निष्पक्ष पत्रकारिता का अनुसरण: आज के मीडिया परिदृश्य में चुनौतियाँ और अनिवार्यताएँ
बीबीसी में भारतीय भाषा कलेक्टिव न्यूज़रूम के संपादकीय अनुपालन प्रमुख राजेश प्रियदर्शी द्वारा अतिथि व्याख्यान
10 अक्टूबर 2024 को बेनेट यूनिवर्सिटी के टाइम्स स्कूल ऑफ़ मीडिया में राजेश प्रियदर्शी ने 'निष्पक्ष पत्रकारिता का अनुसरण' विषय पर अतिथि व्याख्यान दिया। वे लगभग पिछले ढाई दशक से बीबीसी में कार्यरत है और वर्तमान में बीबीसी में भारतीय भाषा कलेक्टिव न्यूज़रूम के संपादकीय अनुपालन प्रमुख हैं। प्रोफेसर डॉ. तिलक झा के द्वारा आयोजित इस ज्ञानवर्धक सत्र में मैंने निष्पक्ष पत्रकारिता की पेचीदगियों और इस राह पर आने वाली चुनौतियों का पता लगाया।
पत्रकारिता में विश्वास का महत्व
राजेश प्रियदर्शी ने इस बात पर ज़ोर दिया कि 'विश्वास' किसी भी मीडिया संगठन की आधारशिला होना चाहिए। उन्होंने कई व्यक्तियों से मिलने के अपने अनुभव को साझा किया जो एक टीवी समाचार चैनल लॉन्च करना चाहते है पर वो ऐसे स्पष्ट एजेंडे वाले व्यवसायियों या राजनेताओं के द्वारा फंडेड हैं जिनकी विचारधारा जगजाहिर हैं। ऐसे लोग कहते है कि शुरुआती कुछ वर्षों में हमें निष्पक्ष रहना पड़ेगा ताकि आम जनता के मन मस्तिष्क में एक भरोसेमंद मीडिया आउटलेट के रूप में अपनी पहचान स्थापित हो जाएं। इस बात से साफ पता चलता है कि आज भी पत्रकारों में डर है अपनी निष्पक्षता बनाए रखने के लिए जो कि होना भी चाहिए।
"कोई भी पूरी तरह से निष्पक्ष नहीं हो सकता"
उन्होंने पत्रकारिता में पूर्वाग्रहों को स्वीकार करने के महत्व को भी रेखांकित किया। हम सभी मनुष्य होने के नाते हमारी अपनी आस्थाएं हैं, हमारे अपने लाइक्स डिसलाइक्स है। जीवन में अपने अनुभवों, लोगों से बातचीत और जिस पृष्ठभूमि से हम आते है उनमें आकार लेने वाले अंतर्निहित पूर्वाग्रहों को लेकर चलते हैं। इन्हीं पूर्वाग्रहों को पहचानना और उन पर काबू पाना पत्रकारिता में सबसे कठिन और आवश्यक काम हैं। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि कोई भी पूरी तरह से निष्पक्ष कभी नहीं हो सकता और इस कमजोरी को स्वीकार करना सबसे चुनौतीपूर्ण है। एक बैलेंस बनाने के लिए खासतौर से न्यूज़रूम में यह एक डेली चैलेंज है और अंतहीन सिलसिला है जो आज भी चल रहा है व हमेशा चलता रहेगा।
निष्पक्षता का अर्थ यह नहीं है कि आप अगर कोई रेप केस के बारे में खबर लिख रहे हैं तब भी आप अपनी निष्पक्षता बनाएं रखो। कुछ अपवाद हैं जैसे कि हमारे मौलिक अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, मानवाधिकार, अपराध, नस्लवाद, हिंसा आदि। अगर इन विषयों पर भी आप अपनी निष्पक्षता दिखाओगे तो वह एक बोगस निष्पक्षता है।
निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए प्रमुख गुण
