मणिपुर जल रहा है, मीडिया अब भी मौन है!
18 महीने की चुप्पी, हाशिए पर पड़ी आवाज़ों को कौन सुन रहा है ? - सप्तर्षि बसाक
रोमन सम्राट नीरो के बारे में एक कहावत हमारे देश में बड़ी मशहूर है। 'जब रोम जल रहा था, नीरो बांसुरी बजा रहा था!' आज के संदर्भ में देखा जाए तो इसे बदलकर 'जब मणिपुर सुलग रहा था, तब मुख्यधारा मीडिया सो रहा था' यह ज्यादा प्रासंगिक लगता है।
कल शुक्रवार, 20 सितंबर 2024 को बेनेट यूनिवर्सिटी के टाइम्स स्कूल ऑफ मीडिया में द क्विंट के ओपिनियन एडिटर सप्तर्षि बसाक ने 'फेक न्यूज और सोशल मीडिया के युग में कॉन्फ्लिक्ट रिपोर्टिंग में नैतिक चिंताएं' विषय पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण गेस्ट लेक्चर दिया। लगभग दो घंटे तक चले इस विशेष सत्र में, सप्तर्षि बसाक ने हमें संघर्ष रिपोर्टिंग (Conflict Reporting) के जटिल मुद्दों से रूबरू कराया और इस बात पर प्रकाश डाला कि कैसे पत्रकारिता में नैतिकता और सत्यनिष्ठा का महत्व बढ़ जाता है जब संघर्ष और हिंसा से जुड़ी खबरों की रिपोर्टिंग की बात आती है। पिछले 17 महीने में वह 3 बार मणिपुर जैसे हिंसाग्रस्त इलाके में अपनी जान जोखिम में डालकर ग्राउंड रिपोर्टिंग कर चुके हैं। अपनी बात शुरू करते हुए उन्होंने सबसे पहले हमें करीब 10 दिन पहले की एक घटना बताई जिसमें असम रेजिमेंट के एक पूर्व हवलदार लिमखोलाल माटे जिसने 24 साल भारत देश के लिए एक समर्पित सैनिक के रुप में जीवन बिताया। वो व्यक्ति अपनी बीमार पत्नी के लिए दवाई लेने गया था गलती से बफर ज़ोन में घुस गया और बड़ी बेरहमी से मारा गया वीडियो भी वायरल हो चुका है। उस वीडियो में कुचले गए शरीर को दिखाया गया, जिसके चारों ओर महिलाओं सहित लोगों का समूह खड़ा था। कांगपोकपी जिले के मोटबुंग सरोन वेंग गांव के लिमखोलाल को मणिपुर के इंफाल पश्चिम जिले के कांगलाटोंगबी के शांतिपुर गांव में जाने के जोखिमों के बारे में पता था। लेकिन उनकी पत्नी को दवाओं की सख्त ज़रूरत थी और उनके निर्माणाधीन घर को हार्डवेयर की इसलिए वह रविवार 8 सितंबर को शाम करीब 5 बजे अपनी स्कॉर्पियो से नेपालियों की आबादी वाले इलाके शांतिपुर के लिए निकले थे। उनकी पत्नी और बच्चे पूरी शाम उनके वापस आने का इंतज़ार करते रहे लेकिन वह नहीं आए। अगली सुबह ही घरवालों को व्हाट्सएप पर वायरल एक वीडियो मिला, जिसमें उन्होंने लिमखोलाल का शरीर उनके चेहरे सिर को बेरहमी से पीटा और कुचला हुआ देखा। शव मैतेई-प्रभुत्व वाले सेकमाई के पास फुमलौ क्षेत्र में पाया गया था। मणिपुर में 18 महीने बाद भी जब सेना के पूर्व जवान के साथ ऐसा हो रहा है तो सोचिए आम नागरिक की क्या हालत हो रही होगी!
