एक युग का अंत: भारत ने खोया अपना 'अनमोल रतन'

(नैवेद्य पुरोहित) कल रात जब देश के मशहूर उद्योगपति रतन टाटा के निधन की मेरे पास व्हाट्सएप पर किसी ग्रुप से ख़बर आई तब पहला ख्याल मन में यही आया कि यह फेक न्यूज है। क्योंकि दो दिन पहले ही अपने निधन की सारी झूठी अफवाहों पर विराम लगाते हुए रतन टाटा ने पोस्ट किया था कि मैं पूर्णतः स्वस्थ हूं। बमुश्किल पांच से दस मिनट हुए होंगे और जिन सारे न्यूज पोर्टल्स का मैंने सब्सक्रिप्शन ले रखा है बारी-बारी से इस दुखद सूचना के नोटिफिकेशन आने लगे। आज रात जब मैं यह लिखने बैठा तो मेरा दिल अनगिनत भावनाओं से भर गया। बचपन से आज तक रतन टाटा की सरलता और महानता के बारे में सुनते, पढ़ते और देखते हुए आया हूं। एक ऐसे महान दूरदर्शी व्यक्ति जो भारत के सच्चे सपूतों में से एक थे। देश के उद्योग जगत को उनके द्वारा छोड़े गए खालीपन को स्वीकार करने के लिए लंबे समय तक संघर्ष पड़ेगा।
एक उद्योगपति के बेटे के रूप में, निजी तौर पर पत्रकारिता और राजनीति के अलावा किसी विषय से मैं आकर्षित हुआ हूं तो वह व्यापार और वित्त की दुनिया थी जो मुझे मोहित करती थी, यह स्वाभाविक भी है। भारत के तमाम बड़े उद्यमियों की भरमार के बीच एक नाम मेरे लिए सबसे ऊपर था - रतन टाटा। दिल से वह मेरे लिए बचपन से एक आदर्श व्यवसायी रहें हैं। जहाँ दूसरे अडानी, अंबानी, जिंदल, बिड़ला ये सब लोग लाभ और शक्ति से प्रेरित थे। कईयों पर भ्रष्टाचार के दाग लगे यह अलग बात है कि नवीन जिंदल जैसे लोग इस दाग को धोने के लिए 'वाशिंग मशीन' में शामिल हो गए। और ये दाग धुल भी गया केंद्रीय एजेंसियों से उन्हें 'राहत' भी मिल गई। खैर, ऐसे लोभी और भ्रष्टाचारियों की मंडी में रतन टाटा की विरासत सदैव बेदाग, करुणा और भारत की ज़रूरतों की गहरी समझ पर आधारित थी। मध्यम वर्ग के प्रति उनकी प्रतिबद्धता अटूट थी। टाटा नैनो को भला कौन भूल सकता है एक ऐसी कार जिसने ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री में क्रांति ला दी? रतन टाटा का भारत के आम आदमी के लिए सिर्फ़ 1 लाख रुपये की कीमत वाली कार को किफ़ायती बनाने का वादा कई लोगों को असंभव लगा। उन्होंने अपना वादा पूरा किया और लोगों को गलत साबित कर दिया। टाटा नैनो कार एक समय लाखों लोगों के लिए उम्मीद और आकांक्षा का प्रतीक बन गई थी। लेकिन यह सिर्फ़ उनकी व्यावसायिक सूझबूझ नहीं थी जिसने उन्हें सम्मान दिलाया यह उनका दिल था। कोरोना महामारी के दौरान उनके नेतृत्व में टाटा समूह ने राहत प्रयासों के लिए 2500 करोड़ रुपये का योगदान दिया। एक ऐसे समय जब पूरी दुनियां की बड़ी सारी कंपनियां अपने कर्मचारियों को निकाल रही थी सैलरी नहीं दे रही थी टाटा समूह ने अपने कर्मचारियों पर हजारों करोड़ रुपए न्योछावर किए। उन्होंने सुनिश्चित किया कि जिन लोगों की कोरोना काल में मृत्यु हुई है उनके परिवारों को उस कर्मचारी की 60वर्ष की उम्र तक मुआवज़ा, वेतन, आवास और चिकित्सा लाभ मिलेगा। और यहां तक कि फ्रंटलाइन कर्मचारियों के बच्चों की शिक्षा का खर्च ग्रेजुएशन तक पूरा कवर किया गया। यह रतन टाटा का भारत था - एक ऐसी भूमि जहाँ व्यापार और करुणा एक साथ थे।