1. साक्ष्य-आधारित रिपोर्टिंग: अपनी रिपोर्ट का समर्थन करने के लिए उसमें तथ्यों, साक्ष्यों और सभी प्रमाणों के साथ अपनी बात रखें।
2. अपनी राय को चुनौती देने का साहस: पत्रकार को अपनी व्यक्तिगत मान्यताओं के खिलाफ जाने के लिए पर्याप्त साहसी होना अनिवार्य है।
3. समावेशीपन: विविध दृष्टिकोण और आवाज़ें पेश करना। उदाहरण के तौर पर उन्होंने समझाया कि उन सभी चीजों को कंज्यूम न करें जो मीडिया परोस रहा है, आप उनसे सवाल करें। एक ही खिड़की से नज़ारा न देखें बाहर जाइए और हर चीज पर गौर कीजिए। अगर हम जानना चाहते है कि आरएसएस क्या कर रहा है तो मैं सिर्फ पाञ्चजन्य या ऑर्गेनाइजर पढूंगा क्योंकि हमें पता है कि यह संघ का मुखपत्र है। इसी तरह अगर मुझे यह जानना है कि वामपंथी क्या कर रहे हैं तो मैं या तो फ्रंटलाइन पढूंगा या द हिंदू।
उचित निष्पक्षता की अवधारणा
बीबीसी "ड्यू इम्पार्शियलिटी" याने उचित निष्पक्षता की अवधारणा का उपयोग करता है यह मानते हुए भी कि पूर्ण निष्पक्षता अप्राप्य है। यह ऐसी अवधारणा है जो अपवादों को स्वीकार करती है जैसे मानवाधिकार उल्लंघन या लोकतांत्रिक मौलिक अधिकारों पर रिपोर्टिंग आदि। राजेश प्रियदर्शी ने समझाया कि एक अंतर्राष्ट्रीय ब्रॉडकास्टर होने के नाते बीबीसी किसी खेल में भी किसी एक देश की टीम का समर्थन नहीं करता। निष्पक्षता के प्रति बीबीसी की प्रतिबद्धता के कई उदाहरण साझा किए। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि किसी एक विवादास्पद मुद्दे पर बीबीसी की रिपोर्टिंग भारतीय और पाकिस्तानी दोनों दर्शकों की आलोचना का कारण बनती है। और यह आलोचना निष्पक्षता बनाए रखने में बीबीसी की सफलता को दर्शा रही है।
निष्पक्षता का पालन करने में चुनौतियाँ
इस पवित्र पेशे में निष्पक्षता का पालन करने में कई सारी चुनौतीयां आती है। सबसे बड़ी चुनौती है कि लोग हमें पसंद नहीं करते हैं और हमें इस बात को बिल्कुल आराम से स्वीकार करना चाहिए। जहां आपने अपनी निजी राय पसंद नापसंद या व्यक्तिगत विचारधारा से परे उठकर तथ्यों, साक्ष्यों के आधार पर कोई रिपोर्ट लिख दी तब जाकर आप सही मायने में अच्छे पत्रकार कहलाएंगे। ऐसा करते वक्त जो कुछ प्रमुख चुनौतियां मेरी समझ में आई वे है:
1. बाहरी दबाव: मीडिया समूहों के मालिकों के वाणिज्यिक हित, निवेशकों के एजेंडे और व्यक्तिगत पूर्वाग्रह। बड़े स्पष्ट रूप से उन्होंने समझाया कि जब आप एक पत्रकार हैं उस समय आपकी सोच अलग होना चाहिए। यदि आप मीडिया समूह के मालिक है तब आपका पहला लक्ष्य अपना वाणिज्यिक हित साधना रहेगा।
2. सनसनीखेज: तथ्य-आधारित रिपोर्टिंग के बजाए रेटिंग को प्राथमिकता देना। पीत पत्रकारिता करके ऐसी सनसनी फैलाना जिससे ज्यादा व्यूज और रेटिंग मिले यह निष्पक्षता नहीं पक्षधरता कहलाता है।इसके बजाए तथ्यों के आधार पर रिपोर्ट लिखना चाहिए।