सप्तर्षि ने बताया कि एक पत्रकार के रूप में, दोनों समुदायों पर संघर्ष के विनाशकारी प्रभाव को प्रत्यक्ष रूप से देखा है। लेकिन जो बात अखरने वाली है वह है इन मुद्दों पर मीडिया की चुप्पी। जिस तरह मेरे कॉलेज के प्रोफेसर पढ़ाते है सिलसिलेवार उन्होंने मणिपुर का पूरा घटनाक्रम हमें बोर्ड पर लिखकर समझाया कि कैसे 3 मई 2023 को इंफाल की मणिपुर यूनिवर्सिटी में हिंसा की चिंगारी भड़की। इस घटना का उन्हें स्थानीय संपर्क के ज़रिए फोन कॉल पर पता चला। उस समय देशभर का मीडिया 3 प्रमुख कहानियां दिखा रहा था नया संसद भवन सेंट्रल विस्टा, कर्नाटक चुनाव सिद्धारमैया की आश्चर्यजनक जीत और पहलवानों का विरोध। मई के पहले पखवाड़े तक यह सब चलता रहा और इस सबके बीच मणिपुर की दुर्दशा काफी हद तक अनदेखी की गई। उस एक फोन के बाद एक एक करके सप्तर्षि के पास कई फोन आने लगे किसी का घर जल गया, किसी का बेटा मर गया, कोई महिला ज़िंदा जला दी गई, ऐसी तमाम खबरें आने लगी। अपने सूत्रों पर भरोसा करते हुए मणिपुर की कहानी को लेने का उन्होंने फैसला किया।
कई जीवंत उदाहरण आसानी से पूरे खेल को समझाने के लिए उन्होंने बताए जैसे कि 9 अगस्त को हुआ कोलकाता रेप मर्डर केस। हिंदुस्तान में हुए उस दिन रेप या मर्डर की वह कोई अकेली घटना नहीं थी। उसी समय बिहार के मुजफ्फरपुर में 14 वर्षीय दलित लड़की के साथ जाति विवाद के चलते सामूहिक बलात्कार किया गया और उसकी हत्या कर दी गई। कोलकाता बलात्कार का मामला सुर्खियों में रहा लेकिन मुज्जफरपुर के इस केस ने किसी का ध्यान नहीं खींचा। दैनिक भास्कर और जागरण जैसे ग्रुप जिनके पास लगभग हर जिले में रिर्पोटर है उन्हें और कुछ स्थानीय हिंदी अखबारों को छोड़कर किसी ने इस जघन्य अपराध को कहीं नहीं बताया! अंग्रेज़ी मीडिया की हालत और भी खराब द क्विंट और स्क्रॉल.इन को छोड़कर किसी ने भी उस समय यह ख़बर नहीं प्रकाशित की।
दूसरा उदाहरण उन्होंने लोकसभा चुनाव के समय तीसरे चरण में उत्तरप्रदेश के संभल लोकसभा क्षेत्र में मतदान का दिया। जहां मुसलमानों को मतदान करने से पुलिस ने रोक दिया। वीडियो वायरल हुए, मीडिया में आए। वहीं दूसरी ओर 19 अप्रैल को जब लोकसभा चुनाव में मतदान का पहला दिन था मणिपुर इंफाल में वोटिंग थी उस दिन दिल्ली मीडिया से वहां सिर्फ सप्तर्षि थे। उन्हें फोन आया कि मुख्यधारा के मीडिया ने पोलिंग बूथ मशीन गन के साथ कैप्चर कर लिया गया है लोगों को वोट नहीं डालने दिया जा रहा है। अपनी जान दांव पर लगा कर पोलिंग बूथ पर पहुंचने के बाद उन्होंने आंखों देखा हाल बयां किया कि 3- 4 जीप में कमांडो आउटफिट में मशीन गन के साथ मिलिटेंट्स ने बूथ कैप्चर कर रखा था। इस घटना को मीडिया ने नजरअंदाज कर दिया एक तरफ़ मणिपुर जो सिर्फ़ 2 सीट देता है राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण नहीं है जितना उत्तरप्रदेश है जहां 80 सीटें है हिंदू सीएम है जो कि सम्भवतः होने वाले प्रधानमंत्री हो सकते है। यह न्यूज ज्यादा फैली बजाए मणिपुर में बूथ कैप्चरिंग की।
समस्या यह है कि मीडिया सामाजिक स्थिति और राजनीतिक महत्व के आधार पर कहानियों को कैसे प्राथमिकता देता है। कोलकाता बलात्कार मामले को व्यापक कवरेज मिली जबकि मुजफ्फरपुर की घटना को किनारे कर दिया गया। एक पत्रकार की भूमिका पर उन्होंने कहा कि, "पत्रकारों के रूप में हमें हाशिए पर पड़ी आवाज़ों को उठाना चाहिए।"
