घर से दूर पहली होली !
होली एक ऐसा त्योहार जिसमें मैं कभी फूला न समाता हूं। बचपन से लेकर आज तक होली ही एकमात्र ऐसा त्योहार है जिसका मैं सालभर बड़े उत्साह के साथ इंतज़ार करता हूं। इस बात का वजन तब और बढ़ जाता है जब आप इंदौर जैसे शहर से ताल्लुक रखते हो जहां होली से ज्यादा रंगपंचमी का इंतज़ार रहता हैं। जहां रंगों के इस उत्सव में पूरे शहर ही नहीं वरन् दूर-दूर से लोग सिर्फ़ इसलिए शामिल होते है कि इंदौर की रंगपंचमी देखने को मिल जाएं बस। जिस प्रकार मथुरा वृन्दावन की होली बड़ी प्रसिद्ध है ठीक उसी प्रकार इंदौर की रंगपंचमी के अपने देश में ही नहीं विदेशों में भी चर्चे होते हैं।
मुझे शुरुआत से ही दीवाली पर पटाखे खरीदने से ज्यादा उत्सुकता होली पर पिचकारी रंग-गुलाल गुब्बारे खरीदने की रही हैं। मुझे आज भी याद है जब मैं सातवीं-आठवीं में था तब तक भी मैं होली के 1 हफ्ते पहले से पिचकारी लाने की ज़िद करता था और मेरी मम्मी तब मुझे बाज़ार से पिचकारी रंग-गुलाल गुब्बारे सब दिलाने ले जाती थी...।
बीते 18 सालों में मैंने कभी अपने घर से दूर होली नहीं मनाई ! इस बार जब अपने करियर को बुलंदियों पर पहुंचाने के लिए घर से बाहर निकल पड़ा हूं और होली की ज्यादा छुट्टियां भी नहीं मिली तब मन में यहीं विचार आया था कि इस बार मैं अपनों के साथ यह खुशियों भरा रंगों का त्योहार नहीं मना पाऊंगा। मन बड़ा विचलित सा हो गया था यहां तक कि जब यूनिवर्सिटी में 7 तारीख को होलिका दहन था उसके 1 दिन पहले तक मैंने बड़ा अकेला महसूस किया क्योंकि यूनिवर्सिटी में कोई कार्यक्रम वह भी होली सेलिब्रेशन जैसा कुछ नजर नहीं आ रहा था और मैंने बिल्कुल ही उम्मीद छोड़ दी थी कि बेनेट यूनिवर्सिटी में होलिका दहन या होली सेलिब्रेशन जैसा कुछ होगा ! मेरा मन बड़ा भारी और विचलित तब तक रहा जब तक की होलिका दहन नहीं हुआ जिस रात होलिका दहन यूनिवर्सिटी में हुआ उस समय मुझे लगा कि हां यहां भी माहौल तो है लेकिन अपने वहां की कुछ बात ही और है। होलिका दहन वाली रात जब सब लोग ट्रेडिशनल कपड़े पहनकर वहां पहुंच रहे थे जहां होलिका दहन किया जाने वाला था मैं और मेरे दोस्त भी सज धज कर होलिका दहन में शामिल हुए। होलिका दहन के बाद अग्नि की परिक्रमा लगाकर हम कॉलेज की तरफ़ से आयोजित डीजे नाइट में शामिल हुए। हम सब डीजे के उन होली वाले गानों पर खूब थिरके और बहुत नाचे। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद जब सब लोग सोने के लिए अपने हॉस्टल चले गए तब कमरे में पहुंचने के बाद भी मुझे नींद नहीं आ रही थी। बचपन के वह पल याद आ रहे थे जब रात में ही अगले दिन होली के लिए गुब्बारे बनाता था। छोटी-छोटी प्लास्टिक की गुब्बारों वाली थैली में रंग वाला पानी भरकर उन्हें तैयार करके एक बाल्टी में इकट्ठा किया करता था ताकि अगली सुबह दोस्तों पर जमके गुब्बारे फोड़ पाऊं। यह सब याद करके मैं सुबह पांच बजे सोया!
