द ट्रिप: आई वोंट फॉरगेट इट टिल माय लास्ट ब्रेथ

28 सितंबर 2023 से 2 अक्टूबर 2023 के लॉन्ग वीकेंड पर लोगों ने अपने हिसाब से इस छोटे पर मच नीडेड ब्रेक के आनंद उठाएं। हॉस्टल, कॉलेज, क्लासेस, असाइनमेंट्स, स्टूडेंट काउंसिल, एडिटोरियल बोर्ड और भी ऐसी तमाम जगहों पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते-करवाते रोज़ की भागा दौड़ी से ऊब सा गया था। ज़रूरत थी एक एडवेंचरस सी यादगार ट्रिप की। दोस्तों से पूछा तो सभी को घर जाना था और वाजिब सी बात है चाहे कितना भी घूम लो अपने शहर अपने घर से ज्यादा सुकून कहीं नहीं मिलता। लेकिन ये बात मेरे मन में नागवार गुजरी मुझे सुकून से ज्यादा जुनून चाहिए था लिहाज़ा मैंने कई सारी ट्रैवल एजेंसियों से संपर्क किया। मैक्लॉडगंज, धर्मशाला, जयपुर, पुष्कर, ऋषिकेश, हरिद्वार, नैनीताल, मसूरी, देहरादून, बनारस, आगरा, और भी न जाने कहां-कहां कितनी सारी ट्रैवल एजेंसियों के एजेंटो से बात की। सबसे बात करने के बाद अपने दोस्तों के अलावा जिन भरोसमंद लोगों के साथ ट्रिप कर सकता हूं उनसे मनुहार की...कहीं चलते है अच्छी जगह, यादगार ट्रिप प्लान करते है, सबकुछ अपने बजट के अन्दर हो जाएगा, ये एजेंसियां है, आदि। सभी एजेंसियों के हर जगह के पैकेजेस मैंने उन सभी लोगों को बताएं लेकिन हर कोई किसी न किसी बहाने के साथ ना नुकुर करके मना कर रहा था। सिर पर सिर्फ़ एक जिद्द चढ़ी हुई थी कि कहीं जाना है...अब तो ठान सा लिया था कि चाहें अकेला जाना पड़े कहीं न कहीं तो जाऊंगा! आखिर में यूनिवर्सिटी के ही कुछ दक्षिण भारतीय मित्रों से पूछा उनसे बात करके लगा कि उनका भी मन है घूमने जाने का।
इसी बीच 27 सितंबर को यूनिवर्सिटी में नए नवेले आए फ्रेशर्स के लिए द ग्रैंड फ्रेशर्स पार्टी - Bluemoon 8.0 का आयोजन भी था। स्टूडेंट काउंसिल का हिस्सा होने से वहां तैयारियों में जुटे रहना पड़ा। दिनचर्या बेहद व्यस्त सी हो गई थी। समय ज़रा भी नहीं मिल पा रहा था। विभिन्न ट्रैवल एजेंसियों से बात करने के बाद मेरी बात गोसाइटसीर नामक ट्रैवल एजेंसी के कबीर से हुई। बाकी ट्रैवल एजेंसियों के एजेंटो से बात करने के बाद जब कबीर भाई से बात की तो उनकी बातों में थोड़ा भरोसा महसूस हुआ वह बंदा मुझे ट्रस्टेबल लगा। ट्रिप थी मैक्लॉडगंज, त्रिउंड ट्रेक और धर्मशाला की। साउथ वाले दोस्तों की बात करवाई एजेंसी से, बंदा काफ़ी कॉपरेटिव था उनसे जो बना वो करके दिया और कई सारे नेगोशिएशंस के बाद साउथ वाले कुल 8 लोग जाने को तैयार हुए। 