युवा पत्रकारों के लिए सर्वोत्तम अभ्यास
मेरे जैसे कुछ पत्रकारिता के अभ्यर्थियों के लिए राजेश प्रियदर्शी ने कई सारी बातें समझाई। जैसे कि:-
1. विविध स्रोतों का उपभोग करें : खुद को विभिन्न दृष्टिकोणों से अवगत कराएँ। किसी एक या दो मीडिया समूह पर निर्भर ना रहे हर तरह की हर विचारधारा की खबरें पढ़ना चाहिए।
2. पूरी तरह से शोध करें: सारे तथ्यों और संदर्भों को सत्यापित ज़रूर करें। जिस जगह हम इंटरव्यू के लिए अप्लाई कर रहे हैं उस संस्थान के बारे में पूरी तरीके से अच्छे से रिसर्च करना चाहिए। किस तरह से वे रिपोर्ट लिखते हैं, किस सलीके से उनका काम करने का तरीका है आदि।
3. पहले लिखें, फिर प्रोड्यूस करें: व्यक्ति की लेखनी पर उनका काफी ज्यादा जोर रहा। हर तरह के कंटेंट को किस तरीके से लिखा जाता है इसका अभ्यास करना चाहिए।
4. सामान्य जागरूकता : वर्तमान घटनाओं पर अपडेट रहना जो कि पत्रकारिता में एक तरह से बुनियादी अनिवार्यता है।
निष्पक्ष पत्रकारिता का अनुसरण करना एक सतत दैनिक चुनौती है। राजेश प्रियदर्शी की अंतर्दृष्टि आत्म-जागरूकता, साक्ष्य-आधारित रिपोर्टिंग और प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करने के अलावा अपनी व्यक्तिगत राय को चुनौती देने में साहस के महत्व को रेखांकित करती है। पत्रकार के रूप में इन सिद्धांतों को अपनाना लोगों में मीडिया संगठनों के प्रति विश्वास और अखंडता को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है। पूर्वाग्रहों को स्वीकार करके, उचित निष्पक्षता का पालन करके और सर्वोत्तम प्रथाओं को अपनाकर पत्रकार रिपोर्टिंग के उच्चतम मानकों को बनाए रख सकते हैं। फेक न्यूज के इस युग में बीबीसी की निष्पक्ष पत्रकारिता सच्चाई की एक किरण के रूप में कार्य कर रही हैं।
मुझे राजेश सर की एक बात अन्दर तक जो छू गई वह यह लगी जब सत्र के आखिर में, मैं उनके पास फ़ोटो खिंचवाने के लिए गया तब उन्होंने कहा, "अरे मैं सेलिब्रिटी थोड़ी ना हूं"। इस बात का उत्तर मैंने उन्हें यह दिया, "नहीं सर मेरे लिए तो आप सेलिब्रिटी पत्रकार ही हैं।" तब उनका जवाब यह रहा कि, "नहीं बेटा एक पत्रकार को सेलिब्रिटी नहीं होना चाहिए जहां वह सेलिब्रिटी बन गया उसके अंदर का पत्रकार मर चुका होगा।"
मेरे दिल में यह बात इतनी गहराई तक अपनी जड़े जमा गई क्योंकि इतने बड़े पद पर होने के बावजूद बेहद सरलता से उन्होंने अपनी बात रखी जो कि मैं कभी नहीं भूलूंगा!
~ नैवेद्य पुरोहित
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तुम्हारा यह ब्लॉग, दुनिया के हर जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन के स्टुडेंट को जरूर पड़ना चाहिए, उनके लिए बहुत उपयोगी है।
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