सब कुछ इंटरनेट पर मिल जाता है तो अख़बार का क्या फायदा?
इस सवाल का जवाब आपको स्वतः मिल जाएगा जब आप पाएंगे कि इस डिजिटल युग में भी भारत में करोड़ों घरों तक रोज़ सुबह अख़बार पहुंचता है। समाचार पत्र और पत्रिकाएं लगभग दो सदियों से समय के साथ चलते रहे हैं। आज भी उन्हें मीडिया का सबसे विश्वसनीय स्वरूप माना जाता है पाठक आज भी छुपी हुई खबरों की तरफ मुड़ता है तो इसलिए कि उसका मजबूत विश्वास है कि जो प्रिंट में छपा होगा वही सही होगा। यह भी सच है कि कई सारे पश्चिमी देशों में प्रिंट इंडस्ट्री दबाव में है लेकिन भारत में प्रिंट ने वैश्विक ट्रेंड को दूर रखा है और वह अभी भी बढ़ रहा है अब इसमें कुछ तरह के चिन्ह देखने लगे हैं। 2017 के वर्ल्ड प्रेस ट्रेंड्स डब्ल्यूपीटी रिपोर्ट के मुताबिक भारत दुनिया का सबसे बड़ा सातवां प्रिंट मार्केट है और एशिया में जापान और चीन के बाद तीसरे नंबर पर है। भारत के प्रिंट मार्केट के आकार का अंदाजा मार्च 2019 में जारी फिक्की ईवाय की रिपोर्ट 'ए बिलियन स्क्रीन्स ऑफ अपॉर्चुनिटी' से लगाया जा सकता है। इस रिपोर्ट के मुताबिक कहा गया है कि प्रिंट 2018 में दूसरा सबसे बड़ा आय जुटाने वाला रहा है इसकी कमाई 306 अरब रुपए है जो टीवी की कमाई 740 अरब रुपए के बाद दूसरे नंबर पर है। प्रसार और कमाई दोनों के लिहाज से प्रिंट का विकास गत 3 दशकों से लगातार हो रहा है। इंटरनेट के कई सारे फायदे हो सकते है लेकिन नुकसान भी कुछ कम नहीं है वहीं दूसरी तरफ़ अख़बार से कोई नुकसान नहीं। टाइम्स ऑफ इंडिया के साहिबाबाद स्थित प्रिंटिंग प्लांट में जब आप जाएंगे तो वहां आप देख सकते है कि टेक्नोलॉजी का किस तरह से इस्तेमाल किया गया है। टाइम्स ऑफ इंडिया का यह प्रिंटिंग प्लांट देश का पहला वॉटर पॉजिटिव प्लांट है जो कि आईएसओ से गुणवत्ता, पर्यावरण, स्वास्थ और सुरक्षा प्रणालियों के लिए प्रमाणित है। देखा जाए तो अख़बार ही एकमात्र ऐसा माध्यम है जो एक मनुष्य की पांचों इंद्रियों पर मंच बनाता है। मीडिया के दूसरे माध्यम जैसे कि टीवी, रेडियो, वेबसाइट्स में से प्रिंट ऐसा माध्यम है जिसे छू भी सकते है देख भी सकते है सुन भी सकते है सूंघ भी सकते है और टेस्ट भी कर सकते हैं। यह सबसे बड़ा फायदा है प्रिंट मीडिया का उसकी भौतिक रूप में उपस्थिति जिसे छुआ जा सकता है। ईमेल्स, वेबसाइट्स, सोशल मीडिया पोस्ट्स को आप आसानी से इग्नोर कर सकते है लेकिन छपे हुए प्रिंट की गई कोई सामग्री को अनदेखा करना बहुत मुश्किल है। किसी भी मार्केटिंग पेशेवर व्यक्ति को पता होगा कि हार्ड कॉपी सामग्री कोई भी उत्पाद को खरीदने या उपयोग करने के लिए एक प्रासंगिक अनुस्मारक बनाती है। दूसरा सबसे बड़ा फायदा मुझे यह लगता है कि आज की यंग डिजिटल ऑडियंस जेन ज़ी जो सिर्फ़ सोशल मीडिया पर मौजूद है उसकी तुलना में प्रिंट मीडिया, अर्थात् अख़बार, पोस्टर, फ़्लायर्स और बैनर आमतौर पर बहुत व्यापक जनसांख्यिकीय से मेल खाते हैं। राजनीतिक अभियान अपनी दृश्यता बढ़ाने के लिए बड़े आउटडोर बैनरों या साइनेज का उपयोग करके जनता की राय को प्रभावित करने के लिए इस पहुंच का उपयोग करते हैं। प्रिंट मीडिया में पर्सनलाइजेशन किया जा सकता है उदाहरण के लिए, प्रिंट मीडिया में छपी गई चीज़ को पढ़ने और याद रखने की अधिक संभावना है, विशेष रूप से कोई पर्सनलाइज्ड कार्ड या निमंत्रण आदि। यह जोड़ा गया भावनात्मक मूल्य ग्राहकों तक पहुंचने और स्थायी संबंध बनाने का एक शक्तिशाली उपकरण है।