अभिषेक ब्रिक्स: 1982 से दीपावली पर प्रेम और सेवा की लौ जलाते हुए
प्रेम और प्रकाश की परंपरा इस साल भी कायम
(नैवेद्य पुरोहित) हर साल दीपावली का पर्व मनाते हुए मुझे एक नई प्रेरणा मिलती है। दीपावली आमतौर पर मिठाइयों, नए कपड़ों, फटाखों और खुशियां बांटने का त्योहार होता है। लेकिन इस दुनियां में ऐसे बहुत सारे लाखों करोड़ों लोग है जो यह पर्व नहीं मना पाते कुछ आर्थिक स्थिति की वजह से तो कुछ सामाजिक स्थिति के कारण पिछड़ जाते है। आखिर वे गरीब लोग भी इंसान है उन्हें भी त्योहार उतना ही धूमधाम से मनाने का हक है जितना हम मनाते है। इसी को ध्यान में रखते हुए मेरे दादाजी राजेन्द्र पुरोहित ने 1982 में एक परंपरा की शुरुआत की - प्रेम और प्रकाश फैलाने की परंपरा।
प्रारंभ में जब तुलसी ब्रिक्स नाम से दादाजी द्वारा ईट का भट्टा लगाया गया था तब भी उस समय जितनी हैसियत अनुसार मिठाइयां कपड़े बांट सकते थे उतना करते थे। उसके बाद सन 2004 में मेरे जन्म के बाद अभिषेक ब्रिक्स की शुरुआत हुई। शुरू से ही ऐसे संस्कार दिए है सिखाया है कि बेटा दिवाली को केवल अपने लिए नहीं बल्कि उन लोगों के साथ मनाना चाहिए जिनके पास इस त्योहार की चमक तक नहीं पहुँच पाती। हर साल दिवाली पर हम मिठाइयाँ, कपड़े और छोटी-छोटी खुशियाँ उन लोगों में बाँटते हैं जो समाज की अंधेरी गलियों में अपने हिस्से की रोशनी की राह देखते हैं। ये वे लोग है जो मेहनत मजदूरी तो रोज़ करते है पर उनके पास त्योहारों में पहनने तक के लिए नए कपड़े नहीं होते। ये बच्चे दिवाली की मिठाई तक से वंचित रह जाते है। इन बच्चों के माता-पिता शराब में डूबे रहते है, उन बच्चों की तरफ ध्यान देने वाला कोई नहीं है। उन लोगों की ज़िंदगी में त्योहारों का मायना बस एक और साधारण सा दिन है। मैं हर साल देखता हूं कि कैसे बच्चे अपने माता-पिता की शराब की लत और लड़ाई-झगड़े के बावजूद अपनी मासूम मुस्कान से अपने जीवन में खुशियाँ ढूंढते हैं। हमारे समाज में लाखों ऐसे लोग हैं, जिनके पास साफ कपड़े नहीं, मिठाई का एक निवाला नहीं, पर उनकी आँखों में दिवाली की रोशनी की चमक दिखती है जो किसी अमीर घर के बच्चों में नहीं दिखेगी।
इस दिवाली भी हमने अभिषेक ब्रिक्स के मेहनती कर्मचारियों के साथ मिठाई और कपड़े बाँटकर इस परंपरा को आगे बढ़ाया। हमारे लिए यह केवल कपड़े या मिठाइयाँ बाँटने की रस्म नहीं है बल्कि यह उन सभी लोगों की खुशियों में अपना हिस्सा जोड़ने की एक कोशिश है।
दीपावली का वास्तविक संदेश
इस त्योहार का वास्तविक अर्थ तभी समझ में आता है, जब हम दूसरों की जिंदगी में प्रेम और सुख का दीपक जलाते हैं। केवल अपने घरों को सजाने से दिवाली नहीं होती असली दिवाली तब है जब हम किसी और की जिंदगी में खुशी की रोशनी का दीपक जलाए। हम अपने हिस्से की रोशनी और मिठास को दूसरों के साथ बाँटेंगे तब यह दुनिया सच में हर जगह प्रेम और सेवा की भावना के साथ चमकेगी।
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किसी ने कहा है,अपने लिए जिए तो क्या जिए........ जितना हो सके, अपने फैमिली और फ्रैंड्स के अलावा नि स्वार्थ मदद करना चाहिए.... इससे हमें जो ख़ुशी मिलती हैं वो किसी भी तरह के मॉल में जाने या नए कपड़े पहनने या मिठाई खाने, नई गाड़ी खरीदने आदि चीजों से ज्यादा मिलती हैं....100% सही हैं यह बात, सुकून मिलता है कि ज़िंदगी में कुछ अच्छा किया है
ReplyDeleteबिल्कुल सही बात है आप से ही हमें प्रेरणा मिलती हैं।
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