पालीवाल समाज के प्रथम पत्रकार गणेशचन्द्र जी पुरोहित की 54वीं पुण्यतिथि पर कोटि कोटि नमन

"महान व्यक्ति महान पैदा नहीं होते, वे महान बनते हैं।" "Great men are not born great, they become great." आज से 54 वर्ष पहले आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि शुक्रवार का वह दिन 10 जुलाई 1970 को मेरे परदादाजी स्वर्गीय गणेशचन्द्र जी पुरोहित का असामयिक निधन हुआ था। मुझे उनसे मिलने का मौका कभी नहीं मिला लेकिन परिवार और समाज के बुजुर्गों द्वारा बताई गई कहानियों ने एक ऐसे व्यक्ति की मेरे सामने ज्वलंत तस्वीर पेश की जो न केवल अपने समय के एक अग्रणी पत्रकार थे, बल्कि बेहद आकर्षक व्यक्ति थे।
परिवार के बुजुर्ग अक्सर उनके आकर्षक रूप और करिश्माई व्यक्तित्व के बारे में याद करते हुए कहते थे, "वे इतने सुंदर थे कि लोग उन्हें देखे बिना नहीं रह सकते थे।" अपनी मृत्यु के समय उनकी उम्र लगभग 45-50 वर्ष की रही होगी। वे पालीवाल ब्राह्मण समाज के पहले पत्रकार थे 1955 में भारत को स्वतंत्रता मिलने के ठीक आठ साल बाद मेरे परदादाजी ने पालीवाल ब्राह्मण समाज के लिए 'पालीवाल' नामक मासिक पत्रिका शुरू की। यह पत्रिका निःशुल्क वितरित की जाती थी और इन्दौर के जवाहर मार्ग पर रॉयल प्रिंटर्स द्वारा मुद्रित होती थी। पालीवाल पत्रिका का मई 1970 का विशेषांक मेरे घर में मौजूद है जिसमें उनकी संपादकीय एवं लेखों को पढ़ के उनका व्यक्तित्व समझा जा सकता है। हमेशा नूतन विचारों, प्रगतिशील शक्तियों का समर्थन और रूढ़िवादी मानसिकता दकियानूसी विचारों के ईमानदार विरोधी थे। उन्होंने 1963 में दैनिक सांध्यकालीन समाचार पत्र 'टाइम्स ऑफ इंदौर' भी शुरू किया। उनकी असामयिक मृत्यु के बाद मेरे दादाजी राजेन्द्र पुरोहित ने 1986 में टाइम्स ऑफ इंदौर को पुनर्जीवित किया और इसे प्रारंभ में पाक्षिक फिर साप्ताहिक प्रकाशन में बदल दिया जो कि आज भी 38 साल से लगातार प्रकाशित हो रहा है। परदादाजी ने 1965 में साप्ताहिक 'लड़खड़ाती दुनिया' की भी स्थापना की जो यूनियन प्रिंटिंग प्रेस, इन्दौर से कुछ समय तक प्रकाशित हुई। इन पत्रों के माध्यम से सामाजिक, राजनीतिक, साहित्यिक, धार्मिक, आर्थिक जागरूकता बढ़ाने के साथ उन्होंने लोगों के बीच एक सेतु के रूप में काम करते हुए समाज को सूचित और जोड़े रखने का महत्वपूर्ण कार्य किया।
उनकी उपलब्धियाँ इन प्रकाशनों तक ही सीमित नहीं रहीं औपचारिक शैक्षणिक डिग्री न होने के बावजूद उनकी बुद्धि और व्यक्तिव ने अच्छे-अच्छे डिग्रीधारियों सबसे शिक्षित व्यक्तियों को भी उनके आगे बौना बना दिया था। अपने पत्रकारीय जीवन में उन्होंने इंदौर समाचार और दैनिक स्वदेश के साथ भी काम किया। उनकी मित्र मंडली उस दौर की मशहूर हस्तियां थी जिनमें राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे मोहनलाल सुखाड़िया, मेवाड़ के अंतिम शासक महाराणा भगवंत सिंह, निरंजननाथ आचार्य, हीरालाल शर्मा, गंगाराम तिवारी, मनोहर सिंह मेहता, सुरेश सेठ, जोहरीलाल झांझरिया, भागवत साबू, जितेंद्र सिब्बल, आर एस माहेश्वरी, मामा माणिकचंद्र बाजपेई, पुरुषोत्तम विजय, सुरेश राठौर, अक्षय मुद्गल, बालाराव इंगले, दिनेश अवस्थी, वैद्य भवानी शंकर, प्रोफेसर नारायणदास बागोरा, प्रोफेसर रामचंद्र पुरोहित, लालूराम दवे, प्रताप व्यास, श्रीधर जोशी, चुन्नीलाल व्यास, शंकरलाल बागोरा, किशोरीलाल जोशी, विरदीचंद पुरोहित और कई अन्य प्रमुख हस्तियाँ शामिल थीं। 1950 के दशक के उत्तरार्ध में, मेरे परदादाजी ने अपने साथियों के साथ मिलकर पालीवाल ब्राह्मण समाज के लिए एक लोकतांत्रिक ढांचे की कल्पना की थी। उनके प्रयासों से तत्कालीन अध्यक्ष टेकचंदजी दवे के मार्गदर्शन में समाज के मंत्री चतुर्भुज जी जोशी ने साधारण सभा में 31 मार्च 1959 को संविधान का मसौदा प्रस्तुत किया और सर्वानुमति से स्वीकृत होकर उसी दिन से प्रभावशाली हो गया था। घर पर रखी 'पालीवाल' पत्रिका में प्रकाशित समाज के संविधान के अनुसार ही सभी कार्य चलते रहे।
उन्हें "सिद्धाति शास्त्री, साहित्य एवं सम्पादन कला विशारद" की अनूठी उपाधि प्राप्त थी। वे संभवतः पालीवाल समाज में ऐसा गौरव प्राप्त करने वाले एकमात्र व्यक्ति थे। इन्दौर के हेमिल्टन रोड का नाम बदलकर महाराणा प्रताप पथ करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी।
पत्रकारिता के क्षेत्र में उनके द्वारा रौपे गए पौधे आज वटवृक्ष बन रहे हैं। 'टाइम्स ऑफ इंदौर' और 'पालीवाल सखी' जैसे प्रकाशन उनकी स्थायी विरासत हैं। मैं उनकी चौथी पीढ़ी अपने परदादाजी के जीवन के सद्कार्यों से प्रेरणा लेकर यह विरासत आजीवन कायम रखूंगा। उनकी 54वीं पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। ~ नैवेद्य पुरोहित #स्वर्गीय_गणेशचन्द्र_जी_पुरोहित #पालीवाल_ब्राह्मण_समाज #'पालीवाल'_मासिक_पत्रिका #टाइम्स_ऑफ_इन्दौर #लड़खड़ाती_दुनिया #समाज_का_संविधान

Comments

Popular posts from this blog

20 की उम्र में चारधाम पूरे, रिश्तों का पंचधाम भी जी लिया!

जड़ों से जुड़ाव की पुकार: एक बार फिर कुलदेवता के दरबार में!

मन की शांति का रहस्य: स्वीकार्यता है!