इंडोनेशिया: सीमाओं से परे एक रोमांच, खोज, विकास और उत्साह से भरी यात्रा!

गुरुवार 13 जून का दिन था, नोएडा में टाइम्स नेटवर्क में एक नियमित कार्यदिवस, जहाँ मैं न्यूज़ लाइब्रेरी विभाग में अपनी ग्रीष्मकालीन इंटर्नशिप कर रहा था। सुबह सामान्य दिनचर्या में बीत गई थी मेटाटेगिंग करना, कुछ टेप्स जमाना आदि। मैं अपने लंच ब्रेक के लिए जाने ही वाला था कि कुछ ऐसा संयोग हुआ कि मेरे विदेश यात्रा के योग बन गए। मेरे इनबॉक्स में प्रोफ़ेसर डॉ. अभय बंसल जो कि हमारे बेनेट यूनिवर्सिटी में स्कूल ऑफ कंप्यूटर साइंस इंजीनियरिंग और इंटरनेशनल रिलेशंस के डीन है उनका एक ईमेल आया। विषय पंक्ति में लिखा था: "इंडोनेशिया इमर्शन प्रोग्राम" उत्सुकता से, मैंने ज़रा भी देर किए बिना ईमेल खोला। मेरी नज़रों ने फटाक से पूरे मेल को स्कैन किया और मुझे लगा यह अवसर वाकई बहुत अच्छा है। इंडोनेशिया में 10 दिवसीय एक ग्लोबल प्रोग्राम का हिस्सा बनने का मौका मिल रहा था। ईमेल के अंत में लिखी गई बात पर मेरा ध्यान गया, "सम्पूर्ण रूप से वित्तपोषित कार्यक्रम नोट: छात्रों को केवल यात्रा के लिए राउंड-ट्रिप एयरफेयर की लागत वहन करनी होगी।" यह पढ़कर मेरी धड़कनें तेज़ हो गई और मेरे अंदर न जानें क्यों उत्साह की लहर दौड़ आई। बिना किसी हिचकिचाहट के फ़ॉर्म पूरा पढ़ कर मैंने आवेदन दे दिया। मैंने राउंड-ट्रिप फ़्लाइट का खर्चा या अन्य किसी बात की चिंता की ही नहीं। वीज़ा, ट्रैवल इंश्योरेंस, दूसरे आवश्यक फ़ॉर्म सभी चीजे बाद में सुलझाई जा सकती थी। मुझे पता था कि यह एक ऐसा अवसर था जिसे मैं अपनी उंगलियों से फिसलने नहीं दे सकता था। मेरे अंदर कुछ कह रहा था कि यह एक गेम-चेंजर चीज़ हो सकती है और मुझे इसे मिस नहीं करना चाहिए। इसके कुछ दिनों बाद, मैंने अपनी अपेक्षाओं को नियंत्रित करने की कोशिश की। खुद को याद दिलाया कि यूनिवर्सिटी के हज़ारों अन्य आवेदक उसी स्थान के लिए होड़ कर रहे होंगे। धीरे-धीरे मैंने यह स्वीकार करना शुरू किया कि शायद मेरा फॉर्म सिलेक्ट नहीं किया। 6 जुलाई को जैसे ही मेरे फोन पर एक नई ईमेल सूचना आई। मैंने इसे खोला और अबकी बार विषय पंक्ति में लिखा था: "बधाई हो! आपको इंडोनेशिया में इमर्शन प्रोग्राम के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया है!"
मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था। मुझे याद है कि मैं पीजी के कमरे में बैठा था एक पल के लिए स्क्रीन को घूर रहा था। उस ईमेल को बार-बार पढ़ रहा था बस यह सुनिश्चित करने के लिए कि मैं कहीं कल्पना तो नहीं कर रहा हूँ। मुझे जो खुशी और उत्साह महसूस हुआ वह अवर्णनीय था। ऐसा लगा जैसे दुनिया मेरे उस फॉर्म भरने के निर्णय को पुरस्कृत कर रही हो। मेरी दूसरी अंतरराष्ट्रीय यात्रा होने जा रही थी और यह इंडोनेशिया की थी। एक ऐसी जगह जहाँ जाने का मैंने सिर्फ़ सोचा था। शॉर्टलिस्टिंग के बाद मैं खुद को हमेशा इंडोनेशिया के जंगलों में घूमते हुए, बीच पर शांत लहरों के पास, इंडोनेशियाई संस्कृति को आत्मसात करते हुए देख सकता था। मेरा इनबॉक्स जल्द ही अगले चरणों के बारे में आए ईमेल से भर गया था- दस्तावेज़ीकरण, क्षतिपूर्ति बांड, यात्रा बीमा, वीज़ा आवेदन, और बहुत कुछ। मुझे यह एहसास होने में ज़्यादा समय नहीं लगा कि इंडोनेशिया यात्रा के बारे में जितना आसान मैंने शुरू में सोचा था उससे कहीं ज़्यादा जटिल प्रक्रिया है। वीज़ा के लिए आवेदन करने से लेकर इंडेमनिटी बांड को पूरा करने तक ऐसे तमाम दस्तावेज़ से संबंधित चीजे मुझे कभी ना खत्म होने वाली सूची की तरह लग रही थी। वास्तव में हर एक