहना आपके मस्तिष्क को तनाव के प्रति अधिक सकारात्मक रूप से प्रतिक्रिया करने के लिए पुनः संयोजित कर सकता है। 2. माइंडफुलनेस और मेडिटेशन: ये अभ्यास वर्तमान क्षण के बारे में जागरूकता को प्रोत्साहित करते हैं और व्यक्तियों को नकारात्मक विचार पैटर्न से मुक्त होने में मदद करते हैं। कई रिसर्च से पता चला है कि नियमित ध्यान वास्तव में मानव मस्तिष्क की संरचना को बदल सकता है। आत्म-जागरूकता और भावनात्मक विनियमन से संबंधित क्षेत्रों में ग्रे मैटर को बढ़ा सकता है। 3. रचनात्मक गतिविधियों में संलग्न होना: चाहे वह पेंटिंग हो, संगीत हो या लेखन, रचनात्मक गतिविधियों में संलग्न होना मस्तिष्क के सकारात्मक मार्गों को उत्तेजित करता है और अच्छी मानसिकता को जन्म देता है। रचनात्मक कार्य मस्तिष्क को नई संभावनाओं का पता लगाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं इस प्रकार नए न्यूरॉन्स कनेक्शन को मजबूत करते हैं। 4. शारीरिक व्यायाम: व्यायाम न केवल शारीरिक स्वास्थ्य के लिए बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी अच्छा है। नियमित शारीरिक गतिविधि डोपामाइन और सेरोटोनिन जैसे न्यूरोट्रांसमीटर के उत्पादन को बढ़ाती है, जो व्यक्ति के मूड को बदलने के लिए आवश्यक हैं। इसके अलावा व्यायाम न्यूरोजेनेसिस को बढ़ावा देता है जिससे नए न्यूरॉन्स का निर्माण होता है जो आगे चलके ब्रेन हेल्थ को सही रखने में योगदान देता है। 5. सामाजिक संबंध और भावनात्मक समर्थन: जिस तरह डॉ. गुप्ता ने बुजुर्ग व्यक्ति के लिए भावनात्मक समर्थन, प्यार और खुशी पर ध्यान केंद्रित किया उसी तरह सामाजिक संबंध मस्तिष्क के पुनर्निर्माण में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। दूसरों के साथ बातचीत करना, अपने विभिन्न अनुभवों को साझा करना और भावनात्मक समर्थन प्राप्त करना मस्तिष्क में उन मार्गों को सक्रिय कर सकता है जो खुशी और सुरक्षा की भावनाओं को बढ़ाते हैं।
अंत में इतना ही कहना चाहूंगा कि आज के समय हर व्यक्ति किसी न किसी रूप से अपनी मेंटल हेल्थ को नज़रअंदाज कर रहा है। बच्चे अपनी पढ़ाई को लेकर चिंतित है, युवा अपनी नौकरी को लेकर, उनसे थोड़े उम्र में बड़े लोग अपने व्यवसाय घर परिवार ऑफिस के कामकाजों, बच्चों की शादी, बुजुर्ग माता पिता के स्वास्थ को लेकर चिंतित है, बुजुर्गों में यह चिंता है कि उनके मरने के बाद उनकी पत्नी या पति की देखभाल कौन करेगा। हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में चिंता करके अपने मानसिक स्वास्थ को खराब कर रहा हैं। इससे निपटने के लिए मन में आशावाद को बढ़ावा देकर, सकारात्मक आदतें विकसित करके और मस्तिष्क को परिवर्तन करने की अविश्वसनीय क्षमता को समझकर हम मानसिक रूप से स्वस्थ भविष्य का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। लोग हज़ारों लाखों रुपए खर्च करते है कोई फलाना बाबा के आश्रम जा रहा है कोई सन्यासी बन रहा है तो कोई बीस पच्चीस हजार रुपए खर्च कर आर्ट ऑफ लिविंग या ऐसी अन्य संस्थाओं में जा रहे हैं। जबकि समस्या का समाधान स्वयं के अंदर ही हैं। हर चीज़ को खुशी से स्वीकार कर लेना चाहिए। परिवार में कोई गमी हुई, जीवन में कोई दुर्घटना हुई, या कुछ नकारात्मक हुआ तो भी उसे यदि हमने सहज रूप से चुनौती के रूप में स्वीकार कर लिया तब सारी समस्या खत्म हो जाएगी। कुछ दिनों पहले एक लाइन पढ़ी थी,"जीवन बहुत आसान और खुशहाल हो जाता है जब आपको यह एहसास होता है कि मिला तो प्रभु की कृपा, नहीं मिला तो प्रभु की इच्छा !" ~ नैवेद्य पुरोहित #न्यूरोलॉजी #न्यूरोसाइंस #ब्रेन_रिवायरिंग #साइकोसोमेटिक_डिसऑर्डर #न्यूरोप्लास्टिसिटी #डबल्यूएचओ #डिप्रेशन #यूनिसेफ #पावलोव_डॉग_एक्सपेरिमेंट #हेब्बस_लॉ #डॉ_स्वप्न_गुप्ता

Comments

  1. मेंटल हेल्थ पर अच्छा लिखा है, नैवेद्य,
    लाइफ में सकारात्मकता हमेशा रखना चाहिए, यह बेसिक नियम है , बाकी,, तो, यही सार है, मिला तो प्रभु की कृपा, नहीं मिला तो प्रभु की इच्छा

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद 🥰

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