होली की वह सुबह जब बहुत शोर होने के कारण करीब 10:00 बजे जैसे ही मेरी नींद खुली तो देखता हूं कि बाहर कॉरिडोर में सब तरफ पानी फैला हुआ है। सारे दोस्त एक दूसरे को रंग लगा रहे थे यहां तक की हम लोगों के कमरे में पानी घुस गया था यह सब देखकर मन में उत्साह आया कि चलते हैं अब होली खेलेंगे। पुरानी कपड़े पहन कर अपने दोस्तों को बुलाकर हम सब भी ग्राउंड पहुंच गए जहां होली सेलिब्रेशन के लिए स्थान तय किया गया था। वो माहौल देख कर बहुत खुश हुआ और लगा कि नहीं यार घर की होली के अपने मज़े हैं पर कॉलेज की होली के अपने अलग ही आनंद होते हैं।उस दिन मुझे ऐसा भी नहीं लगा कि घरवालों के बिना मज़ा नहीं आता है क्योंकि हमने इतनी धमाल-चौकड़ी मचाई एक दूसरे को खूब रंग लगाया और इस सबके अलावा कॉलेज की तरफ से भी हमारे लिए रेन डांस की व्यवस्था की गई थी डीजे भी रखा गया था। हम सभी दोस्तों ने इतनी शानदार होली खेली कि आज मैं यह इस होली को मेरी अब तक की सबसे यादगार होली के रूप याद करूंगा। वास्तव में मेरी यह होली थी भी बहुत यादगार। हमेशा रंगपंचमी तो इस तरीके से मैं मनाता ही हूं और बल्कि इससे भी अच्छे तरीके से इंदौर में रंगपंचमी मनाई जाती है पर होली के दिन इससे यादगार मेरी कोई होली मुझे याद नहीं आ रही है।
एक दूसरे के ऊपर पक्के रंग से लेकर कीचड़ तक सब लगाया। चूंकि कॉलेज की तरफ से ग्राउंड में होली का आयोजन किया गया था और पानी की वजह से लगभग आधी से ज्यादा जगह कीचड़ बहुत हो चुका था कई सारी जगह गढ्ढे बन चुके थे जहां सब लोग अपने दोस्तों को उठाकर उन गड्ढों में डाल रहे थे। मैंने और मेरे दोस्तों ने भी एक दूसरे को उन गड्ढों में गिराया और जितनी यादगार हम होली मना सकते थे दुगने तरीके से हमने मनाई।
कार्यक्रम खत्म होने के बाद भी हम लोग आपस में होली खेल रहे थे काफी देर तक हमने होली खेली। सब कुछ जब खत्म हुआ तो मुझे लगा कि हां जितनी यादगार हम बना सकते थे हमने उतनी कोशिश तो की।
होली के 4 दिन बाद कल रंगपंचमी के दिन अपने घर और शहर की बहुत याद आई ! इतनी ज्यादा याद मुझे बीते 6 महीनों में कभी नहीं आई जितनी कल आई और आएगी भी क्यों न देश में इंदौर ही एकमात्र ऐसा शहर है जहां रंगपंचमी बड़े धूमधाम के साथ मनाई जाती है...जहां रंग पंचमी पर निकलने वाली गेर में कोई गैर नहीं रहता सब अपने हो जाते हैं। मैं और मेरे दोस्त इस बात का गम मना रहे थे कि इस बार गेर में जाने को नहीं मिला। हम सब इतने भाव विभोर हो चुके थे कि बस आंखों में से आंसू निकलने वाले थे सच में इतना असहाय इतना अकेला पिछले 6 महीनों में कभी महसूस नहीं किया था हम सब एक दूसरे को ढांढस बंधा रहे थे।
कल जब सुबह उठा तो सबसे पहले मोबाइल हाथ में लिया और करीब आधे घंटे तक कई सारे पत्रकारों के यूट्यूब चैनल पर , मेरे दोस्तों के इंस्टाग्राम लाइव पर और भी ऐसे कई लोग जो सोशल मीडिया पर लाइव गेर के रंग दिखा रहे थे उनको देखकर मन में यही विचार आया कि काश आज मैं वहां होता और इस बार की गेर इतनी विशाल थी कि उसने पिछले कई सालों का रिकॉर्ड तोड़ कर एक विश्व कीर्तिमान रच दिया। छह लाख से ज्यादा लोग इस गेर में शामिल हुए थे। यदि विश्व के ऐसे कई सारे उत्सवों से इंदौर की गेर की तुलना की जाए तो इंदौर की गेर ही सबसे अलग दिखाई देती है जिसका इतिहास भी 300 साल से ज्यादा का है। इंदौर