फॉर्म जो सबमिट किया गया मेरी चेकलिस्ट पर प्रत्येक टिक लगा रहा था और मुझे इस शानदार यात्रा पर निकलने के एक कदम करीब ला रहा था। मैंने अलग-अलग कार्यालयों के बीच चक्कर लगाते हुए, फॉर्म भरते हुए, अपने दस्तावेज़ों को सत्यापित करवाते हुए और वीज़ा के लिए आवेदन करते हुए कुछ दिन बिताए। जैसे-जैसे मैं प्रत्येक कार्य को पूरा करता गया, मेरा उत्साह बढ़ता गया और इससे पहले कि मैं महसूस कर पाता, मेरे निकलने की तारीख तेज़ी से नज़दीक आ रही थी। मैं यह सोचने से खुद को रोक नहीं पाया कि कैसे एक सहज निर्णय जो मेरे लंच ब्रेक के समय जल्दबाजी में लिया गया था, एक ऐसे रोमांच की ओर ले जाने वाला था जो हमेशा मेरे साथ रहेगा।
मैं हर पल में खुद को डुबोने के लिए उत्सुक था चाहे वो खूबसूरत समुद्र तटों से लेकर विविध वन्यजीवों, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और अविस्मरणीय रोमांच तक। मेरा स्वभाव शुरू से ही उत्साहीलाल रहा हैं। नए लोगों से मिलने, दोस्ती करने और दुनिया भर के प्रतिभागियों के साथ अनुभव साझा करने को लेकर मैं बड़ा उत्सुक था। जैसे-जैसे दिन बीतते जा रहे थे मैं रोज़ याद करता कि यह सब कैसे शुरू हुआ था - एक ईमेल, एक त्वरित निर्णय और अब अपनी दूसरी अंतर्राष्ट्रीय यात्रा की तैयारी कर रहा था। मेरी पहली यात्रा दुबई की वह भी यादगार थी लेकिन इस बार कुछ अलग महसूस हो रहा था। शायद यह एहसास था कि यह यात्रा मेरे जीवन में एक नया अध्याय शुरू करेगी - खोज, विश्लेषण और व्यक्तिगत विकास से भरा एक अध्याय। नोएडा में एक साधारण दोपहर को जिस यात्रा के बारे में सोच रहा था अब वह मुझे इंडोनेशिया ले जाने वाली थी। जो मेरे जीवन का अब तक का सबसे रोमांचक अनुभव बन गई। मुझे नहीं पता था कि यह यात्रा मेरे अब तक के सबसे बेहतरीन अनुभवों में से एक साबित होगी अविस्मरणीय क्षणों, कई सारी सीख और नए दोस्तों से भरी यात्रा। उल्लेखनीय है कि मैं अगस्त के महीने पूरा घूम ही रहा था। 31 जुलाई को इंटर्नशिप खत्म हुई टाइम्स नेटवर्क में फेयरवेल हुआ। 1 अगस्त को हम चार दोस्त मैं जिया जयंत माही जयपुर निकल गए। 4 अगस्त को वापस आए, और 7 अगस्त को परिवार के साथ दक्षिण भारत यात्रा के लिए फ्लाईट थी। 15 अगस्त को रात इन्दौर पहुंचे। रक्षाबंधन का त्योहार मना के 21 अगस्त को बेनेट यूनिवर्सिटी पहुंचा। फिर 24 अगस्त की मेरी इंडोनेशिया की फ्लाइट थी और इंडोनेशिया की मेरी यात्रा 4 सितंबर को खत्म हुई। 24 अगस्त को रात करीब 11 बजे आईजीआई एयरपोर्ट टर्मिनल 3 से मेरी मलेशिया एयरलाइन्स की फ्लाइट थी। 3 घंटे पहले मैं 8 बजे करीब एयरपोर्ट पहुंच चुका था बोर्डिंग पास लेने और लगेज देने के बाद मैं जैसे ही आगे इमिग्रेशन काउंटर पर पहुंचा। वहां अत्यधिक भीड़ देखकर मुझे काफी गुस्सा आया। लंबी-लंबी कतारें महिलाएं बूढ़े बच्चें सब परेशान हो रहे। मुझसे पहले जिन लोगो की फ्लाइट थी उन्हें भारी देरी का सामना करना पड़ा। यह शर्मनाक था, छोटे-छोटे बच्चे रो रहे थे उनके माता-पिता संघर्ष कर रहे उन्हें मना रहें। बुजुर्ग लोग पीड़ा झेल रहे हैं डेढ़ घंटे से ज्यादा समय तक वो कतार में खड़े हैं। इस बात को मैंने एक्स पहले ट्विटर पर डीजीसीए और उड्डयन मंत्रालय को टैग कर पोस्ट कर दिया। इस तरह की मानवीय पीड़ा को कोई कैसे नजरअंदाज कर सकता हैं? यात्रियों के लिए किसी को कोई परवाह नहीं बस सरासर अक्षमता! स्टाफ बढ़ाएँ जाने चाहिए थे सिस्टम और क्लियर होना चाहिए था। मेरे पोस्ट करने के आधे घंटे के अन्दर दिल्ली हवाई अड्डे के टर्मिनल मैनेजर करण का फोन मुझे आया। इस मुद्दे को लेकर मैंने उनसे 10 मिनट तक बात