मणिपुर में हुई हिंसा देश विदेश में चर्चा में तब आई जब दो महिलाओं को नग्न अवस्था में घुमाने का एक वीडियो वायरल हुआ जिसके बाद राहुल गांधी, स्मृति ईरानी, देशभर के नेताओं ने इस पर ट्वीट किया। मजबूरी में मणिपुर के मुख्यमंत्री बीरेन सिंह को भी ट्वीट करना पड़ा उसके बाद ही मुख्यधारा के मीडिया ने इस पर ध्यान दिया। यह ध्यान देने योग्य है कि वीडियो वास्तव में 4 मई 2023 का था लेकिन इसे सामने आने में 45 दिन लग गए। 19 जून 2023 को सामने आए वीडियो ने आक्रोश पैदा किया जो कि असलियत में 4 मई 2023 का वीडियो था। डेढ़ महीने तक यह वीडियो छुपा के रखा गया अंततः किसी मिलिटेंट ने इसे लीक कर दिया। अचानक मुख्यधारा के मीडिया ने परवाह की एक के बाद एक बड़े न्यूज एंकर्स नविका कुमार, सुधीर चौधरी और अर्नब गोस्वामी ने अपने प्राइम टाइम शो में इस पर चर्चा की। हालांकि, यह आक्रोश थोड़े समय ही बना रहा बमुश्किल 20,21,22 तारीख तक क्योंकि उसके बाद मीडिया का ध्यान बदल गया। कुछ राज्यों के विधानसभा चुनावों पर चला गया। 25,26 जून तक खबरें यह चलने लगी कि क्या कांग्रेस राजस्थान में सरकार बना पाएगी? क्या शिवराज सिंह चौहान फिर से मुख्यमंत्री बनेंगे? इससे मीडिया की प्राथमिकताओं और उन्हें कितनी आसानी से बहकाया जा सकता है यह समझा जा सकता है।
मणिपुर की अपनी यात्राओं के दौरान जो हाल सप्तर्षि ने देखा वह सुनकर रोंगटे खड़े हो गए। हर जगह हर घर में बंदूके, उग्रवादी खुलेआम घूमते और हिंसा दंगा फसाद एक दैनिक वास्तविकता बन चुकी है। रॉकेट से हमले हो रहे है। स्थानीय अर्थव्यवस्था बड़ी नाजुक नशीली दवाओं ड्रग्स ओपियम पॉपी का व्यापार बड़े पैमाने पर म्यांमार से चल रहा है सारे हथियारों के अलावा गोला बारूद रॉकेट अवैध व्यापार सब साथ चल रहा हैं। म्यांमार में चल रहे लोकतंत्र समर्थक आंदोलन और सेना संघर्ष के साथ राजनीतिक अस्थिरता ने विद्रोही समूहों को एक जमीन तैयार करके दे दी। इनमें से कई सारे ग्रुप्स को म्यांमार में एक सुरक्षित ठिकाना मिल गया जहां से वह भारतीय धरती पर हमला कर रहे हैं।
मुख्यधारा का मीडिया सरकार का गुलाम का आज इसलिए है क्योंकि उसका स्वामित्व अक्सर राजनीतिक हितों से जुड़ा होता है। उदाहरण के तौर पर रिपब्लिक टीवी के शेयर पूर्व आईटी मिनिस्टर राजीव चंद्रशेखर के पास है। उसी तरह इंडिया टीवी के नितिन गडकरी के पास। एनडीटीवी का अडानी के पास। नेटवर्क 18 का अंबानी के पास। ऐसे तमाम मीडिया घरानों के शेयर होल्डर्स पर नज़र दौड़ाएंगे तो हम पाएंगे कि ये सभी राजनीतिक प्रभाव के दबाव में हैं।
गौर करने वाली बात यह थी कि मणिपुर हिंसा भड़कने के दो महीने पहले मणिपुर राज्य सरकार ने एसओओ (Suspension of Operations -SoO) समझौते से अपना नाम वापस ले लिया था। 10 मार्च 2023 को मणिपुर सरकार ने दो उग्रवादी समूहों कुकी नेशनल आर्मी (केएनए) और ज़ोमी रिवोल्यूशनरी आर्मी (जेडआरए) के साथ ऑपरेशन सस्पेंशन (एसओओ) समझौते से हटने का फैसला किया। कुकी के साथ एसओओ समझौते पर 2008 में भारत सरकार और पूर्वोत्तर राज्यों मणिपुर और नागालैंड में सक्रिय विभिन्न कुकी उग्रवादी समूहों के बीच युद्धविराम समझौते के रूप में हस्ताक्षर किए गए थे। समझौते के तहत, कुकी उग्रवादी समूहों ने हिंसक गतिविधियां बंद करने तथा सुरक्षा बलों की निगरानी के लिए निर्दिष्ट शिविरों में आने पर सहमति व्यक्त की। बदले में भारत सरकार कुकी समूहों के खिलाफ अपने अभियान को निलंबित करने पर सहमत हो गयी थी। समझौता टूटने के बाद हिंसा और बढ़ गई असम राइफल्स जिसे कानून व्यवस्था बनाए रखने का काम सौंपा गया उसे स्थिति को नियंत्रित करने में कई सारी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
