बेनेट यूनिवर्सिटी में मेरा पहला साल सफ़लतापूर्वक बीता !
कभी सोचा नहीं था कि अपने प्रिय शहर इंदौर को छोड़कर 12वीं के बाद किसी दूसरे शहर में पढ़ने जाऊंगा। शुरू से ही मन में सिर्फ़ एक बात घुसा रखी थी कि चाहे कुछ भी हो जाएं "इंदौर तो नहीं छूटेगा अपने से" लेकिन समय का चक्र इस तरह से चला कि इंदौर छोड़ना ही पड़ा। जीवन का एक ऐसा महत्वपूर्ण कठिन निर्णय लिया जो काफ़ी मुश्किल था। एक अजीब सी दिल में बेचैनी मेहसूस होती थी कि अपना शहर घर-परिवार दोस्त-यार इन सबको छोड़कर एक नई जगह जाना सही रहेगा या गलत ? पर आज जब सबकुछ अच्छे से राज़ी खुशी हस्ते मुस्कुराते हुए एक साल बीत गया तो मन में थोड़ा संतोष हुआ कि घर से बाहर निकलना स्वयं को अंदर से मजबूत बनाने वाला निर्णय रहा। नई जगह नए लोग मिले कुछ अच्छे कुछ बुरे सब तरह के पर उनमें से कुछ इतने अच्छे मिले जो हरदम मेरे साथ खड़े रहें। आज जब एक साल बीत गया है तब मेरी यादों की झोली में वे सारी यादें समेटी हुई है जिसे सालभर मैंने अपने दोस्तों के साथ हॉस्टल में , कैम्पस में, फैकल्टीज़ के साथ क्लासेज में , फील्ड ट्रिप्स पर बनाई थीं। दोस्तों के साथ हॉस्टल में मज़े करना , कैम्पस के बाहर घूमने जाना , डेडलाइन के पहले असाइनमेंट्स सबमिट करना , वो लम्हें वो बातें जो कोई न जाने सिवाय मेरे दोस्तों के...दोस्तों के साथ बैठकें साथ खाना....चाहे कैसा भी स्वाद हो सब साथ मिलकर बैठके खा लेते...खैर, कुछ इस तरह से मेरा पहला साल बीता और अब जब छुट्टियों में इन्दौर आ चुका हूं तो घर आने की खुशी के साथ थोड़ी बहुत वहां की भी याद तो आ रही है...वहां थे तो घर की याद आती थी यहां हैं तो वहां बिताए यादगार लम्हें याद आ रहें हैं... ज़िक्र-ए-ख़ास बात तो ये है कि कुलमिलाकर कॉलेज का पहला साल मेरे लिए बहुत कुछ सीखने वाला रहा उम्मीद है कि बचे हुए दो साल भी भारत के सबसे बड़े और पुराने मीडिया घराने 'टाइम्स ग्रुप' की बेनेट यूनिवर्सिटी में सफलतापूर्वक बीतेंगे !
~ नैवेद्य पुरोहित

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