की। उन्होंने बताया कि 15 अगस्त के बाद सुरक्षा अलर्ट था और त्योहार का सीज़न होने के कारण सभी सुरक्षा जाँचें बढ़ गई हैं, जिससे बैकलॉग बढ़ गया है। खैर, बेनेट यूनिवर्सिटी से हम 27 लोगों की एक ही फ्लाईट थी। मैं जैसे ही मलेशिया एयरलाइन्स की फ्लाइट में चढ़ा मुझे जो उत्साह महसूस हुआ वह पहले कभी नहीं हुआ था। मलेशिया एयरलाइन्स से बेहतर अब तक मुझे कोई भी एयरलाइन्स नहीं लगी। जो सुविधाएं और आराम उनके स्टॉफ ने दिया वह बेहतरीन था। फ्लाईट के अन्दर ब्लैंकेट, तकिए, हेडफोन, हर सीट पर टीवी, हर थोड़ी देर में कोल्ड्रिंक्स और स्वल्पाहार की व्यवस्था। बहुत ही आरामदायक सफ़र रहा। अब आगे और क्या होने वाला था इसकी प्रत्याशा ने मुझे एहसास दिलाया कि कभी-कभी सबसे अच्छे निर्णय वे होते हैं जो त्वरित होते है पल भर में लिए जाते हैं। यह एक ऐसी यात्रा की शुरुआत थी जिसने दूसरे तमाम देशों से आए लोगों से मुझे मिलाया। दुनिया के बारे में मेरी समझ को आकार दिया आखिरकार हमेशा के लिए मुझ पर एक अमिट छाप छोड़ी।
रातभर के सफर के बाद सुबह करीब 7 बजे हम कुआला लम्पुर मलेशिया पहुंच चुके थे। टाइमजोन बदल चुका था हमारी फ्लाइट इंडोनेशिया की 5 से 6 घंटे बाद दोपहर करीब 1:30 बजे की थी। कुआला लम्पुर एयरपोर्ट पर हम घूमते रहे और फिर 3 बजे करीब सुराबाया इंडोनेशिया पहुंच चुके थे। रात भर की लंबी यात्रा के बाद हम सभी इंडोनेशिया के पूर्वी जावा प्रांत की राजधानी सुराबाया पहुंच गए। यूनिवर्सिटी ऑफ एयरलांग्गा की तरफ से दो लोग हमें एयरपोर्ट पर लेने आए थे। मैं स्वयं को बार बार याद दिला रहा था कि यह सिर्फ़ एक सामान्य यात्रा नहीं हैं, बल्कि वैश्विक प्रतिभागियों की एक टीम के साथ सांस्कृतिक आदान-प्रदान, पर्यावरण को कैसे बचाया जा सकता है उसके बारे में सीखने और समुद्री जैव विविधता के बारे में जानने एक मौका हैं। पहला दिन: सुरबाया सुइट्स में आगमन और विश्राम 25 अगस्त को लैंडिंग के बाद हम सभी बस में बैठकर हमारे पहले पड़ाव की ओर अपने होटल सुराबाया सुइट्स पहुंचे। यहां हम सभी ने अपने रूममेट्स के साथ चेक इन किया। शाम को सबने आराम किया यह दिन शांति से बीता क्योंकि सभी ने आने वाले दिनों के लिए अपनी एनर्जी को बचा के रखा था।
दूसरा दिन: पर्यावरण स्वास्थ्य और सुराबाया नाइटलाइफ़ 26 अगस्त को सुराबाया में हमारा दूसरा दिन पर्यावरण स्वास्थ्य और वन हेल्थ पर आकर्षक व्याख्यानों के साथ शुरू हुआ। चर्चाओं में इस बात पर चर्चा हुई कि कैसे मानव स्वास्थ्य पशु और पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य से निकटता से जुड़ा हुआ है। इस सत्र ने पर्यावरणीय स्थिरता पर प्रकाश डाला और बताया कि कैसे मनुष्यों, जानवरों और प्रकृति के बीच संतुलन हमारे भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है। कनाडा से आए हरफनमौला मिजाज़ के प्रोफ़ेसर एंड्रयू ओसबोर्न, जो वर्ल्ड काउंसिल ऑन इंटरकल्चरल एंड ग्लोबल कंपटेंस के सदस्य हैं। उन्होंने यूनेस्को स्टोरी सर्कल: मजबूत (एसडीजी) पर एक लेक्चर लिया। उनके बाद यूनिवर्सिटी ऑफ एयरलांग्गा के राजनीति विभाग के प्रोफ़ेसर इरफ़ाई अफ़हम ने चार हरित स्तंभ - पारिस्थितिक ज्ञान, सामाजिक न्याय, जमीनी स्तर का लोकतंत्र, अहिंसा पर व्याख्यान दिया। ये दोनों लेक्चर के बाद हम कैम्पस विजिट के लिए निकले। दुनियाभर के 12 देशों से आए 125 प्रतिभागियों से दोस्ती करने का पहला दिन था। दिन का अंत एक रोमांचक रात के साथ हुआ। रात में हमें लोकल सुराबाया का स्ट्रीट मार्केट और नाइटलाइफ़ दिखाने ले गए। खाने को लेकर हम शाकाहारी लोगों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। यूनिवर्सिटी ऑफ एयरलांग्गा की तरफ़ से मिलने वाला वेज लंच बॉक्स बड़ा खराब था। वह खराब इसलिए लग रहा था क्योंकि उसकी गंध बड़ी अजीब सी थी और अब तक हमने ऐसा खाना कभी खाया ही नहीं। इसलिए हमने एक इंडियन रेस्टोरेंट ढूंढा 'सितारा इंडियन क्यूज़ीन' रात का भोजन हमने यहां पेट भरके किया। देर रात वापस होटल पहुंचने के बाद हम काफी थक चुके थे। रूम जाते से ही सब सो गए।