प्रिंट मीडिया की लागत के मुकाबले डिजिटल-आधारित विज्ञापन सस्ता और तेज़ हो सकता है लेकिन प्रिंट भी सस्ता और तेज़ है। पुराने और नए ग्राहकों तक सीधे पहुंचने का अतिरिक्त बोनस प्रदान करता है।
आज के डिजिटल युग में जहां खबर सिर्फ एक क्लिक दूर है वहीं पर यह सवाल उठ रहा है कि पारंपरिक अखबारों की आखिर अब क्या प्रासंगिकता बची? लेकिन अख़बार की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है इंटरनेट युग चाहें कितना भी आगे पहुंच जाएं अख़बार को मिटा नहीं सकता। समाचार पत्र में समाचारों का एक चयन पेशेवर पत्रकारों द्वारा सावधानीपूर्वक शोध, तथ्य-जांच और सत्यापन के बाद किया जाता है। इंटरनेट पर फैल रही गलत सूचनाओं , भ्रामक और फर्जी खबरों फेक न्यूज के युग में, समाचार पत्र सटीक जानकारी के विश्वसनीय स्रोत के रूप में काम करते हैं। संपादकीय प्रक्रिया यह सुनिश्चित करती है कि केवल सबसे प्रासंगिक और महत्वपूर्ण कहानियाँ ही छापी जा सकें, जिससे पाठकों के अंतहीन ऑनलाइन सामग्री को छानने में लगने वाले समय और प्रयास की बचत हो। इसके अलावा, अख़बार में समाचार कहानियों का गहन अध्ययन व विश्लेषण किया जाता हैं, जिससे पाठकों को जटिल मुद्दों की गहरी समझ मिलती है। जबकि इंटरनेट त्वरित सुर्खियाँ और साउंडबाइट प्रदान करता है, समाचार पत्र वर्तमान घटनाओं की बारीकियों में गहराई से उतरते हैं और एक व्यापक अंतर्दृष्टि और दृष्टिकोण पेश करते हैं जिन्हें अक्सर ऑनलाइन समाचार उपभोग की तेज़ गति वाली दुनिया में अनदेखा कर दिया जाता है। कई सारे लोकल स्थानीय समाचार पत्र, विशेष रूप से, स्थानीय व्यवसायों, संगठनों और व्यक्तियों को अपने समुदाय से जुड़ने के लिए एक मंच के रूप में कार्य करते हैं। जिन्हें हम लघु एवं मझौले समाचार पत्र कह सकते है। वे स्थानीय घटनाओं को कवर करते हैं, स्थानीय मुद्दों को उजागर करते हैं और अपने समुदाय के सदस्यों को अपनी राय और चिंताओं को व्यक्त करने के लिए एक मंच प्रदान करते हैं। स्थानीय पहचान और एकजुटता की इस भावना को इंटरनेट के विशाल और अवैयक्तिक नॉन पर्सनलाइज्ड क्षेत्र में आसानी से दोहराया नहीं जा सकता है। अख़बार सत्ता में बैठे लोगों को जवाबदेह बनाकर लोकतंत्र के संरक्षण में योगदान देते हैं। खोजी पत्रकारिता कई समाचार पत्रों की आधारशिला है, जैसे कि द इंडियन एक्सप्रेस। भ्रष्टाचार को उजागर करना, गलत कामों को उजागर करना, सरकार और कॉर्पोरेट संस्थानों में पारदर्शिता सुनिश्चित करना। समाचार पत्रों के संसाधनों और समर्पण के बिना कई महत्वपूर्ण कहानियाँ अनकही रह जाएंगी और जनता अपने निर्वाचित