अपने सूत्र को कैसे महफूज रखें इस सवाल का जवाब बताते हुए सप्तर्षि ने कहा, "हम संघर्ष क्षेत्रों से रिपोर्टिंग करने में चुनौतियों का सामना करते हैं। हमारे सूत्र अक्सर जोखिम में होते हैं और हमें उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए। मैं सुरक्षित संचार के लिए टेलीग्राम का उपयोग करता हूं क्योंकि फोन कॉल टैप किए जा सकते हैं। संघर्ष क्षेत्रों में सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पुलिस और सेना के अधिकारियों के साथ अपने संबंध बनाए रखना बेहद महत्वपूर्ण है। अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए समझौता करने किसी का पक्ष लेने के लिए मजबूर होना पड़ता है। लेकिन पत्रकारों के रूप में हमारा काम दस्तावेज बनाना है किसी का पक्ष लेना नहीं।"
मणिपुर के उनके अनुभव जो आज मुझे पता चले उससे कई चीज़ें सीखने को मिली:
1. किसी हिंसाग्रस्त इलाके की जटिलताओं को समझने के लिए स्थानीय सूत्र बनाएँ।
2. भारत में जो मुद्दे मीडिया का ध्यान खींचते है वह वास्तव में सोशल स्टेटस का एक प्रोडक्ट होती है। यहां हाशिए पर पड़े लोगों की बातें कोई नहीं सुनना चाहता है।
3. पत्रकार के रूप में उन कहानियों को कवर करना चाहिए जो प्राइम-टाइम टीवी पर नहीं आती हैं।
4. पुलिस और सेना के अधिकारियों के साथ संबंध बनाए रखकर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।
5. हिंसा अत्याचार दंगा इस सब को रोकना पुलिस प्रशासन सरकार की ज़िम्मेदारी है, पत्रकार की ज़िम्मेदारी उन चीज़ों का दस्तावेजीकरण करना हैं।
6. हर छोटी चीज़ का दस्तावेजीकरण इसलिए करना चाहिए ताकि कल को अगर 10 साल बाद कोई व्यक्ति कहे कि अरे मणिपुर जैसा तो कुछ हुआ ही नहीं था। तो हम बता पाए कि मैं वहां मौजूद था मैंने आंखों देखा हाल देखा है।
7. अपने काम को एक ज़िम्मेदारी के तरह लेना चाहिए न कि प्रसिद्धि पाने का साधन।
8. एक जानकारी को कई सूत्रों से सत्यापित करना चाहिए।
9. अपने सूत्रों की सुरक्षा के लिए सुरक्षित नेटवर्क का उपयोग करना चाहिए।
10. सरकार किसी की मित्र नहीं होती है, राजनीतिक दल लगातार चुनावी लाभ की तलाश में रहते है। अगर कहीं कोई दंगा होता है तो उससे ज़रूर किसी न किसी को फायदा पहुंचता हैं।
पत्रकार के रूप में हमेशा सरकार के कार्यों और मीडिया की भूमिका पर सवाल उठाना चाहिए। मीडिया अगर कुछ दिखा रहा है तो हमेशा सवाल किया जाना चाहिए कि क्या वास्तव में जनहित की सेवा की जा रही हैं या फिर किसी रेटिंग या राजनीतिक एजेंडे से कुछ प्रेरित हैं? अंत में उन्होंने हमसे आग्रह किया कि आप उन कहानियों को कवर करें जो मायने रखती है खासतौर से कोई मानवीय त्रासदी। भले ही वे हज़ारों व्यूज न लाएँ। पत्रकारिता का असली उद्देश्य मानवीय पीड़ा का दस्तावेजीकरण करना है और हाशिए पर पड़े लोगों को आवाज़ देना है। कल हुए इस अतिथि व्याख्यान का सार मुझे यह समझ आया कि मणिपुर के नाम पर मुख्यधारा मीडिया टीआरपी की रोटियाँ सेंक रहा हैं! आज मीडिया की मक्कारी के कारण मणिपुर ज्यादा जल रहा है। शायद आने वाली नस्लें कहेंगी, "जब मणिपुर सुलग रहा था, तब मीडिया सो रहा था!"
~ नैवेद्य पुरोहित
#मणिपुर #मीडिया #द_क्विंट #सप्तर्षि_बसाक




सभी 10 प्वाइंट जो सीखने को मिले है हमेशा याद रखना। और सरकार कोई भी पार्टी की हो सवाल पूछने वाला दुश्मन लगता हैं उनको याद रखना।
ReplyDeleteयुवा सप्तऋषि बसाक और तुम्हारे जैसे युवा जागरूक पत्रकार है तो मणिपुर की सच्चाई सामने आएगी ही , ऐसी आशा है