रतन टाटा ने जीवनभर शादी क्यों नहीं की? आखिर वो क्या मज़बूरी थी जिस कारण उन्होंने शादी नहीं करने का फैसला लिया। दरअसल उनके पहले प्यार के बारे में कई सारे किस्से हैं। रतन टाटा ने अपनी योग्यता के आधार पर जवानी में ही कई महत्वपूर्ण मील के पत्थर स्थापित कर दिए थे। अमेरिका में लॉस एंजिल्स की कॉर्नेल यूनिवर्सिटी से आर्किटेक्चर की डिग्री पूरी करने के बाद वहीं उन्हें आर्किटेक्चर फर्म में नौकरी मिल गई। सबकुछ अच्छा चल रहा था इसी दौरान उन्हें जीवन में पहली बार किसी से प्यार हुआ। शादी और घर बसाने की योजनाएँ बन गई थीं लेकिन विधाता ने कुछ और ही तय किया था। यह वहीं समय था जब 1962 का भारत-चीन युद्ध आ गया और उनकी प्रेमिका के माता-पिता ने उन्हें भारत जाने से मना कर दिया। रतन टाटा अपनी दादी नवाजबाई टाटा के काफ़ी करीब थे। उनकी तबियत की देखभाल के लिए रतन टाटा ने भारत लौटने का फैसला किया। और फिर कभी अपने जीवन में प्यार की तलाश नहीं की इस तरह उनकी प्रेम कहानी हमेशा के लिए खत्म हो गई।
ऐसी दुनिया में जहाँ कॉर्पोरेट दिग्गजों को अक्सर संदेह की नज़र से देखा जाता है, रतन टाटा ने वो सम्मान अर्जित किया है जो कोई हासिल नहीं कर पाएगा। दूसरों की तरह वे किसी घोटाले या भ्रष्टाचार से दागदार नहीं थे। उनकी ईमानदारी की चमक किसी चमकदार बैलेंस शीट से भी ज़्यादा चमकीली थी। उनके द्वारा अपनाए गए कुछ जीवन मूल्य जो मेरी समझ में आएं वे है: सादगी: सबसे विनम्र स्वभाव रखना उनके इतने बड़े कद को झुठलाता था। तालमेल: हर चीज़ में उन्हें तालमेल बिठाना आता था कुछ बड़ा बनाने के लिए वे विविध व्यवसायों को एक साथ लाएं। दूरदर्शिता: देश में उनके विजन ने निश्चित रूप से उद्योग जगत को बदला। वन टाटा: अपने समूह में सभी कर्मचारियों को एक परिवार की तरह रखना। आज के इस कॉर्पोरेट युग में जहां आदमी स्वयं को सुबह 9 से 5 तक का एक कॉर्पोरेट मज़दूर कहने से नहीं चूकता वहां इस तरह की मिसाल बिरले लोग ही दे सकते है। इस एकता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ने पूरे राष्ट्र को प्रेरित किया। आज जब भारत जीवनभर साधारण तरीके से रहने वाले अपनी असाधारण छाप छोड़ गए इस महान विभूति के निधन पर शोक मना रहा है। लाखों लोग उन्हें नम आंखों से याद कर रहे है। हमें रतन टाटा को बहुत बहुत धन्यवाद देना चाहिए क्योंकि इस देश को उन्होंने यह सिखाया कि कैसे अपने व्यवसाय को ईमानदारी के साथ जीवनभर बेदाग छवि के साथ सफलतापूर्वक चलाया जा सकता है। उनकी यह विरासत पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करती रहेगी। #रतन_टाटा_अमर_रहें

Comments

  1. अच्छा लेख लिखा है नेवेद्य, उनकी विनम्रता, और ईमानदारी, लगातार मेहनत,प्रेरणा है सबके लिए...*रतन टाटा द ग्रेट*

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