नेताओं व अन्य शक्तिशाली हस्तियों के कार्यों के बारे में अंधेरे में रह जाएगी। समाचार पत्रों का एक अन्य महत्वपूर्ण कार्य इतिहास को संग्रहीत और संरक्षित करना भी है। जबकि इंटरनेट पर जानकारी अल्पकालिक होती है जिसे आसानी से बदला जा सकता है। समाचार पत्र घटनाओं का एक ठोस रिकॉर्ड प्रदान करते हैं जिसे भविष्य में आने वाली पीढ़ियां अपने अध्ययन और सीखने के लिए इस्तेमाल कर सकती है। अगर समाचार पत्र न होएंगे तो परिणामस्वरूप न केवल पत्रकारिता की नौकरियाँ खत्म हो जाएंगी, बल्कि मुद्रण और वितरण जैसे संबंधित उद्योगों पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ेगा। स्थानीय व्यवसाय अपने लक्षित दर्शकों तक पहुंचने के लिए स्थानीय अर्थव्यवस्था का समर्थन करने और सामुदायिक विकास में योगदान देने के लिए समाचार पत्र के विज्ञापन पर भरोसा करते हैं।
समाचार पत्र हमारे समाज में एक महत्वपूर्ण और अपूरणीय संस्था बने हुए हैं। विश्वसनीय और गहन रिपोर्टिंग प्रदान करने से लेकर सामुदायिक जुड़ाव को बढ़ावा देने और लोकतंत्र को संरक्षित करने तक समाचार पत्र कई आवश्यक कार्य करते हैं जिन्हें अकेले इंटरनेट द्वारा दोहराया नहीं जा सकता है। जैसे-जैसे हम डिजिटल युग में प्रवेश कर रहे हैं, समाचार पत्रों के स्थायी मूल्य को पहचानना और हमारे लोकतांत्रिक समाज की आधारशिला के रूप में उनका समर्थन करना जारी रखना आवश्यक है। भारत में प्रिंट के वैश्विक ट्रेंड को पीछे छोड़ने के कई सारे कारण हैं जैसा की सेटेलाइट प्रिंटिंग की तकनीक 1990 के बाद सेटेलाइट टेक्नोलॉजी के आगमन के बाद समाचार पत्रों के लिए यह बहुत आसान हो गया है कि वह दूर दराज के लाखों से समाचार पत्र प्रकाशित करें उन्होंने टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल एक केंद्रीय प्रकाशन से छपाई के लिए तैयार पेजों के छोटे शहरों में ट्रांसफर के लिए किया। जैसा कि मैंने शुरुआत में ही कहा कि भारत के करोड़ों घरों में रोज सुबह अख़बार पहुंचता है। भारत में पाठको को अपने दरवाजे पर सुबह-सुबह समाचार पत्र मिलते हैं उन्हें समाचार पत्र लेने के लिए सुबह-सुबह बाजार या वेंडर के पास नहीं जाना पड़ता है जैसा कि अमेरिका या यूरोप के कई सारे बाजारों में होता है। भारत में पुराने समाचार पत्रों की रीसेल वैल्यू भी है जिससे पाठक उसकी कीमत का एक हिस्सा निकाल लेता है। भारत में समाचार पत्र मूल कीमतों से काफी कम दरों पर बेचे जाते हैं टाइम्स आफ इंडिया जिसकी एक कॉपी 4.50 रुपए में मिलती है उसकी असली लागत 24 से 32 रुपए तक होती है। यह बात दूसरे समाचार पत्रों पर भी लागू होती है कोई भी समाचार पत्र अपने पाठकों को मूल कीमत पर नहीं बेचता है इससे पाठकों के लिए वह काफी किफायती और खरीदने योग्य हो जाते हैं। बढ़ती हुई साक्षरता में वृद्धि के कारण समाचार पत्रों की बिक्री में बढ़ोतरी को संभव बनाया है। नई साक्षर जनसंख्या अपनी भाषा में समाचार पत्र पढ़ना पसंद करती है और यही कारण है कि देश में भाषाई समाचार पत्रों का विकास हुआ है। भारत में 