में रंगपंचमी पर निकलने वाली गेर की परंपरा 300 साल से चली आ रही है कहा जाता है कि गेर निकालने की परंपरा होलकर काल के समय से चली आ रही है। होलकर राजघराने के लोग रंग पंचमी के दिन बैलगाड़ियों में फूल और रंग गुलाल लेकर निकलते थे और रास्ते में जो भी मिलता था उसे रंग लगाते थे। इस परंपरा का उद्देश्य सिर्फ इतना था कि समाज के सभी वर्गों के साथ मिलकर हमें उत्सव मनाना चाहिए यह परंपरा साल दर साल आगे बढ़ती रही जो कोरोना के समय के अलावा आज तक कभी नहीं रुकी है। यहां तक की इमरजेंसी के टाइम भी इंदौर की गेर को कोई नहीं रोक पाया था। यदि स्पेन के बार्सिलोना में होने वाले ला टोमेटिना फेस्टिवल से इंदौर की गेर की तुलना की जाए तो इंदौर की गेर अपनी तरह का एक अकेला उत्सव है जो टोमेटिना फेस्टिवल से 27 गुना बड़ा है। टोमेटिना फेस्टिवल में करीब 22000 लोग शामिल होते हैं पर इंदौर में 600000 से ज्यादा लोग शामिल हुए हैं।
दोस्तों के इंस्टाग्राम फेसबुक कई सारे मीडिया संस्थानों के यूट्यूब चैनल पर लाइव देखने के बाद मन बड़ा विचलित सा हो गया था। घर में जब मम्मी को फोन लगाया और उनसे पूछा कि गेर में गए थे ? तो उनका जवाब सुनकर मैं सन्न रह गया। मैंने सोचा ऐसे कैसे हो सकता है कि नहीं गए सब लोग गए थे कल अब तो विश्व कीर्तिमान स्थापित हो चुका है उसके बावजूद वो नहीं गए। यहां तक कि मेरे घर से कोई भी कल गेर में शामिल नहीं हुआ ! यह सुनकर मुझे बड़ा दुख हुआ की मैं नहीं हूं तो घर में कोई गया ही नहीं ! मैंने अपने आप को कोसा की काश में बाहर नहीं जाता पढ़ने ऐसा क्या नहीं है मेरे शहर में...??? जिसने मुझे सबकुछ छोड़कर आने के लिए विवश किया ! यह सब ठीक तब तक था जब तक मम्मी रोने नहीं लगी। और जैसे ही मम्मी ने कहा कि तेरी बहुत याद आती है और उनके रोने की आवाज़ मुझ तक पहुंची मुझे एक धक्का सा लगा और मैं ज्यादा दुखी हुआ ! एक वाजिब सवाल मेरे मन में यहीं था कि क्यों आया मैं सबको छोड़कर ?! क्या इतना ज्यादा करियर ज़रूरी है कि मेरे घरवाले भी त्योहार नहीं मना रहे। अगर ये त्याग है तो फिर ऐसा त्याग भला किस काम का जो अपनी मां को रुलाएं !
ख़ैर, इस सबके साथ दिमाग में यह भी चल रहा था कि नहीं मुझे अपने सपने भी पूरे करने हैं जब सपने मेरे हैं तो उन्हें पूरा भी मैं ही करूंगा ! अपने भविष्य को संवारने के लिए मुझे अपने वर्तमान में कुछ त्याग करना पड़ेगा और वो परिंदा ही क्या जिसने उड़ान भरना न सीखा हो ! पर इन 6 महीनों में मैंने यह ज़रूर महसूस किया है कि,
"आगे आने वाला शहर चाहें कितना भी सुंदर या पसंदीदा क्यों न हो ,
पीछे छूटने वाला घर बेचैन कर ही देता हैं ! "
~ नैवेद्य पुरोहित
#घर_से_दूर_पहली_होली
#इंदौर_की_रंगपंचमी
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| रंगपंचमी पर इंदौर शहर की ह्रदयस्थली राजबाड़ा क्षेत्र में छह लाख हुरियारों का हुजूम जो हर किसी को मंत्रमुग्ध करा दे ! |
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| वो यादगार पल जब हमने एक दूसरे की टीशर्ट फाड़ दी थी ! |
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होली पर इससे अच्छा कोई नही लिख सकता, अपनी भावनाएं बहुत अच्छे से व्यक्त करी है गुड नैवेद्य
ReplyDeleteअति सुंदर लेख!
ReplyDeleteअभिषेक भाई आपके अच्छे परवरिश का नतीजा है