तीसरा दिन: सुराबाया चिड़ियाघर और पिज़्ज़ा हट 27 अगस्त को सुबह हम होटल से यूनिवर्सिटी के लिए निकले। रास्ते में दिखने वाले इंडोनेशिया के लोगों के घर वास्तव में किसी बंगले से कम नहीं थे। आलीशान बड़े-बड़े बंगले हवेली जैसे खूबसूरत घर। यूनिवर्सिटी पहुंच कर सबसे पहले पशु चिकित्सा संकाय के व्याख्याता डियान आयु पर्मटासारि ने एनवायरनमेंटल हेल्थ पर लेक्चर दिया। उनके बाद डॉ. मुस्तोफा हेल्मी एफेंदी जो यूनिवर्सिटी ऑफ एयरलांग्गा के अनुसंधान और सहयोग मामलों के वाइस डीन है और साथ ही पशु चिकित्सा संकाय के फैकल्टी उन्होंने वन हेल्थ पर बहुत ही अच्छा लेक्चर दिया। इसके बाद हमारा अगला पड़ाव सुराबाया चिड़ियाघर था। सुराबाया चिड़ियाघर इंडोनेशिया के उन चिड़ियाघरों में से एक है जो वहां काफी लोकप्रिय है। इसे दक्षिण पूर्व एशिया का सबसे संपूर्ण चिड़ियाघर भी कहा जाता है जिसमें जानवरों की 351 से अधिक विभिन्न प्रजातियाँ हैं। कुल लगभग 2,806 से अधिक जानवर हैं। यहाँ मुझे इंडोनेशिया के विविध वन्यजीवों को करीब से देखने का अवसर मिला। चिड़ियाघर में घूमने से इंडोनेशिया के जीवों के बारे में गहरी समझ मिली कोमोडो ड्रैगन, जिराफ, कुआला, हिप्पो और भी बहुत सारे जानवरो को नज़दीक से देखा। चिड़ियाघर के बाद हम सभी होटल पहुंचे थोड़ी देर आराम करने के बाद पेट पूजा के लिए मैं और मेरे दोस्त पिज़्ज़ा हट गए। वहां भी वेज में सिर्फ़ दो ही ऑप्शन थे और वो भी चीज़ वाले। पिज़्ज़ा खाने के बाद मेरे दिल को जो तस्सली मिली सच में मज़ा आ गया था। वापस होटल आते वक्त हमें एक क्लब दिखा वहां पार्टी चल रही थी हम भी उसमें शामिल हो गए। खूब मज़े करते हुए हम सब इंडोनेशिया की सड़क पर नाचते हुए गाते हुए देर रात तक होटल पहुंचे।
चौथा दिन: मैंग्रोव संरक्षण क्षेत्र 28 अगस्त का दिन प्रकृति को कुछ लौटने के लिए समर्पित था। सुबह-सुबह हम मैंग्रोव संरक्षण क्षेत्र की ओर निकल लिए। मैंग्रोव फॉरेस्ट एरिया पहुंच कर सर्वप्रथम वहां एक कार्यशाला हुई कि कैसे हम मैंग्रोव फॉरेस्ट एरिया को संरक्षित कर सकते हैं। कार्यशाला में यह समझाया गया कि जैव विविधता का समर्थन करने में मैंग्रोव फॉरेस्ट की कितनी महत्वपूर्ण भूमिका है। बहुत खूबसूरत नज़ारा था पूरे वन क्षेत्र का सबसे रोमांचक हिस्सा तब आया जब हम सभी 125 लोगों ने मैंग्रोव के पेड़ लगाकर पर्यावरण में योगदान दिया। पौधारोपण करने के बाद पर्यावरणीय स्थिरता के प्रति जिम्मेदारी की एक मजबूत भावना मेरे दिल में बढ़ी। वहां मैंने कुछ नए चाइनीज दोस्त भी बनाएं। दिनभर मैंग्रोव फॉरेस्ट एरिया में रहने के बाद हम सभी शाम को होटल पहुंचे। रात के खाने के लिए वहीं हम सबकी पसंदीदा जगह सितारा इंडियन रेस्टोरेंट गए। खाने के बाद होटल पहुंचे और आराम किया।