100 से भी ज्यादा भाषाओं में समाचार पत्र छपते हैं लेकिन मुख्य समाचार पत्र 16 बड़ी भाषाओं में प्रकाशित होते हैं जिनका अंग्रेजी समाचार पत्रों की तुलना में स्टाइल प्रस्तुति दृष्टिकोण के मामले में बहुत अलग है। आज भी हमारे देश में अंग्रेजी समाचार पत्रों की तुलना में भाषाई समाचार पत्र ज्यादा लोगों के द्वारा पढ़े जाते हैं इंडियन रीडरशिप सर्वे आईआरएस 2019 में स्पष्ट हुआ है। उस सूची में शीर्ष 10 जो समाचार पत्रों के रीडरशिप पर आधारित है। उसमें सिर्फ़ एक ही अंग्रेज़ी समाचार पत्र शामिल है। उस सूची के मुताबिक उसमें चार हिंदी समाचार पत्र है दैनिक जागरण दैनिक भास्कर अमर उजाला और राजस्थान पत्रिका। इसके अलावा पांच अन्य भाषाओं के समाचार पत्र है मलायाला मनोरमा, इनाडु, तंती, मातृभूमि और लोकमत। इस पूरी सूची में एकमात्र टाइम्स ऑफ़ इंडिया ही अंग्रेजी समाचार पत्र है। ऐसा नहीं है कि भाषाई समाचार पत्रों का प्रसार बढ़ा बल्कि उनके विज्ञापन राजस्व में भी बढ़ोतरी हुई है। हिंदी समाचार पत्रों को 37% विज्ञापन राजस्व मिला अंग्रेजी समाचार पत्रों को 25% राजस्व मिला और अन्य सभी भाषाओं के समाचार पत्रों का कुल विज्ञापन राजस्व 38% है। सूचना की बढ़ती भूख ने कई परिवारों को दो समाचार पत्र खरीदने के लिए प्रेरित किया है एक अंग्रेजी का और एक भाषा ही यह देश में मेडल क्लास की बढ़ोतरी के कारण हुआ है। कई सारे धनाढ्य परिवारों ने तो दो समाचार पत्र खरीदने शुरू किया एक मुख्य समाचार पत्र और एक आर्थिक समाचार पत्र। विभिन्न समाचार पत्रों ने अपने कॉम्बो पैकेज के जरिए ज्यादा से ज्यादा पाठकों को इन्हें खरीदने के लिए प्रेरित किया है। टीयर 2 और टीयर 3 शहरों में लोगों की बढ़ती हुई क्रय शक्ति ने कई सारी कंपनियों के लिए नए मार्केट खोले हैं यह कंपनियां समाचार पत्रों को अपने उत्पादों के विज्ञापन के लिए अच्छा माध्यम मानती है। इससे समाचार पत्रों की कमाई बढ़ी है और उन्होंने अपने उत्पादों को बेहतर बनाना शुरू किया है।
उद्योग संगठन फिक्की इवाय की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक पांच साल में पहली बार समाचार पत्रों की विज्ञापन से आय और पे रेवेन्यू दोनों में बढ़ोतरी हुई है। रिपोर्ट में लिखा गया है कि 2022 के मुकाबले 2023 में प्रिंट मीडिया की कमाई 4% बढ़ी है। प्रिंट का ग्लोबल शेयर 4 फीसदी है (सभी तरह के मीडिया में ऐड पर होने वाले कुल खर्च का)। भारत की हिस्सेदारी 20 फीसदी है यानी भारत में हर तरह के मीडिया में ऐड पर होने वाले कुल खर्च का 20 फीसदी प्रिंट में होता है। चीन में प्रिंट शेयर जीरो के करीब है। अमेरिका और ब्रिटेन में यह 5 फीसदी से भी कम है। समाचार पत्र के बिना पत्रकारिता संभव ही नहीं अंत में इतना ही कहना चाहूंगा कि,
"धुआं कहीं और निकल रहा है धुंध कहीं और छाई है...
संसद और न्यायपालिका झुलस रहे है धीरे-धीरे,
अखबारों ने तो बस आग लगाई है!"
~ नैवेद्य पुरोहित
#अख़बार #पत्रकारिता #प्रिंट_मीडिया

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