27 की देर रात तक फ्रेशर्स पार्टी चलती रही। लंबी नींद के बाद अगले दिन 28 की शाम को हम 9 लोग बेनेट यूनिवर्सिटी से दिल्ली के विश्वविद्यालय मेट्रो स्टेशन पहुंचे जहां पहले से ही मौजूद हमारे दो सहयात्री हमारा इंतजार कर रहे थे। किस्मत से वे दोनों भी इंदौर के मिल गए तो पूरे समय अच्छा साथ रहा। गोसाइटसीर एजेंसी के वेद सर ने हमारे ट्रिप कोऑर्डिनेटर व एजेंसी के ट्रांसपोर्ट वेंडर अभिनव कपूर से मुलाकात करवाई जिनकी लग्जरी ट्रेवलर में हमने पूरा सफ़र तय किया। रात करीब साढ़े आठ बजे हम नई दिल्ली से मैक्लॉडगंज के लिए निकले और सुबह साढ़े सात बजे 29 सितंबर को मैक्लॉडगंज में हमारे होटल पहुंच चुके थे। रात में खाने के लिए हरियाणा स्थित देशभर में प्रसिद्ध मुरथल के पराठे खाएं। ट्रैवलर के ड्राइवर भैया हमें पहाड़ी घुमावदार रास्तों में बड़ी रोमांचक रफ्तार के साथ लेकर जा रहें थे। पहाड़ी इलाकों में जिन्हें ट्रैवल की आदत नहीं थी ख़ासतौर से मेरे दक्षिण भारतीय मित्रों को कई बार उल्टियां हुई।
होटल पहुंचने के बाद तैयार होकर हम सभी पैदल भागसु वाटरफॉल देखने गए जो काफी सुंदर था। भागसु वाटरफॉल का पानी काफ़ी ज्यादा ठंडा मानो सीधे हिमालय से निकलता हुआ बर्फ का पानी जैसा एकदम सफ़ेद था। भागसु वॉटरफॉल देखने के बाद हम ऊपर चढ़ाई चढ़ते हुए एक दर्शनीय स्थल शिवा कैफे पहुंचे जहां से बहुत प्यारा व्यू दिखता है। वहां लंच करने के बाद पैदल ही हम लोग दलाई लामा मोनेस्ट्री पहुंचे एक दम शांत सी जगह मन को शिथिल करने वाली। दलाई लामा मोनेस्ट्री से सूर्य अस्त होते हुए बहुत सुंदर नजारा दिख रहा था। सूर्यास्त होने के बाद मोनेस्ट्री से हम लोग वापिस पैदल लोकल मार्केट घूमने निकले। दिनभर पहाड़ी रास्तों पर पैदल चलकर अगले दिन के लिए एक छोटा सा ट्रेलर मिल गया था। रात में अपने होटल पहुंच के डिनर करने के बाद सब अगले दिन का इंतजार कर रहे थे - त्रिउंड ट्रेक का ! अगले दिन 30 सितम्बर को सुबह नाश्ता करने के बाद करीब दस बजे हम ट्रेकिंग के लिए निकल पड़े। हमारे ग्रुप के साथ एक और ग्रुप मिल गया जिन्होंने हमारे ही साथ ट्रेकिंग की क्योंकि दोनों ग्रुप के गाइड अच्छे दोस्त थे। एक नए ग्रुप में मैं काफी आसानी से घुलमिल गया था।
ट्रेकिंग का अनुभव मेरा पहले भी रहा है 2019 में दसवीं में 1 एमपी एयर स्क्वाड्रन एनसीसी, इंदौर का कैडेट था तब 10 दिन के लिए नेशनल ट्रेकिंग कैम्प कोल्हापुर, महाराष्ट्र गया था। पहले का अनुभव मेरे बहुत काम आया! हालांकि महाराष्ट्र के पहाड़ और हिमाचल के पहाड़ चढ़ने में बहुत अंतर महसूस हुआ। त्रिउंड ट्रेक का रास्ता काफी लंबा बेहद खतरनाक, सीधी खड़ी चढाई, बीच में खाने लायक ढंग का स्पेशली वेज में सिवाय मैगी के कुछ भी नहीं था। करीब 9 किलोमीटर खड़ी चढाई के बाद