पांचवा दिन: सस्टेनेबल ब्लू इकोनॉमी और बान्युवांगी की ओर 29 अगस्त को वहीं रोज़ ब्रेकफास्ट करने के बाद यूनिवर्सिटी पहुंचे। दिन की शुरुआत दो ज्ञानवर्धक सत्रों से हुई पहला पशु चिकित्सा संकाय के व्याख्याता लीना सुसांती ने समुद्री वन्य जीवन पर लिया। दूसरा व्याख्यान दिता विसुद्यावती ने सस्टेनेबल ब्लू इकोनॉमी पर लिया। प्रोफेसर दिता मत्स्य पालन और समुद्री संकाय विभाग के प्रोफेसर थे। इन सत्रों ने समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए आवश्यक समुद्री संरक्षण और पर्यावरण के अनुकूल प्रथाओं के बारे में मेरी समझ को बढ़ाया। शैक्षणिक सत्रों के बाद ग्रुप के कुछ लोगों ने संगगर अगुंग मंदिर का दौरा किया जो एक प्राचीन सांस्कृतिक स्थल है। इंडोनेशिया की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को आत्मसात करने का अवसर मिला। शाम को होटल पहुंच कर सभी लोगों ने पैकिंग करना शुरू की क्योंकि रात 9 बजे हमें सुराबाया से चेक आउट करना था और बान्युवांगी के लिए निकलना था। सुराबाया और बान्युवांगी के बीच करीब 8 घंटे का सफ़र रहा रात में बस में ही सब सो गए।
छठा दिन: एक लुभावना सूर्योदय और स्नोर्कलिंग 30 अगस्त की सुबह करीब 5 बजे हम एक दर्शनीय स्थल पर रुके। क्षितिज पर राजसी बाली द्वीप दिखाई दे रहा था विश्व प्रसिद्ध बाली द्वीप हमें काफी पास से दिख रहा था। हम सभी लोग सूर्योदय के लिए रुके थे जिस समुद्र किनारे हम सूर्योदय देख रहे थे वह समुद्र पूरा साफ दिख रहा था कही कोई गंदगी नहीं ऐसा लग रहा था अपनी खुद की शक्ल दिख रही है एकदम क्रिस्टल क्लियर पानी। जैसी ही सूर्योदय हुआ वह अद्भुत नज़ारा मुझे आज भी याद है। इस शांत पल ने मेरे अविस्मरणीय दिन की शुरुआत की। बाली के सूर्योदय और कन्याकुमारी के सूर्योदय की अगर तुलना की जाएं तो मुझे कन्याकुमारी का सूर्योदय ज्यादा सुंदर लगा। खैर, सूर्योदय देखने के बाद हम बैंग्सरिंग अंडरवाटर में स्नॉर्कलिंग और कोरल संरक्षण के लिए निकले। यह 30 अगस्त का दिन मेरी ज़िंदगी में किसी जादू से कम नहीं था। जैसे ही हम बैंग्सरिंग अंडरवाटर पहुंचे वहाँ सभी ने स्नॉर्कलिंग एडवेंचर में भाग लिया। यह केवल मौज-मस्ती के बारे में नहीं था बल्कि कोरल संरक्षण प्रयासों में योगदान देने के बारे में भी था। पूरे ग्रुप ने समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को बहाल करने के प्रयासों में संलग्न होकर कोरल प्लांटेशन लगाए। कोरल प्लांटेशन करने के बाद हमने करीब 4 से 5 घंटे तक स्नॉर्कलिंग की जीवंत समुद्री जीवन और कोरल रीफ से भरी पानी के नीचे की दुनिया वाकई सबसे खूबसूरत है। अभी तक पानी के नीचे की दुनिया मैंने टीवी पर डिस्कवरी चैनल या फिल्मों में ही देखी थी। यह मुझे विस्मय कर देने वाला बेहद सुंदर और प्रकृति से इस तरह के अनूठे तरीके से जुड़ने की खुशी से भरा हुआ खूबसूरत दिन था। इस रोमांचकारी साहसिक कार्य के बाद दोपहर में हमने हमारे होटल मिराह रिसॉर्ट में चेक इन किया। यह स्थान एक एक्शन से भरपूर दिन के बाद शानदार विश्राम स्थल था। इतनी देर तक स्कूबा डाइविंग और स्नोर्कलिंग करने के बाद हम सब थक चुके थे वहां पहुंचते ही सब सो गए। रात में उठे और दोस्तों संग पिज़्ज़ा हट खाने पहुंच चुके थे क्योंकि बान्युवांगी में भी खाने के लिए वेज में ज्यादा कुछ ऑप्शन नहीं थे। पिज़्ज़ा हट में हमने इतना ज्यादा खा लिया था कि आधा रास्ता पैदल ही तय कर लिया। कुछ दूरी तय करने के बाद हमने कैब करने का इरादा किया। कैब से फिर होटल पहुंचे और आराम किया।
