पालीवाल समाज के प्रथम पत्रकार स्वर्गीय गणेशचन्द्र जी पुरोहित की 53वीं पुण्यतिथि पर भावभीनी आदरांजलि

मेरे घर में मुझे बाल्यकाल में जिन चीज़ों को देख कर एक अलग आकर्षण महसूस होता था उसमें सबसे पहले प्रमुख रूप से एक तस्वीर रही हैं जो आज भी हॉल में लगी है। छोटा था तो वो तस्वीर किस शख्स की है यह जानने के लिए घरवालों से जब पूछा कि ये कौन है तब पता चला कि ये तो मेरे दादाजी के पापा है जैसे मेरे दादाजी है वैसे मेरे पापा के दादाजी जिन्हें मेरे पिताजी ने भी कभी नहीं देखा क्योंकि दादाजी जब 16 साल के थे तब ही उनके पिता का निधन हो गया था। इस तरह से पहली बार परदादाजी के साथ मेरा परिचय हुआ। हॉल में लगी हुई तस्वीर को पहले भी कई मर्तबा एकटक देखता रहता, चमकता हुआ चेहरा जिस पर एक विशेष तेज़ झलकता एक शांत शिथिल सी मुस्कान दिखती सफ़ेद शर्ट और टाई पहने ये शख़्स शुरू से ही मुझे आकर्षित करते रहे। तस्वीर में वो शख़्स बाहर से जितना सुंदर दिखते थे उतना ही अंदर से दबंगता झलकती थी। थोड़ा बड़ा हुआ तो हमेशा से जिस शख़्स को तस्वीर में देखा उनके प्रति जिज्ञासु हुआ समाज के बड़े बुजुर्गों से उनके बारे में पूछता तो सब यह कहते कि वे बहुत सुंदर दिखते थे। मैं कल्पना करने लगा कि कैसे दिखते होंगे वे तस्वीर में जितना सुन्दर लग रहें उससे ज्यादा सुंदर हक़ीक़त में !
यही है वो तस्वीर जिसे मैंने महसूस किया है। हॉल में लगी यह तस्वीर ही बचपन से मुझे आकर्षित करती रही है। मुझे हमेशा से पुरानी चीज़ों को संग्रहित करने का शौक रहा है घर में पड़े पुराने दस्तावेजों, पत्रों, फोटोज को हमेशा से खंगालते आया हूं। आज भी जब इच्छा होती है तब पुराने फोटोज की एल्बम, दस्तावेजों की फाइलें निकाल के बैठ जाता हूं कुछ ऐसी ही लगन कह लो या जिज्ञासुपन के कारण जब पहला लॉकडाउन लगा था तब मेरे हाथ एक ऐसी पुरानी एल्बम और फाइल आई जिसे देखने के बाद मैं चौंक गया और सही मायने में पालीवाल ब्राह्मण समाज के प्रथम पत्रकार स्वर्गीय गणेशचन्द्र जी पुरोहित से मेरा परिचय हुआ। जो फाइल मेरे हाथ लगी थी उसमें कई सारे गोपनीय दस्तावेज, उस समय के राजनेताओं अधिकारियों के साथ मेरे परदादाजी के फोटों, परदादाजी के समय का टाइम्स ऑफ इंदौर का फॉर्म ऑफ़ डिक्लेरेशन, पालीवाल समाज की पहली मासिक पत्रिका 'पालीवाल' का वह अंक जिसमें समाज संबंधी अनेक जानकारियों के साथ ही परिशिष्ट रूप में पालीवाल समाज का विधान है, इंदौर जिला प्रकाशन अधिकारी और बॉम्बे से प्रेस लायसन ऑफिसर के पत्र, परदादाजी का मृत्यु प्रमाण पत्र आदि थे। यह सब दस्तावेजों पत्रों को बारीकी से पढ़ कर उस समय के उनके फोटोज को देखकर मुझे उनके व्यक्तित्व और रुतबे का पता चला कि शहर-समाज में लोग उन्हें कितना चाहते थे।
पालीवाल ब्राह्मण समाज की पहली मासिक पत्रिका 'पालीवाल' का मुखपृष्ठ। यह 32 पेज का विशेषांक आज भी मेरे घर में संग्रहित किया हुआ है जिसमें तत्कालीन समाज की कई सारी जानकारियों के साथ समाज का संपूर्ण विधान भी प्रस्तुत है। आज भी जब मैं शहर या समाज के किसी कार्यक्रम में जाता हूं और बताता हूं कि मैं स्वर्गीय गणेशचन्द्र जी पुरोहित का वंशज हूं तो लोग स्नेहिल आंखों से देखकर आशिर्वाद देते हैं और मुझे गर्व है कि वे इतिहास बना गए पालीवाल समाज के इतिहास में अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज करवा गए जब इस समाज के नियम कानून बनाएं जा रहें थे पालीवाल समाज के संविधान की रुपरेखा तैयार की जा रही थी तब मेरे परदादाजी और उनके साथियों ने अपना अभूतपूर्व योगदान दिया। आज उनके निधन को 53 वर्ष बीत चुके है उनकी अनगिनत उपलब्धियां, स्मृतियां, लेखों को उनकी इस चौथी पीढ़ी ने अपने पास हमेशा के लिए सहेज कर रखा है। कोटि कोटि नमन। व्यक्ति के कर्म ही उसे अमर बना जाते है, जिसे मौत भी कभी मिटा नहीं पाती ! ~ नैवेद्य पुरोहित

Comments

Popular posts from this blog

20 की उम्र में चारधाम पूरे, रिश्तों का पंचधाम भी जी लिया!

जड़ों से जुड़ाव की पुकार: एक बार फिर कुलदेवता के दरबार में!

मन की शांति का रहस्य: स्वीकार्यता है!