देश के मूर्धन्य पत्रकार स्वर्गीय माणिकचन्द्र वाजपेयी 'मामाजी' की 105वीं जन्मजयंती पर कोटि कोटि नमन

देश के मूर्धन्य पत्रकार, इन्दौर प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष, संघ के पूर्व प्रचारक, दैनिक स्वदेश के प्रधान संपादक रहें मेरे परदादाजी स्वर्गीय गणेशचन्द्र जी पुरोहित के मित्र स्व.माणिकचन्द्र वाजपेयी 'मामाजी' की 105 वीं जन्मजयंती पर उन्हें कोटि कोटि नमन।
मेरे दादाजी राजेन्द्र पुरोहित अक्सर मुझे बताते हैं कि परदादाजी उन्हें हर जगह अपने साथ रखते थे। लिहाज़ा शहर के कई कार्यक्रमों में वे दादाजी को साथ लेकर जाया करते थे। दादाजी कहते है कि मामाजी माणिकचन्द्र वाजपेयी की तो गोद में वे खेले हैं। जीवनभर उन्होंने राष्ट्रवादी विचारधारा के साथ ध्येयनिष्ठ और मूल्यवान पत्रकारिता की। आपातकाल के दौरान मामाजी 21 महीने तक जेल में बंद रहें और कई यातनाएं उन्हें सहन करना पड़ी। इसी अवधि में उनकी धर्मपत्नी का स्वर्गवास हो गया, इसके बावजूद वे विचलित नहीं हुए। काशी में जब वे शिक्षावर्ग में प्रबोधन दे रहे थे, तभी उनके एकमात्र पुत्र के निधन की खबर पहुँची। पीड़ा की पराकाष्ठा को सहते हुए उन्होंने खुद को संभाले रखा। वरिष्ठ पत्रकार विजय मनोहर तिवारी उनके संदर्भ में लिखते है, "उनके जन्म के सौ साल बाद कोई ऐरा गैरा उनका नाम लेते हुए भी यह जानता है कि उसकी औकात नहीं है कि वह माणिकचंद्र वाजपेयी का नाम अपनी जुबान पर लाए! मैं अक्सर सोचता हूं कि माणिकचंद्र वाजपेयी ने आजादी के पहले क्या सोचकर कांग्रेस में जाने की बजाय कांटों से भरा एक गुमनाम सा रास्ता चुना होगा? आखिर वे अपने आसपास क्या घटता हुआ देख रहे थे, जिसने उन्हें हिंदुत्व के विचार की तरफ आकर्षित किया? जहां रास्ता ही रास्ता था, मंजिल सिर्फ विचार में थी और रास्ते में कदम-कदम पर ठोकरें थीं, उलाहने थे, पाबंदियां थीं, तोहमतें थीं, जो उन्हें उम्र भर भोगनी थीं। वो कौन सा सपना था, जो उन्हें ऐसे जीवन की तरफ लेकर आया था? राष्ट्र की सेवा ही अगर उनका लक्ष्य थी तो वे कांग्रेस में क्यों नहीं गए?" आज भारतीय जनता पार्टी अगर विश्व में सबसे बड़े राजनीतिक दल के रुप में उभर पाई है तो उसके पीछे असंख्य 'माणिकों' जैसे देवतुल्य कार्यकर्ताओं का ख़ून पसीना शामिल हैं। एक खांटी पत्रकार के रूप में अपनी पहचान स्थापित कर गए स्वर्गीय माणिकचन्द्र वाजपेयी जब आज स्वर्ग में अपनी निश्छल आंखों से देख रहें होंगे कि अपने जन्म के 105 साल बाद भी युवा पीढ़ी उन्हें याद कर रही है। तब निश्चित रूप से उनकी आंखों में पानी आ जाएंगे और अपने झुर्रियों भरे चेहरे पर झब्बेदार मूंछों से उनकी सरल मुस्कान ढक चुकी होगी। ~ नैवेद्य पुरोहित #माणिकचन्द्र_वाजपेयी_'मामाजी' #स्वर्गीय_गणेशचन्द्र_पुरोहित #दैनिक_स्वदेश #राष्ट्रवादी_विचारधारा #ध्येयनिष्ठ_और_मूल्यवान_पत्रकारिता

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