सातवा दिन: बूम बीच और समुद्री कछुओं को छोड़ना सातवें दिन 31 अगस्त को भी हमारी सीखने की यात्रा जारी रही। दिन की शुरुआत यूनिवर्सिटी ऑफ एयरलांग्गा के बान्युवांगी कैंपस में विजिट से हुई। जहाँ सभी को स्थानीय संस्कृति का एक सुंदर प्रतिनिधित्व करने वाले पारंपरिक गंड्रुंग नृत्य देखने को मिला। यह गंड्रुंग नृत्य कला इंडोनेशिया का एक पारंपरिक नृत्य है जिसके कई रूप हैं। जब गैंड्रंग नृतक को कोई दर्शक सदस्य दिखाई देता है जिसके साथ वह नृत्य करना चाहती है, तो वह उसे मंच पर लाने के लिए इशारा करती है। लिहाज़ा वहां वो नृतक नाचते हुए मेरे दोस्त के पास आ गई और उसे अपने साथ ले गई। दोनों ने एकसाथ नृत्य किया। यहां नृत्य का एक अलग ही मंत्रमुग्ध कर देने वाला प्रदर्शन देखने को मिला। इसके बाद हम असाधारण वन्यजीव संरक्षण अनुभव के लिए बूम बीच की ओर बढ़े। यहां मुख्य आकर्षण शिशु समुद्री कछुओं को देखना और उन्हें समुद्र में छोड़ने के लिए भाग लेना था। हम सभी ने एक मानव श्रृंखला बनाते हुए धीरे से उन बेबी सी टर्टल्स को उनके प्राकृतिक आवास में पहुँचाया। जब मैं उन छोटे-छोटे समुद्री कछुओं को तैरते हुए अपने घर जाते हुए देख रहा था तो बहुत खुशी और संतुष्टि का अनुभव महसूस कर रहा था। यह दिन केवल बेबी सी टर्टल्स को छोड़ने के बारे में नहीं था बल्कि वन्यजीव संरक्षण में सक्रिय रूप से भाग लेने के बारे में था। यह पल भी पूरी यात्रा के सबसे यादगार अनुभवों में से एक था। बूम बीच के बाद हम समुद्र किनारे एक रेस्टोरेंट पहुंचे। वहां हमें वेज ऑप्शन में सिर्फ़ फ्रूट बॉक्स मिले। उसके बाद हम वापस होटल पहुंचे रास्ते भर बस में नाचते हुए आए, यहां तक की चाइनीज लोगों को बॉलीवुड के गानों पर नचवा रहें थे। खाने के लिए मैं फिर कुछ दोस्तों के साथ मैकडोनाल्ड्स गया वहां भी वेज में सिर्फ़ फ्रेंच फ्राइज़ मिले। जो भी खाने के लिए वेज में मिला वह सब खाया और रात में होटल पहुंच कर आराम किया फिर सो गए।
आठवां दिन: पुलाऊ मेराह बीच पर मौज-मस्ती आठवें दिन 1 सितंबर को सुबह हमारा ग्रुप पुलाऊ मेराह बीच के लिए निकला। इस बीच को इंडोनेशिया का लाल द्वीप बीच भी कहा जाता है। क्रिस्टल-क्लियर पानी और गर्म रेतीले समुद्र तटों के साथ यह सुरम्य स्थान हमारे विश्राम और मौज-मस्ती के दिन के लिए एकदम सही जगह थी। धूप सेंकते हुए और स्थायी यादें बनाते हुए रोमांचकारी समुद्र तट की गतिविधियों का मैंने आनंद लिया। बीच पर रेत के पहाड़ बनाएं, पतंग उड़ाई और भी खूब मस्ती की। जैसे-जैसे दिन शाम में बदला बीच पर सूर्यास्त का नज़ारा देखने के बाद हम ओसिंगडेल्स नाम के एक रेस्टोरेंट गए। वहां हमें खाना अच्छा मिला वेज में पोटेटो वेजीज़ और जूस था उसी से पेट भर लिया। डिनर के बाद उसी रेस्टोरेंट में नीचे एक दुकान पर सब खरीददारी करने गए। यह रात हमारी बान्युवांगी में आख़िरी रात थी। एक स्वादिष्ट विदाई रात्रिभोज के लिए हम सभी एकत्रित हुए थे। यह रात्रिभोज हमारा पूरी यात्रा के दौरान बने अनुभवों, दोस्ती और बंधनों का एक उत्सव जैसा लग रहा था। रेस्टोरेंट में हमने बॉलीवुड गाने भी गाए। वापस रात में होटल आते वक्त बस में सभी ने खूब डांस किया। होटल पहुंच कर आराम किया और सो गए।
नौवां दिन: सुरबाया लौटना और प्रेजेंटेशन की तैयारी करना बान्युवांगी को अलविदा कहने के बाद 2 सितंबर को सुबह हमने मिराह रिज़ॉर्ट से चेक आउट किया और वापस सुराबाया की यात्रा पर निकल पड़े। पूरा दिन सुराबाया पहुंचने बान्युवांगी में रोमांच को याद करने में ही निकल गया। सुराबाया पहुंचने पर मैं अपने दोस्तों के साथ खाने के लिए डोमिनोज़ गया क्योंकि पता था वेज वालो के लिए खाने में वही फ्रूट बॉक्स होगा। डोमिनोज़ के पिज़्ज़ा और पिज़्ज़ा हट के पिज़्ज़ा में तुलना की तो डोमिनोज़ का पिज़्ज़ा कुछ हद तक इंडियन टेस्ट दे रहा था। डोमिनोज़ से होटल हम कैब से गए, कैब ड्राइवर भारतीय संस्कृति को जानने के लिए काफी उत्सुक था। उसे बॉलीवुड के मिथुन चक्रवर्ती और शाहरुख खान भी पता थे। ड्राइवर से बतियाते हुए हम कब होटल