शाम साढ़े पांच बजे हम 10 हज़ार फीट ऊंचाई पर त्रिउंड टॉप पर पहुंच चुके थे। वहां से सनसेट का जो नज़ारा था उसे मैंने कैमरा के साथ अपनी नज़रों में हमेशा के लिए सहेज रखा है जिसे कभी भूल नहीं पाऊंगा! जैसे-जैसे अंधेरा होते गया कैम्प पर भीड़ बढ़ चुकी थी। रात तक हालत ये हो गई थी कि ग्रुप के आधे लोगों के फोन स्विच ऑफ, न बिजली न हाथ मुंह धोने का पानी न फोन सिर्फ बादलों में स्विफ्ट होता चमकता हुआ चांद जिसे देखकर बचपन में मैथिलीशरण गुप्त की पढ़ी वो पंक्ति याद आ गई 'चारू चन्द्र की चंचल किरणें...।' फोन न होने का भी आनंद था हम सब लोग साथ बैठकर हंसी मजाक कर रहे थे, अंताक्षरी खेल रहे थे, कुछ यादगार लम्हें बना रहें थे जिन्हें भले ही हमने फोन में कैद न किया हो पर अपने ज़ेहन में हमेशा महसूस करते रहेंगे। रात में टेंट में स्लीपिंग बैग में नींद निकालने के बाद जैसे ही सुबह उठा बादलों को चीरते हुए सूर्य की किरणे बेहद तेज़ सुंदर नज़र आ रही थी।
हम सबकी जिद्द थी कि जिस रास्ते से चढ़ के आए है उससे नहीं उतरेंगे दूसरे रास्ते से जो भले ही लंबा हो वहां से ट्रेक डाउन करेंगे। जल्द ही सुबह बैग पैक करके हम लोगों ने दोनों गाइड के साथ लंबे रास्ते से नीचे उतरना शुरू किया। नया रास्ता पहले वाले से ज्यादा पथरीला और खतरनाक साबित हुआ, बड़े बड़े पत्थर, फिसलन, पहले से ज्यादा संकरा रास्ता, आखिरकार पहाड़ से वापिस उतरते-उतरते हम शाम 4 तक वापिस नीचे पहुंच चुके थे। उतरते वक्त रास्ते में जितने लोग हम साथ उतर रहे थे मस्ती मज़ाक करते हुए बातें करते हुए सावधानी के साथ एक दुसरे का ख्याल रखते हुए उतर रहें थे।
फिर वह क्षण जब हमें दूसरे ग्रुप वालों को बाय कहना पड़ा नई जगह नए और अच्छे लोगों से जान पहचान हुई कनेक्शंस बढ़े। वे सभी लोग मुझे हमेशा याद आएंगे। शाम करीब साढ़े छह सात बजे हमारे ग्रुप के बचे हुए दक्षिण भारतीय साथी आएं। मौसम तब तक बिगड़ चुका था बारिश होने लग गई। होटल से सबकुछ पैक करके 7-8 बजे हम मैक्लॉडगंज से दिल्ली के लिए शरीर में भारी थकावट लिए निकले और सीधे सुबह 6 बजे नई दिल्ली पहुंच गए। "यह ट्रिप मेरे लिए हमेशा बहुत खास रहेगी, आई वोंट फार्गेट इट टिल माय लास्ट ब्रेथ!" ~ नैवेद्य पुरोहित

Comments

  1. बहुत अच्छे से ट्रिप का विवरण दिया है नैवेद्य , पढ कर ऐसा लगा जैसे, हम ने भी धर्मशाला हिमाचल प्रदेश घूम लिया है

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

20 की उम्र में चारधाम पूरे, रिश्तों का पंचधाम भी जी लिया!

जड़ों से जुड़ाव की पुकार: एक बार फिर कुलदेवता के दरबार में!

मन की शांति का रहस्य: स्वीकार्यता है!