पहुंच गए पता ही नहीं चला। होटल लौटने पर सब लोगों का ध्यान प्रेजेंटेशन की तैयारी पर चला गया। हमारी यात्रा के दौरान यूनिवर्सिटी ऑफ एयरलांग्गा वालो ने हम सभी 125 लोगों के 11 ग्रुप बनाएं थे। यह ग्रुप रैंडम ऐलोकेशन के आधार पर थे अर्थात मैं जिस ग्रुप में था उसमें 3 लोग चाइना, 1 थाईलैंड, 1 मलेशिया और हम 5 लोग इंडिया से थे। प्रेजेंटेशन के लिए हमें रोज़ एक वीडियो इंस्टाग्राम पर अपलोड करना था। यह वीडियो हर दिन जहां वे लेकर जा रहे थे उसका रीकैप होना चाहिए था। रोज़ाना वीडियो डालने के अलावा उनके द्वारा दिए गए पांच विषयों में से एक पर लेख लिखना था। अंतिम दिन सभी ग्रुपों ने कड़ी मेहनत की यह सुनिश्चित करते हुए कि उनकी प्रस्तुति सर्वश्रेष्ठ होगी। रात में यह सारा काम निपटा कर हम सो गए।
दसवां दिन: विजय और उत्सव 3 सितंबर का दिन मेरे लिए विजयदशमी से कम नहीं था क्योंकि वहां 12 देशों से आए 125 लोगों के 11 ग्रुपों में से मेरे ग्रुप ने बेस्ट ग्रुप अवार्ड जीता। यूनिवर्सिटी ऑफ एयरलांग्गा में सर्वश्रेष्ठ समूह पुरस्कार जीतना मेरे लिए किसी सपने से कम नहीं था। कड़ी मेहनत, समर्पण और हमारे टीमवर्क ने रंग दिखाया पूरे ग्रुप के सामूहिक प्रयासों को इस प्रतिष्ठित पुरस्कार से सम्मानित किया गया। हम सर्वश्रेष्ठ इसलिए आए क्योंकि हमारा स्कोर 329 था हमसे नीचे जो ग्रुप था उनका स्कोर 311 था।
पुरस्कार समारोह के बाद हम सभी समापन समारोह के लिए उनके ऑडिटोरियम गए। हॉल का नाम गरुड़ मुक्ति हॉल था। इससे साफ पता चलता है कि इंडोनेशिया में भारतीय संस्कृति का बहुत ज्यादा प्रभाव है। वहां की दुकानों के नाम भी रामायण, महाभारत और इनसे जुड़े पात्रों पर थे। समापन समारोह में हमने तपक सुसी और तारी समन की सांस्कृतिक प्रस्तुति का आनंद लिया जिसने हमारे अनुभव में इंडोनेशिया की सांस्कृतिक समृद्धि की एक और परत जोड़ दी। तपक सुसी इंडोनेशिया का एक मार्शल आर्ट संगठन है।
इस प्रस्तुति में लड़कियों ने अपनी अलग ही छाप छोड़ी। तारी समन जिसे हज़ार हाथों का नृत्य भी कहा जाता है इंडोनेशिया में सबसे लोकप्रिय नृत्यों में से एक है। इसकी उत्पत्ति इंडोनेशिया के आचे प्रांत के गयो लुएस के गयो जातीय समूह से हुई थी। इस नृत्य को देखने के बाद इसकी विशेषता यह पता चली कि तेज़ गति वाली लय और नर्तकियों के बीच सामंजस्य जो है वह देखने लायक हैं। मेरी जीत का जश्न मनाने, मस्ती और इस हसीन यात्रा की आखिरी रात के लिए हम 12 दोस्त एकसाथ सितारा इंडियन रेस्टोरेंट में गए।
हर तरफ खुशी से भरा माहौल था क्योंकि सभी ने पहले गोल्फ खेला, खूब सारी बातें की और स्वादिष्ट भोजन का लुत्फ उठाया। जाते वक्त मैंने सितारा इंडियन रेस्टोरेंट के वेटर के साथ फोटो खिंचवाया रोज़ाना वो हमारे लिए थाली, खाना और सब लेकर आता था। खाने के बाद हम 12 दोस्तों ने एक यादगार सेल्फी ली और कैब से होटल पहुंच गए। होटल पहुंचने के बाद थोड़ी देर आराम किया और फिर मैं 6 दोस्तों के साथ रात में इंडोनेशिया की सड़को पर घूमने निकल पड़ा। नाचते हुए गाते हुए मस्ती करते हुए सड़क पर हमने खूब धमाल चौकड़ी मचाई। देर रात करीब 3 बजे हम होटल पहुंचे। जाते से ही सो गए क्योंकि सुबह जल्दी एयरपोर्ट के लिए निकलना था।
ग्यारहवां दिन: इंडोनेशिया से विदाई और दिल्ली वापसी अंतिम दिन 4 सितंबर को सुबह हमने सुराबाया सुइट्स से जल्दी चेक आउट किया और बस से एयरपोर्ट के लिए निकल गए। होटल के बाहर कई स्टूडेंट्स रो रहे थे। सभी भावनात्मक रूप से एक दूसरे से जुड़ चुके थे। एक पल के लिए मैं भी सोच रहा था बस कुछ देर और फिर ये चेहरे दोबारा देखने को नहीं मिलेंगे। नम आंखों से सभी को विदाई देकर हम एयरपोर्ट के लिए निकल पड़े और कुआला लम्पुर के लिए अपनी उड़ान पकड़ी। 10 बजे इंडोनेशिया से हमारी कुआला लम्पुर के लिए मलेशिया एयरलाइन्स की फ्लाइट थी। दोपहर करीब 2 बजे हम कुआला लम्पुर हवाई अड्डे पर पहुंच चुके थे। सभी लोग अपने स्नेहीजनो के लिए कुछ खरीद रहें थे। मैंने भी मलेशिया एयरपोर्ट से चॉकलेट्स खरीदी। जो मेरी यादगार यात्रा का अब प्रतीक बन चुकी है। 5-6 घंटे मस्त मलेशिया एयरपोर्ट पर घूमे, एयरपोर्ट के अंदर बने वाटरफॉल को देखा।
शाम को 7 बजे हमारी फ्लाइट थी एक बार फिर मलेशिया एयरलाइन्स की शानदार मेहमाननवाजी का सुख प्राप्त किया। दिल्ली से जाते वक्त पूरे समय लाल सिंह चड्ढा मूवी देखी थी और अब वापसी में कुआला लम्पुर से दिल्ली के लिए यामी गौतम, पंकज कपूर की 'लोस्ट' देखी। दिल्ली के लिए हमने अपनी उड़ान भरी और रात करीब 10 बजे हम पहुँच गए। उत्साह और जिज्ञासा के साथ शुरू हुई यात्रा अब पूर्ण हो चुकी थी, सभी को जीवन भर अपने साथ याद रखने के लिए अनगिनत यादें छोड़ गई।
यह इंडोनेशिया इमर्शन प्रोग्राम मेरे लिए सिर्फ़ एक यात्रा नहीं था उससे कहीं ज़्यादा था। यह सीखने, बढ़ने, प्रकृति, संस्कृति और दुनिया भर के लोगों से जुड़ने का एक सुअवसर था। पर्यावरण स्वास्थ्य व्याख्यानों से लेकर स्नॉर्कलिंग स्कूबा डाइविंग के एडवेंचर्स, समुद्री कछुओं को छोड़ने से लेकर सांस्कृतिक प्रदर्शनों तक, हर पल ने मुझे एक अविस्मरणीय अनुभव प्रदान किया। मेरे द्वारा दुनियाभर के लोगों से बनाई गई दोस्ती उनसे प्राप्त ज्ञान और उनसे जुड़ी यादें हमेशा मेरे साथ रहेंगी। यह यात्रा मुझे सीखने और खोज की अपनी यात्रा को जारी रखने के लिए प्रेरित करती रहेगी। मेरी इंडोनेशिया यात्रा सीखने और बढ़ने का एक ऐसा मौका था जिसकी मैंने अभी तक कल्पना भी नहीं की थी। मेरे लिए यह हमेशा सीमाओं से परे एक रोमांच, खोज, विकास और अंतहीन उत्साह से भरी यात्रा रहेगी। ~ नैवेद्य पुरोहित #भारत #इंडोनेशिया #मलेशिया #यूनिवर्सिटी_ऑफ_एयरलांग्गा #बेनेट_यूनिवर्सिटी #बाली #सुराबाया #बान्युवांगी #कुआला_लम्पुर #समुद्री_जैव_विविधता

Comments

  1. बहुत अच्छा, साफ, सुन्दर और व्यवस्थित ब्लॉग लिखा है, जिसमे एक युवा लेखक,पत्रकार की लेखनी में ताजगी का अहसास और सच्चाई है।
    अपने जीवन में सीखना कभी बंद मत करना, क्योंकि सीखना बंद तो जितना बंद।
    ब्लॉग पड़ कर ऐसा लग रहा है जैसे मैं इंडोनेशिया घूम रहा हूं, ऐसी फिलिंग आ रही है, तुम्हारे ब्लॉग में रोचकता भी है और ताजगी भी है, ऐसे ही अच्छे कंटेंट के साथ आगे बढ़ो

    ReplyDelete
    Replies
    1. बहुत बहुत धन्यवाद आपका, आपके शब्द मुझे हमेशा ही प्रेरणा देते है।

      Delete
  2. 12 देशों के 125 स्टूडेंट्स के 11 ग्रुप में से सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन का अवार्ड लाने पर आपके ग्रुप को बहुत बधाई।
    ऐसे ही नाम रौशन करते रहो

    ReplyDelete
  3. भाषा और शब्दों का बेहतरीन समायोजन ,जो हमारे लिए काल्पनिक होते हुए भी वास्तविकता का अनुभव करा रहा है|||
    शानदार नैवेद्य जी...

    ReplyDelete
    Replies
    1. बहुत बहुत धन्यवाद आपका, आपने अपना कीमती समय निकाल कर मेरा ब्लॉग पढ़ा इसे मैं कभी नहीं भूलूंगा। आपका आशीर्वाद और स्नेह सदा बना रहें।

      Delete

Post a Comment

Popular posts from this blog

20 की उम्र में चारधाम पूरे, रिश्तों का पंचधाम भी जी लिया!

जड़ों से जुड़ाव की पुकार: एक बार फिर कुलदेवता के दरबार में!

मन की शांति का रहस्य: स्वीकार्यता है!